Thursday, November 25, 2010

वह लौट आया

समझ नहीं आ रहा...क्या हो रहा है...क्यों हो रहा है...क्या मैं गलत हूं... या मेरी समझ का धोखा है...क्यों अरिजीत के भाव मेरे लिए अजनबी हो उठे हैं पिछले दस सालों से हम साथ काम कर रहे हैं। कोई भी समस्या हो एक-सा हल, कोई भी काम हो एक-सी सोच के साथ तेजी से निपटाना। समझ-व्यवहार सब जगह एक ही फ्रीक्वेंसी, एक-सी ट्यूनिंग। शायद अपने काम के प्रति यही समर्पण दोस्ती और विश्वास की नींव रख गया था। लेकिन पिछले चार-पांच महीनों से कुछ अलग ही मेरे आसपास घट रहा है, जो मैं कतई स्वीकार नहीं कर पा रही हूं।
वैलेंटाइन डे पर अरिजीत का गुलाब का फूल भेंट करना मुझे बेचैन कर गया था। पता नहीं ये डर था समाज का या मेरी अंतरआत्मा किसी अनहोनी की आशंका से सहम गई थी। आजकल के माहौल को देखूं तो दोस्ती की राह में यह आम घटना थी लेकिन संस्कारों को देखूं तो लगता कि कहीं आगे की राह में फिसलन तो शुरू नहीं हो रही।

जब उसने गुलाब का फूल मेरी ओर बढाया तो मुझे लगा कि कैंपस के हर घर की खिडकी खुल गई है और उन खिडकियों में चिपक गई हैं हजार-हजार आंखें। वही आंखें जो मेरे पति ने मुझे तलाक के अवसर पर भेंट की थीं। यूं तो मैं इन रक्तबीज-सी आंखों का सामना कर सकती हूं, क्योंकि मेरे पास है मेरे परिवार का विश्वास और दोस्ती की ताकत। ईश्वर ने हमेशा मुझे इस नायाब तोहफे से नवाजा है लेकिन अरिजीत...
मैंने गुलाब का वो फूल स्वीकार नहीं किया था, बल्कि आदतन अपने भाषण  से अरिजीत के सभी तर्को को धराशायी कर दिया था। 'फूल तोडना मुझे पसंद नहीं, फिर ये हमारे रिश्ते को मजबूती भला कैसे दे सकता है' नहीं अरिजीत हमारे संबंधों को ऎसे प्रतीकों की जरूरत कब से पडने लगी' सारी बहस में अरिजीत अपनी भावनाओं को निर्दोष्ा साबित करने की कोशिश करता रहा और आखिर में इस बात को यहीं खत्म करने का वादा करके हमने एक-दूसरे से विदा ली थी।
मुझे लगा कि बात आई-गई हो गई, पर शायद नहीं...। पता नहीं इस घटना के बाद मैं असहज हो गई हूं या अरिजीत का व्यवहार वाकई असामान्य हो गया है। मुझे लगता है, हां बार-बार लगता है कि वह मुझे लेकर पजेसिव होता जा रहा है और मैं असहज हो जाती हूं। 'कहीं मैं ही तो गलत नहीं सोच रही...उफ...कैसे दोराहे पर खडी हूं। कहीं संस्कारों के पौधे पर उगा अविश्वास का यह फल हमारी दोस्ती के लिए बारूद तो साबित नहीं होगा। नहीं... यह तो मेरी हार होगी। दोस्ती जैसे पवित्र रिश्ते को मैं खोना नहीं चाहती। लेकिन अगर मेरी आशंका सच हुई तो... तब भी मेरी ही हार होगी समाज की नजरों में परिवार की नजरों में...।'

आज कॉफी हाउस में बैठे अरिजीत ने शादी का प्रस्ताव रखा था।
'...शादी!...' मेरे लिए इस रिश्ते में कोई आकष्ाüण नहीं था। मैं अब तक पिछली कडवाहटों से उबर नहीं पाई। अरिजीत के साथ मेरा संबंध मात्र बौद्घिक स्तर पर था। शादी का मतलब होता है- किसी के लिए संपूर्ण समर्पण। शारीरिक और मानसिक स्तर पर खुद को भुलाकर बस मछली की आंख-सा एक लक्ष्य साथी की खुशी ही एकमात्र लक्ष्य... बट एवरीवन नीड्स हिज ऑन स्पेस... नहीं मेरे लिए यह मुमकिन नहीं...।
'...और अरिजीत शायद तुम भी इस संबंध को निभा न पाओ। आज जिस तरह बौद्घिक स्तर पर समानता के व्यवहार को तुम स्वीकार कर पाते हो इस रिश्ते में नहीं कर पाओगे...न...न... तुम्हारा दोष्ा नहीं, पुरूष्ा स्वभाव से ही ऎसा होता है। प्रेम को प्राप्त करने की इच्छा में वह जितना झुक सकता है, प्रेम प्राप्ति के बाद उसे बनाए रखने के लिए झुकना उसके लिए संभव नहीं।'

'झुकने न झुकने का सवाल कहां है क्या हम मित्रता में समानता के स्तर पर एक-दूसरे के बारे में नहीं सोचते... तो फिर शादी के बाद भी...।' अरिजीत की बात पूरी हो इससे पहले ही मैंने कहा, 'नहीं अरिजीत, मित्रता में अपेक्षाएं सीमित होती हैं। यहां बौद्घिक स्तर पर एक-दूसरे के विकास में सहायता करना सुखद होता है और शादीशुदा जिंदगी में यही सब प्रतियोगिता...जानते हो क्यों...इस प्रतियोगिता में एक-दूसरे के आगे निकल जाने का भय सताता रहता है। शायद यही भय अघिकार भाव को हावी बना देता है।'

