Sunday, December 31, 2017

आगत के स्वागत में

आने वाला पल मुट्ठी में , लाया है पैगाम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये

धुंध में लिपटे रहें सवेरे , तू आशा की ज्योत जला  
नई राह चलते साधक की , कदमताल से ताल मिला
मौसम तेरे हक में राही , लायेगा परिणाम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये
खेतों से रूठे बेटों के , हाथों में विश्वास लिखें
लोकचेतना की कूँची से, चिरंजीव मधुमास लिखें
वंचित जीवन के हिस्से भी , ले आयें सुखधाम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये

गतिविधियाँ हों नई नई सब , जीवन के सब बोध नये
परम्परा आँचल में बांधें , हों मानस के शोध नये
शुद्ध भाव से आपूरित हों चिंतन के शुभ काम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये

Thursday, December 7, 2017

नन्हा अभिभावक


रोजगार की तलाश में घूमते घुमक्कड़ लोगों के अस्थाई से डेरे इस बार भी विद्यालय की सीमा के आसपास दिखाई दिए, तो कुछ सहकर्मियों ने उन डेरों के बच्चों को स्कूल से जोड़ने का उपक्रम किया | उन बच्चों के रहन सहन तौर-तरीकों को लेकर कुछ लोग असहज भी थे लेकिन धीरे-धीरे नियमित आने वाले बच्चों के स्वभाव और तौर-तरीकों में परिवर्तन लाने में शिक्षकवृंद सफल भी हुआ |
इन्हीं बच्चों में से एक बच्चा जो अपनी सात वर्षीय उम्र से कुछ ज्यादा ही समझदार दिखाई देता है अक्सर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने मेरे पास आ ही जाता है | मात्र दो माह में पढ़ाई में भी उसका अच्छा प्रदर्शन देखने को मिला है |
प्रारंभ के एक माह सभी बच्चों को एक साथ बैठाकर केवल बातचीत,व्यवहार व सफाई की आदतों को सिखाया जा रहा था | फिर सीखने के लेवल और आयु के आधार पर अलग-अलग बैठाने लगे तो वह बच्चा अपनी नन्हीं बहन को , जो दूसरे कक्ष में बैठती थी हर कालांश में उसे सँभालने जाता | शाम को घर जाते वक़्त अपनी बहन सहित दूसरे छोटे बच्चों को भी डांट-डपट कर सड़क के किनारे चलने को कहता | कभी आने में देर हो जाए तो कारण बताने भी जरूर आता ये सब बातें उसकी जिम्मेदारी भरी समझ को बताती है | 
अक्सर अपनी प्रगति की जानकारी देने वो आ ही जाता है | इसी क्रम में दो दिन पहले वो एक सवाल लेकर मेरे पास आया