'कैसी बातें कर रही हो तुम' 'देखो न! इसी अघिकार भाव के चलते नारी मन के विस्तार को भी हमेशा बांधने की कोशिश की जाती रही है... कभी सुरक्षा के नाम पर बंदी नारकीय वैधव्य जीवन, कभी सती प्रथा और अब बदलाव आया तो पुनर्विवाह के नाम पर सोच को थोपने की कोशिश इसे भी अनिवार्यता बनाने का प्रयास...
ये बिंदी है न, ये पुरूष्ाों से बचने का टीका है...न जाने ऎसी कितनी ही बातें पुरूष्ा की श्रेष्ठता को सिद्घ करना चाहती हैं। क्यों नहीं इस देह सीमा के भीतर समाए अनंत मन को समझा जाता क्यों...' मैं भावुक हो उठी थी।
'पता नहीं तुम क्या कहना चाहती हो' अरिजीत की आंखों में परेशानी के भाव उतर आए थे। 'चाहने का सवाल ही नहीं है मेरे लिए जीवन में प्यार का मतलब सिर्फ इतना है कि जहां तुम्हारी जरूरत है, वहां तुम अपने आपको पूर्ण समर्पित कर दो और जहां तुम्हारी जरूरत नहीं वहां अपने आपको शामिल किए बिना दूर से भावांजलि समर्पित करते रहो। बांधने की कोशिश नहीं, बस निरंतर चलते रहो।' अरिजीत कब उठ कर चले गए, मुझे पता ही नहीं लगा हां लगा तो सिर्फ इतना कि आखिर दोस्त खो ही दिया...।

सोचते-सोचते कब झपकी आ गई, पता ही नहीं चला। उठी तो सिर बहुत भारी था। चाय बनाने लगी तो मोबाइल स्क्रीन झिलमिला रहा था। अरिजीत का फोन! 'हैलो...।
' 'हैलो... कहां थी...सात बार कॉल कर चुका हूं।' 'वो साइलेंट मोड पर था।'
'अच्छा प्रोजेक्ट की डिटेल्स ले आना कल डिस्कस करेंगे।'
'ओह अरिजीत! मैंने तुम्हें खोया नहीं।' मन मयूर हो उठा था। हां वह लौट आया... वह
लौट आया।

Sunday, September 26, 2010

ग़ज़ल(दर्द का ज़हर)

दर्द का ज़हर पिया नहीं जिया मैंने
दिल के हर ज़ख्म पर पैबंद सिया मैंने

शिकायत मुकद्दर से नहीं है मुझको
मेरी इबादत को बदनाम किया तूने

लगते हैं झूठे चांदनी के किस्से
समझौता अमावस से कर लिया मैंने

आएगा भला कौन गवाही देने
सारा ज़माना मुंसिफ बना दिया तूने

सन्नाटों के शोर सभी खामोश हो गए
जब से हवा पर पहरा बिठा दिया तूने

क्यों भागते रहे जुगनुओं के पीछे
दीप खुद बनने का फैसला किया मैंने

Thursday, September 23, 2010

भागीरथी बनाम अलकनंदा

अपने विहंगम पंख फैलाये तेजी से जीवन संध्या की ओर बढ़ते लोगों ने तीर्थ स्थलों के भ्रमण की योजना बनाई । इसी क्रम में देवप्रयाग पहुंचे तो एक गाइड आदतन अपनी रौ में बोले जा रहा था ....
"यहाँ भागीरथी और अलकनंदा का संगम है । यहीं से गंगा प्रारंभ होती है । ये दोनों नदियाँ यहाँ क्रमश : सास बहू के नाम से जानी जाती हैं । अब टिहरी बाँध बन जाने के कारण भागीरथी का प्रवाह कुछ कम हो गया है ...."
"हाँ भाई आजकल तो बहुएँ ही उछलकूद मचाती हैं सास तो ....."एक वय-प्राप्त व्यक्ति ने जुमला उछाला । "
"नहीं भाई साहब यह तो भागीरथी ने जनहित गंभीरता धारण कर ली है । इससे न तो भागीरथी उपेक्षित हुई है और न अलकनंदा की चंचलता लांछित । अब गंगा के अस्तित्व को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी अलकनंदा को निभानी है ।" यह एक समझदार ,गंभीर सास का तर्क था ।

Monday, September 20, 2010

आरक्षण

मंडल कमीशन की रिपोर्ट आने पर आरक्षण नीति के विरुद्ध विनीत बाबू ने बड़ी जोरदार आवाज़ उठाई थी ।

अपने लच्छेदार भाषणों के बूते पर वे रातोंरात नेता बन गए । क्या विभाग क्या जनपदीय राजनीतिमें उनकी अच्छी साख बन गयी थी । आरक्षण सम्बन्धी हर बहस में वे योग्यता को आधार बनाये जाने की सिफारिश करते ।
आरक्षित वर्ग के किसी भी कर्मचारी को देख उनके अन्दर बैचैनी शुरू हो जाती ।
आठवीं बोर्ड में उनके बेटे को नक़ल में सहयोग न देने वाले अध्यापक का तबादला सुदूर गाँव में करवा दिया था । संयोग कहिये या दुर्योग वही अध्यापक महोदय कुछ साल बाद फिर टकरा गए । इस बार पी एस सी द्वारा आयोजित परीक्षा में वे वीक्षक थे । विनीत बाबू ने जोड़ तोड़ बैठाकरअध्यापक महोदय को परीक्षा से बाहर करवा दिया ।

....और .... विनीत बाबू के सुपुत्र को योग्यता के आधार पर नौकरी मिल गयी थी ।

Thursday, September 2, 2010

ढलानों पर ...

बहू के लापरवाही भरे व्यवहार से आहत सरदार बचन सिंह बस की खिड़की से बाहर झाँक रहे थे । कहाँ जाएँ ... कहाँ रहें .... सोच का तूफ़ान चल रहा था । "सरदार जी ! यह सीट स्वतंत्रता सेनानियों के लिए रिजर्व है ....." कंडक्टर ने कहा ।
"ओ कोई नी मैं आपे ही उठ जावांगा ।" जवाब देते सरदार जी के स्वर में झल्लाहट उतर गयी थी । बस चलने से पहले एक वयो -वृद्ध किन्तु उत्साह से पूर्ण व्यक्तित्व सरदार जी के पास आ विराजे थे । सरदार जी मन की उहापोह में पड़े थे कि एक तेज आवाज से विचारधारा भंग हो गयी ।

"माई मेरी भी नौकरी है आखिर मैं कहाँ से दूंगा ?"

"बेटा मेरे पास तो यही एक नोट है और मेरा जाना भी जरूरी है ।" वृद्धा गिडगिडाते हुए बोली ।

"वो मुझे नहीं पता । तुम यहीं उतर जाओ । रोजाना एक दो नमूने मिल ही जाते हैं ।" कंडक्टर ने पान की पीक थूकते हुए सीटी बजा दी ।

वृद्धा की आँखों में आंसू आ गए थे और वह हाथ जोड़े रुंधे गले से विनती कर रही थी । तभी सरदार जी की बगल से बुजुर्गवार उठे और बोले ," लाओ ये नोट मुझे दो !"

कंडक्टर ने बस दुबारा चलवाने के लिए सीटी बजाते हुए नोट उनकी ओर बढ़ा दिया । उन्होंने नोट बदल कर वृद्धा की तरफ बढ़ाया और कहा " आगे ज़रुरत पड़ सकती है । " फिर कंडक्टर की तरफ मुखातिब होकर कहा ...." इनके टिकट की एंट्री मेरे पास पर कर दो ।"

"लेकिन .....!"

"भाई मेरे स्वतंत्रता सेनानी पास पर दो व्यक्ति यात्रा कर सकते हैं तो एक एंट्री और कर दो ।" दृढ़ता से बुजुर्गवार ने कहा । उनकी उदारता से सरदार बचन सिंह प्रभावित हो गए थे ।

बोले ,"बाउजी आज के जमाने में चाहे भी तो किसी की मदद करने से पहले सोचना पड़ता है । अपनी औलाद पर ही भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा है । किसी जरूरतमंद का पता लगना ही मुश्किल है । "

"बात तो आपकी ठीक है कि धोखा-धडी बढ़ रही है लेकिन हम अपनी भावधारा को सूखते देखते रहें और पान सिगरेट पर रोज खर्च होने वाली रकम जितनी मदद भी न कर पायें ....सोच के इन संकुचित दायरों से बाहर निकलना ही होगा । "
सरदार जी दृष्टि बाहर गयी जहाँ पहाड़ी ढलानों पर कुछ पेड़ मजबूती से सीधे खड़े मुस्करा रहे थे और कुछ नन्हे पौधे भी उन जैसा बनने की प्रेरणा ले रहे थे।

Wednesday, August 4, 2010

चाह

शब्द -नाद का बोध नहीं
मैं कविता कैसे रच पाऊँगी
ताल सुरों का ज्ञान नहीं
मैं गीत भला क्या गाऊँगी
क्षितिज पार पहुंचे बिन कैसे
इन्द्रधनुष छू पाऊँगी
खिले फूल भ्रमरों के जैसा
गुंजन कैसे कर पाऊँगी
जी चाहे खुशियाँ हर घर -आँगन बांटू
छोटे से आँचल में सबके अश्रु समेटूं
हो जाए जब अंत सकल उत्पीडन का
खुद मर मिट कर अंश बनूँ नवजीवन का !

Thursday, July 15, 2010

पुराने चावल

इस दिवाली पर ननिहाल में सारा परिवार इकठ्ठा हुआ था । दिन भर रसोई में कुछ न कुछ चलता रहता था । नानी ने कुछ चावल अलग रखवा रखे थे । उनका कहना है कि पुराने चावल ज्यादा अच्छे बनते हैं । बासमती चावल तो अपने नाम के अनुरूप ही बनते ही घर को सुवासित कर देते हैं ।
दिवाली के रोज उस समय घर पर ज्यादा लोग नहीं थे । एक व्यक्ति पीठ पर बोरी लादे घर में दाखिल हुआ । उसने अन्दर आकर कहा " प्रसाद ले लो । " चौक में खड़े सुनीति के मामा ने उस व्यक्ति को मनाकर दिया ।
अचानक किसी अनजान व्यक्ति का घर में यूँ दाखिल हो जाना शहरी लोगों के लिए आश्चर्य का विषय था।
" लेकिन बाबूजी मैं तो हर साल प्रसाद दे जाता हूँ । " व्यक्ति ने कहा ।
"भाई हम बाजार से प्रसाद ले आये हैं । "मामा ने जवाब दिया । इसी बीच नानी भी वहां चली आई थी । उस व्यक्ति ने नानी से भी प्रसाद लेने का आग्रह किया परन्तु नानी ने भी दृढ़ता से मना कर दिया ।
व्यक्ति के चेहरे पर निराशा के भाव उतर आये और वह लौट गया । उसके चले जाने के बाद शहरों में बढती धोखा -धडी की घटनाओं की चर्चा चल पड़ी और उस व्यक्ति का आचरण भी उन्ही सबसे जुड़कर संदेह के घेरे में आ चुका था।
अचानक जैसे बिजली कौंधी !"अरे !ये तो हमारे गाँव का रहने वाला है । यहाँ बाजार में चने खील मुरमुरे बेचा करता है ....और हर साल दीवाली पर अपने गाँव की लड़कियों के यहाँ खील बताशे बांटने आता है ।"
नानी बैचैन हो उठी थी ।
अनजाने ही त्यौहार के दिन ,अपने गाँव के भाई का अपमान कर बैठी थी । "क्या करूँ ,क्या न करूँ ?"आँखों में आंसू भर आये ।
"मैं जरा पड़ोस में देख आऊंउनके यहाँ भी तो गया होगा ।" कहकर नानी नंगे पांव ही चल दी । कुछ ही देर में वह व्यक्ति और नानी घर आ गए ।
नानी अपनी याददाश्त को कोसते हुए बार बार माफ़ी मांग रही थी । उनके उस मुस्लिम भाई की आँखों में भी आंसू थे ।
" बेटी जरा एक बर्तन तो देना ।" व्यक्ति ने सुनीति से कहा ।
बर्तन में प्रसाद लेकर सुनीति ने पूछा "आपके लिए चाय बना दूँ ?"
"बहन बेटियों के यहाँ मैं कुछ नहीं खाता ।" व्यक्ति ने जवाब दिया ।
कुछ देर नानी से अपने गाँव के पुराने परिचितों को याद ताजा कर और दुःख -सुख पूछकर वह चल दिया ।
सुनीति को भाई बहन के इस नि :स्वार्थ प्रेम की सुगंध रसोई में पकते पुराने चावलों की सुवास सी महसूस हो रही थी ..........

Tuesday, July 13, 2010

ग़ज़ल (इम्तिहान बाकी है ..)

तू थक गया है क्यूँ अभी इम्तिहान बाकी है
चल उठा पतंग तेरे लिए आसमान बाकी है


हवा जब करके चलती है रेत पर चित्रकारी
नहीं देखती मुड़कर क्या क्या निशान बाकी है

स्वाभिमान तलक जिसने मेरा रख लिया गिरवी
कहता है बेचने को अभी सामान बाकी है

दुनिया ये तेरी मनचाही दुनिया कैसे हो
तेरे मेरे भीतर थोडा शैतान बाकी है

यूँ तो कहने को हम आजाद हैं लेकिन
मुश्किल यही है ,खुद की पहचान बाकी है

दिल की मासूमियत आँगन में भीगने चली
गगन की झोली से बरखा का दान बाकी है

चलो लड़े-झगडे और लिखे इतिहास फिर बोझिल
अभी मासूम चेहरों पर मुस्कान बाकी है

एक -एक करके कहानियां सभी सुना चुके हम
जिद करें हैं बच्चे ,दक्षिणा यजमान बाकी है

गुडिया , लोरी ,थपकी और मीठी यादें माँ
छूटा तेरी गोदी में मेरा सामान बाकी है ।

Saturday, July 10, 2010

नवजीवन का सेतु

सोचा था
चलेंगे उम्र भर
नदी के दो किनारों की तरह
हर कदम साथ साथ
निकले हिम की गोद से
श्वेत फेन पर
सतरंगी सपने सजाये
कुछ दूर ही चले थे
कि बिछड़ी वो सखियाँ
वो चंचल तरंगे
नयी भी मिली
उछाह से भरकर
पर खो गयी
भीड़ का हिस्सा होकर
साथी जो मजबूत थे
पत्थरों की तरह
तेज थी धार जिनकी
समय की सान पर
घिस गए
कुछ इस तरह
कि
धार भोंथरी हुई
या फिर
चिकना बना लिया खुद को
बहते जाने के लिए
पर
बहते भी कब तक
बहाव शिथिल हुआ
तो
रुक गए वे भी
गलत थे हम
जो किनारों के
चलने की बात करते थे
वास्तव में
किनारे कहीं नहीं जाते
बहती है
सिर्फ नदी!
गंतव्य है उसका
वो
अनंत अथाह सागर
खारा है
मगर अपना है
जीवन का हेतु
वो नवजीवन के सेतु !

Friday, July 9, 2010

ग़ज़ल (चाँद रोटी सा )

चाँद रोटी सा लगे तो लौट आना गाँव में
गंध सौंधी सी जगे तो लौट आना गाँव में

आसमां की गोद में रंगों की हो अठखेलियाँ
बिटिया सयानी दिखे तो लौट आना गाँव में

महक मेहंदी की रहे मन भरमाये चूड़ियाँ
ओढ़नी धानी खिले तो लौट आना गाँव में

गुमनाम होती बस्तियों में भीड़ के ही बीच में
सांस पहचानी लगे तो लौट आना गाँव में

यादों की दहलीज़ पर मुस्करा दे एक दिया
आँख का पानी छले तो लौट आना गाँव में

हाथ तेरे बांधे हुए रेशमी मजबूरियां
हूक राखी की उठे तो लौट आना गाँव में

हौसला दिल चाहता हो हाथ एक सिर पर रहे
ज़िन्दगी पल पल खले तो लौट आना गाँव में

धडकनें सुनाने लगी माँ की अब कहानियां
झर झर असीसें झरें तो लौट आना गाँव में

Thursday, July 8, 2010

पल

आया था अभी अभी और तभी गया है निकल
छूकर पास से अजनबी सा गुजर गया है पल

मासूम मुस्कराहट कभी कभी दर्द की नमी
धड़कन के संगीत पर कुछ तो कह गया है पल

आँचल की कोर में बंधी दुआओं की आस में
माँ की गोदी में बचपन सा ठहर गया है पल

कुछ कर गुजरने का ज़ज्बा लिए था साथ
आकर तेरे दरवाजे तक पलट गया है पल

नहीं था केवल एक छोटा सा बेक़दर कतरा
समन्दर लिए था हाथ जिससे फिसल गया है पल

Tuesday, July 6, 2010

कलम

"माँ !टीचर कह रही थी कि पौधे की टहनी को मिटटी में लगाने से नया पौधा तैयार हो जाता है!"......मिटटी के घरौंदों को छोटी -छोटी टहनियों से सजाती नन्ही दिति ने अचरज से पूछा ।
"हाँ बेटा !" उत्तर देकर में अपनी विचार यात्रा पर चल पड़ी ।
यूँ तो गाँव जाना कभी - कभी ही संभव हो पाता पर जब भी जाती ,सभी के विशेष स्नेह में नहाई डोलती रहती । मुझे सभी पलकों पर बिठा कर रखते ,रोकने - टोकने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था । उस पर भी अगर मेरी मन-मानी न चले तो तुरंत दादी के पास शिकायत ले पहुँचती । शिकायत बड़ों की हो या छोटों की ,दादी हमेशा मेरी पक्षधर हुआ करती ।
.....पर उस दिन उन्होंने भी मेरी शिकायत हंसकर टाल दी ,जब भोला ताऊजी ने मुझे ऊँचे स्वर में चुन्नी सिर पर न रखने के लिए डांटा ।

मैं तो शहर में फ्रोक पहना करती थी । गाँव की वजह से सलवार-सूट पहनना पड़ता । उस पर सर पर चुन्नी रखने रखनेवाली बात कतई नहीं जमी तो तुरंत डबडबाई आँखे लेकर पहुँच गयी दादी के पास ..... मगर वहां भी सुनवाई नहीं ...... । खैरकुछ समय बाद इस किस्से को भूल गयी । आखिर बचपन था न ।
पिछले दिनों गाँव गयी तो पता लगा , भोला ताऊजी नहीं रहे । जिक्र छिड़ा तो बात सामने आई कि ताऊजी हमारे गाँव के नहीं थे वो किसी दूसरे प्रान्त से आये थे और दादाजी से "कुछ भी काम करूँगा ...." कहकर शरण मांगी थी ।
छत मिली तो परिवार भाषा संस्कृति सब कुछ ऐसे अपना लिया कि मुझे तो कभी यह पता ही नहीं चला कि उनका हमारे परिवार से क्या सम्बन्ध था ।
"क्या फिर वो कभी अपने गाँव नहीं गए ?" मैंने पूछा था ।
" नहीं बल्कि एक बार उनके परिवार वाले उन्हें लेने आये थे , पर उन्होंने साफ़ मना कर दिया था । दादाजी ने भी उन्हें उनकी इच्छा पर छोड़ दिया था । "
आज समझ पायी हूँ ,दादी ने उन्हें क्यों कुछ नहीं कहा था । वे ताऊजी के स्वाभिमान की रक्षा करना जानती थीं । वो दादी की नज़र में एक नौकर नहीं वरन घर के एक सम्मानित सदस्य थे ।
"माँ! क्या सभी टहनियां मिटटी में लगाने से पौधा बन जाती हैं ?" दिति खेल ख़त्म करके मेरे पास आ गयी थी ।
"नहीं बेटा सभी टहनियां तो नहीं लगती । हाँ कुछ खास टहनियां भी तभी लगती हैं जब उन्हें पोषण के साथ साथ प्यार केजल से सींचा जाये ।

Saturday, July 3, 2010

हाशिये पर

तीव्र गंध की दुनिया में
वो एक रसायन
न पाया
ह्रदय चल पड़ा
स्वरों की अनंत यात्रा पर
मंद्र से तार सप्तक तक
बंदिशों की दुनिया में भी
इच्छित सुर न पाया
कई बार खंगाला छंदों को
अनुभूत मानसिक द्वंद्वों को
कभी तेल जल रंगों में
जीवन के विविध अंगों में
कभी अपनी कभी दूसरों की
नज़र से देखा
कभी धूल कभी फूल
में खोजा
पर डूबने के डर से
सदा किनारे पर डेरा जमाया
इसीलिए ज़िन्दगी में
खुद को
हाशिये पर पाया !

Friday, July 2, 2010

ग़ज़ल(अच्छे वक़्त में )

अच्छे वक़्त में कुछ देर चाँदनी बिखर जाती है
बुरे वक़्त से तो सभी की सीरत संवर जाती है

वो जो अकेला है वही रूहानियत के करीब है
भरी भीड़ में शख्सियत टुकड़ों में बिखर जाती है

ढूंढता फिरता है खुद को कहाँ दुनिया ये शीश महल
चारों तरफ हैं आईने जिस ओर नज़र जाती है

ज़िन्दगी तेरी या मेरी पानी पे लिखी कहानी
नई मौजों में कब परछाई ठहर पाती है

ये दुनिया का मेला बच्चों सी तबियत अपनी
न पूछो कि ऊँगली कब किस ओर मचल जाती है

Thursday, July 1, 2010

आत्मदीप्त उमरिया

दीये की थरथराती लौ
तेज हवाओं से लडती हुई
जिजीविषा की कथा
मौन रहकर कहती हुई

मौन ही तो सत्य है
जब आज के विज्ञापन युग में
आंधी तूफ़ान
हाशिये से उठकर
मुख्य पृष्ठपर आ गए हैं
और आदमी
अपने अनुपम लाक्षाग्रहों में क़ैद
भावों की उर्वर धरा पर
प्रस्तर वन उगाते हुए
भय शास्त्र की पोथियाँ
बांचते हुए
दिया जलाते डरता है
अंधेरों में सुरंगें खोजता है

उस मकड़ी की तरह
जो उलझकर रह गयी है
अपने ही जाल में
अंततः मर जाने के लिए

वीरगति तो नहीं कहेंगे इसे
फिर क्यों न
हवाओं से उलझे
जलाएं
हाँ जलाएं
एक दिया सा अपने भीतर
और

पलने दे जुगनू सी
आत्मदीप्त उमरिया अपने भीतर !

Wednesday, June 30, 2010

जीवन सुरों के आरोह-अवरोह


प्रतिकूल परिस्थितियों में सहज भाव से जीते हुए जीवन के अनमोल पल बिताए हैं तुमने । एक सतत प्रवाहमयी वारिधारा की तरह । पता नहीं जीवन को तुमने जिया या जीवन ने तुम्हे !
अभाव को भी सद्भाव से जीते हुए समय वृक्ष के पत्तों को सहेज कर पूंजी जमा करती रही । वे अनमोल रत्न जो तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न हुए , आज तुम्हारे ही हाथों तराशे जाने के बाद विश्व के अलग अलग हिस्सों अपनी पहचान बनाए हुए हैं । वे अमूल्य हैं और तुमसे थोडा दूर । भावना का फूल अब भी ताज़ा खुशबू से तर- बतर हैं । माँ !..... तुम्हारे लिए उनका यह संबोधन किसी भी सहृदय को द्रवित कर देने के लिए काफी है । क्यूँ न हो ! तुम्हारी करूणाका उपहार आखिर उन्हें भी तो मिला है ।
कुछ सालों से तुम्हारे ऊपर अवस्था का प्रभाव दिखने लगा है । लोग कहते हैं तुम, भूलने लगी हो। मैंने भी महसूस किया है । चीजें इधर - उधर रखकर भूल जाती हो फिर उन्हें ढूंढ़ती रहती हो । उस दिन नहाने जाना था तो न जाने कपडे कहाँ रख दिए ? सबको ढूंढने में आधा घंटा लगा । पता नहीं अकेले कैसे ढूंढ़ती होगी ! मौसी बता रही थी कि कई बार खाना बना कर अलमारी में रख देती हो और फिर दुबारा बनाने लगती हो । अब कोई बताने वाला भी तो नहीं कि खाना तो तुम बना चुकी हो । सत्तर बरस की अवस्था में जब लोग पलंग पर बैठ कर सेवा करवाते हैं ,तुम आज भी अपने हाथों से खाना बनाती हो । भला नौकरों के हाथों में परिवार का स्नेह रस कहाँ..... यही कहती हो । पर तुम्हारी भूल जाने की आदत से डर भी तो लगता है ..... यदि कभी गैस बंद करना भूल गयी तो ......?
वो तो बाऊजी हर कदम पर तुम्हारे साथ हैं । हर कदम पर ..... । तुम्हें ही अपने पुराने दिनों को याद करते सुना है कि किस तरह बाऊजी ओवरटाइम करके अपने भाई बहनों सहित पूरे परिवार का खर्च चलाते थे। हर ज़रूरी कम को उन्होंने सच्चे साधक की तरह पूर्ण किया है । परिवार के हर सदस्य को निवाला मिले ,इसलिए कण कण बाँट कर देने के बाद ही कुछ ग्रहण किया । आज तक सुबह की चाय खुद बनाते हैं । सैर पर जाना अखबार पढना और हर काम नियम पूर्वक समयबद्ध निपटाना । रात को सोने तक के सभी इंतज़ाम खुद देखना ।
उस दिन तुम्हें रुई की जैकेट पहनाते देखना रोमांचित कर गया था । धन्य है तुम्हारा दांपत्य ! आज तुम्हारी भूल जाने की आदत को भी संयम पूर्वक निभा रहे हैं । वर्तमान दौर में एक -दूसरे के प्रति शिकायतों का पुलिंदा खोले दम्पतियों के जीवन में वह मिठास कहाँ मिले , जो एक दूसरे के प्रति समर्पण रखना चाहते ही नहीं हैं । अपेक्षाएं बस अपेक्षाएं .......ऐसे में अगर एक को भूल जाने की आदत हो तो.......!
दिन भर बीसियों चीजें तुम रख कर भूल जाती हो । ऐन ज़रूरत की चीजें भी । पड़ोस की मामी बता रही थी कि अब तो तुम्हे खाना खाना भी याद नहीं रहता एक दिन फुर्सत मिलते ही तुमसे मिलने चली आई ।
वो एक दिन तुम्हारे साथ .......
सुबह जब चाचा के साथ मैं पहुंची तो तुम बच्चों सी किलक उठी थीं । तुरंत फ्रिज से फल निकाल कर ले आई । मैं रसोई में चाय बनाने लगी तो तुम डिब्बों से टटोल कर बिस्कुट नमकीन मिठाई प्लेटों में सजाने लगी । बार बार चाचा से आग्रह करती रहीं कि वे खाना खा कर ही जाएँ । दोपहर खाने में भी न जाने क्या क्या बना लिया था ।
तीसरा पहर तुम्हारे पास आने जाने वालों की रौनक देख शहरों के उन वृद्धजनों की याद आ गयी जो बंगलों के गैरज पोर्शन में अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं प्रतिदिन प्रतिपल । अविश्वास से भरी सीली हवाओं के बीच घुटते रहना उनकी मजबूरी बन गयी है । किसी से बात करने की इजाजत जो नहीं है । भागती- दौड़ती ज़िन्दगी से अनुबंधित लोग खुद अपने लिए बूँद-बूँद तनाव एकत्र कर रहे हैं । भला माँ-बाप के लिए स्नेह कहाँ से लायेंगे । इधर तुम अपने अतिथियों को स्नेह कलश से नहला देना चाहती थी ।
कुछ ही देर में न जाने कहाँ से छोटे -छोटे कई बच्चे दादी नमस्ते -दादी नमस्ते ....... कहते हुए अन्दर चले आये और तुम प्रसन्न -मना एक -एक हाथ पर मिठाई रख रही थी । कितना अच्छा लग रहा था उन पुलकित चेहरों की ख़ुशी देखना !
बहुत सुन्दर अनुभव था संध्या समय तुम्हें परिवार की मंगलकामना के लिए दीपक जलाते देखना ...... । तुम्हारा झुर्रियों से भरा चेहरा आत्मसंतुष्टि की दीप्ति लिए हुए था । पता नहीं दीपक अधिक प्रदीप्त था या तुम्हारा चेहरा !
अनुपम है तुम्हारा अतिथि-सत्कार । अनोखी है तुम्हारी करूणा । अतुल्य है तुम्हारा वात्सल्य और बहुमूल्य हैं वे जीवन मूल्य जिन्हें तुम आज भी आँचल से बांधे हुए हो ।
तुम कुछ नहीं भूली नानी -माँ ! भूले तो हम हैं जीवन सुरों के आरोह -अवरोह का आनंद । सुर से भटकी बेसुरी ज़िन्दगी जीते हुए ।

Tuesday, June 29, 2010

ग़ज़ल (मसला गया गुलाब )

मसला गया गुलाब कहानी छोड़ गया है
हथेली में खुशबू निशानी छोड़ गया है

फलसफा इश्क का कि मेहर खुदा की लिखता
क्यों दर्द का दरिया ज़बानी छोड़ गया है

हर कदम पर रूह उसकी छलनी हुई होगी
वसीयत अगर साफबयानी छोड़ गया है

तमाम जिंदगी वो पेड़ सर झुकाए रहा
वक्ते रुखसत नज़र सवाली छोड़ गया है

बिना वज़ह नहीं रुकने लगे गली के लोग
घर अकेली बिटिया सयानी छोड़ गया है !

Monday, June 28, 2010

मन बंजारे

खोज रहा क्या मन बंजारे
सुधियों की लेकर पतवारें
नए घड़े के पानी सी
नेह भीगी माटी की गंध
गाँव मुहल्ले गली गली
रिश्तों के बंधन निर्द्वंद्व
पलक पलक प्रगाढ़ प्रतीक्षा
द्वार सजी सी बंदन वारे
खोज रहा क्या मन बंजारे !

वृक्षों पर लौटे यौवन
नन्हीं नन्हीं कोंपल संग
पतझड़ बीते आये फागुन
गूंज रहे धमाल और चंग
रेत पे छिटकी जैसे बूंदें
गुजरी हुई वसंत बहारें
खोज रहा क्या मन बंजारे !

सुबह सवेरे सजी आरती
शंख घंटियों की आवाजें
गुरुबानी के संग संग ही
सुर मिला रही पवित्र अजाने
मंगल भावों से पगी हवाएं
सांसों में अमृत के डेरे
खोज रहा क्या मन बंजारे !

नन्हे बच्चों की बातों में
मिल जाये गुलाबों की नरमी
हम तुम फिर महसूस कर सकें
जुड़ते हाथ दर हाथ की गर्मी
आओ !हम कोशिश करके ढूंढें
दबे राख में कुछ अंगारें
खोज रहा क्या मन बंजारे !

Saturday, June 26, 2010

क्ले क्रिऐशन







समर कैंप में मिटटी के साथ कुछ प्रयोग ---

Sunday, June 20, 2010

कान्हा तुम कान्हा ही होते


मात यशोदा पिता नन्द से
यदि तुमने पाए न होते
गिरधर वंशीधर नट नागर
बोलो तुम क्या कान्हा होते
विश्व प्रेम की धारा राधा
यमुना रूप बही न होती
पीपल छैयां मनहर गैया
ब्रजराज वो पावन न होती
प्रेम पूरित पवन न होती
बंशी तब क्या मधुर ही होती
कैसे मधुरिम गान सुनाते!

माँ की ममता होती बाधक
राधिका पथ रोक ही लेती
छेद न होते बाँसुरिया तन
कैसे मर्म भेद बतलाती
रहती उद्धव झोली खाली
नयन नीर सिंचित कालिंदी
व्याकुल गोपी गोप न होते!

स्वप्न समर्पित मीरा भक्ति
सूर के माखन चोर न होते
मोहाच्छादित अर्जुन शक्ति
तेरे माया रूप न होते
कुरुक्षेत्र और चक्र व्यूह बिन
गीता के संधान न होते
विश्व वन्द्य कैसे बन पाते!

आशा नेह और दृढ विश्वास
इन तत्वों की जुड़े पंखुरिया
अर्पित प्रत्यर्पित शुद्ध भाव
खिले कमल मोहक सांवरिया
सखा पुत्र और भक्त भाव हित
तुम अपनी बाहें फैलाये
हाँ असीम विस्तार ही होते

कान्हा तुम कान्हा ही होते
कान्हा तुम कान्हा ही होते !

गिद्ध शासन

हर सपना नीलाम हुआ है
जब गिद्धों को सौंपा शासन
साँसों पर तो चील झपट है
हैं खाली प्राणों के बासन

आज़ादी की सुबह में घोला
अंधियारी रातों का काजल
मन में अपने झांक सके ना
कहते मैला जग का आँचल

कैसे कोई सलीब उठाये
बुढ़ा रहा यूँ ही यौवन
खून से लथपथ हर काया के
नज़दीक सियारों के आसन

तिनके तिनके सपन जुटाए
आयेंगे मौसम मनभावन
हुआ गुमशुदा फागुन अबके
भटक गया है रस्ता सावन

अंधेरों में साए पराये
आसकिरण भी भूली आँगन
कोई सीता किसे पुकारे
जटायु पर भारी अब भी रावण

ग़ज़ल ( काश मुखर होती ...)

काश मुखर होती इतनी मेरी पीर
बिन बोले भी जुबां कहलाती कबीर

मर जाने के बाद बनती थी मज़ार
लाशों पर होती अब महलों की ताबीर

सूरज भी अब तो रहा नहीं बेदाग़
जब अंधियारे बन बैठे हैं वजीर

जाए मंदिर में पूजा या ठोकर खाए
हर पत्थर की होती अपनी ही तकदीर

बगुला भगतों के बीच होना है चुनाव
लोकतंत्र का मतलब अँधेरे का तीर

गुरूर जिनको कि हमारा जिंदा है ज़मीर
स्वाभिमान की चौखट ताउम्र रहें फकीर

कैसे मैं जियूं !

छुई मुई सी सिमटूं
या कि खुशबू बन बिखरूं
समझ नहीं आता
कैसे मैं जियूं
पंछियों सी उडू
जब जी चाहे उतरूँ चढ़ूँ
या पतंग की डोर
दूसरों को सौंप दूँ
कि शाखों में उलझूं
तो झटक कर
तोड़ ले वो डोर
और मैं
अंतिम साँस तक
चीर चीर होते हुए
मृत्यु की प्रतीक्षा करूँ
जी तो चाहे बारिश में
भीगे पत्तों सी
इठलाऊं हंसूं
चुटकी भर धूप सुख की
नयन बदरिया संग
मन के उजले भावों से
इन्द्रधनुष बुनूं
क्यों न नदी बनूँ
उम्र भर बहते रहकर
अनंत अथाह को हो समर्पित
बूंदों का रूप धर
नवजीवन चुनूँ !

Friday, May 28, 2010

पानी

ढूँढोगे मन हिरणा किधर गया पानी
आज अगर आँखों से उतर गया पानी

सीपी के गर्भ में रहकर दो चार दिन
मोती बन के देखो सँवर गया पानी

कभी बिगाड़े कभी संवारे गाँव घर
जब जब जिस रस्ते से गुज़र गया पानी

पूछा कैसे गुजारी ज़िन्दगी की शाम
क्यूँ माँ की आँखों से छलक गया पानी

सजा देगा उपवन बादल का कारवां
अंजुरी भर धोरों में बिखर गया पानी

उजड़ी कोई माँग सिसक रही राखियाँ
यूँ आतंकी आँख का मर गया पानी

सिरजेगा नवजीवन तपेगा दिनोदिन
यूँ ही नहीं समंदर ठहर गया पानी

झील ने गाया मर्यादा का गीत है
अंगुली भर छुअन से सिहर गया पानी ।

जवाब चाहिए

फूलों से कैसे दोस्ती बढाती है तितलियाँ
क्यूँकर हाथों से फिसल जाती है मछलियाँ
उड़ने को कैसे पंख फैलाती कोई चिड़िया
बसते में मेरे कैसे सिमट सकती है दुनिया
जी चाहता है मैना बुलबुल के गीत सुनने
बारिश में भीगने का सपना लगा हूँ बुनने
केवल तस्वीरों में टंगे देखे मैंने नदी झरने
बंद कमरों में कौन आएगा कल कल का नाद भरने
चारों तरफ है मेरे बंद कांच की खिड़कियाँ
छूने को आसमां मचलती मेरी हथेलियाँ
बैठूं न कभी छत पर देखी न मंदाकिनियाँ
किताबों से कैसे नापूं चाँद तारों की दूरियां
पंख तो है मेरे पास मुझे आकाश चाहिए
मुझ जैसा ही नन्हा सा मुझे विश्वास चाहिए
पिंजरे से बाहर खुली हवा का आभास चाहिए
मन में उठते हर सवाल का मुझे ज़वाब चाहिए ।

प्रकृति और माँ

अपनी ज़रूरतें कांट छाँट
जिसने ज़िन्दगी को सिया है
हलक से बाहर न आने पाए
अरमानों को पिया है
उस माँ की स्नेहिल छाया से
क्रमशः दूर
और दूर होते
ऊँचाइयों पर बढ़ते
उसके लाडलों ने
हवाओं को
कमरे में
कैद कर लिया है
बौनी ज़रूरतों को ढूंढती
इच्छाएं बढती रही
भूसे के ढेर सी
उड़ा न दे कहीं कोई
साँसों को केप्सूल में
बंद कर लिया है
धरती का यह बेटा
सुविधाएँ जुटा रहा है
या सामान दर्द के बटोर रहा है
क्या जाने नादान
माँ की उंगली छोड़
कब बैसाखियों को थाम लिया है ।

Saturday, May 22, 2010

ग़ज़ल( चाँद तारे रिश्ते ..)

चाँद तारे रिश्ते खुशबू इधर या उधर के देखो
जज्बात दिलों के देखो या गुलाब अधर के देखो

अगर जानना है समंदर की रुसवाइयों का राज़
या तो मछली से पूछो या गहरे उतर के देखो

है बड़े दिनों से कैद तेरे किरदार की खुशबू
बंद मुट्ठी को खोलो जंगलों में बिखर के देखो

ऊँची ये उड़ाने घोसलों से कहीं दूर न कर दे
घर की बेजान चीजों के संग खुद संवर के देखो

है घनी अमावस रात तो कभी चांदनी की बातें
एक नया खेल जग में जादूगर रच कर के देखो

बारिश में भीगी पत्तियों सा जादू कभी जगाओ
कभी सर्दी की धूप सा आँगन में पसर के देखो

बिखरा कोई सामान या फिर खोया कोई रिश्ता
आवारगी में क्या है दरो दीवार घर के देखो

Sunday, May 16, 2010

पतंग की डोर ज़िन्दगी

हवाओं की संगी सहेली
पतंग की डोर है ज़िन्दगी


लाल पीले नीले गुलाबी
सपनों के पीछे भागती
आसमां में कुलांचे भरती
पतंग की डोर है ज़िन्दगी


इस हाथ से उस हाथ कभी
खींचा किसी ने कभी ढील दी
यूँ ही खींचतान में उलझी
पतंग की डोर है ज़िन्दगी


ज़मीन से जुड़े रहकर भी
ऊचाइयों से बात करती
क़्त की चरखी में लिपटी
पतंग की डोर है ज़िन्दगी

Thursday, May 6, 2010

मन बंजारे


मन बंजारे
अनगिन गांठे थी ताने में
अनगिन गांठे थी बाने में
सफ़ेद हुए स्याह बालों की
एक उमर बुनी अनजाने में
अनुभव कुछ थे नीम करेले
और कुछ थे शहद के धारे
कभी पिंजी रुई की नरमी
थी चुभन कभी अफ़साने में
जीवन के वचन निभाए भी
आंधी में दिए जलाये भी
डेरा अपना बंजारे सा
भटके दर दर वीराने में
साँस दर साँस उलटी गिनती
तेरे दामन से क्या चुनती
खोल रहस्य जिन्दगी अब तू
क्या लाईथी नजराने में
जब जब पीड़ा घन घिरता है
दिल में आग लिए फिरता है
एक कथा वही उमस घुटन की
युग बीत गए समझाने में
एक उमर बुनी अनजाने में

Tuesday, May 4, 2010

माँ


माँ
तुझसे मेरी कथा शुरू है
माँ ओ माँ तू प्रथम गुरु है

नित्य अंगारों पर चली तू
कपूर हथेली पर जलाये
रचने को नवछंद ऋचा का
पीड़ा से मन मौन सजाये
मंत्रपूरित कवच सा मुझ पर
सदा शुभचिंतक कल्पतरु है

मैं एक बीज था पल्लव का
मजबूत शाख विस्तार दिया
दे पंख मेरे अरमानों को
नव क्षितिज नवल संसार दिया
मैं शाख तेरे व्यक्तित्व की
तू ही जीवनाधार तरु है

सूखे में आशा बादल सा
आशीष भरा तेरा आँचल
हाँ बांध खुद को बन्धनों में
दी मुझको आजादी पलपल
तू ही स्नेह तू वर्तिका भी
बिना तेरे तो जीवन मरू है

माँ ओ माँ तू प्रथम गुरु है

Monday, May 3, 2010

ग़ज़ल (क़द की ऊंचाइयों की ...)


ग़ज़ल
कद की ऊँचाइयों की हकीकत नज़र आएगी
जब हालात की धूप में परछाई सिमट जाएगी

हर एक लकीर आखिर छोटी हो ही जायेगी
जब कोई लम्बी रेखा करीब से गुजर जायेगी

गुमनाम बुनियादी पत्थर जो सो रहे खामोश
गर बदलेंगे करवट दरो दीवार सिहर जायेगी

अपनी परवाज़ की खातिर मत तितलियों को मार
पंख कभी तेरे भी समय की धार क़तर जायेगी

पत्थरों के बल पर सूरत नहीं बदल जायेगी
देखना तस्वीर तेरी आईने में बिखर जायेगी

होगा खुद से सामना वो घडी भी आएगी
तब दुनिया की भीड़ में फरियाद बेअसर जायेगी

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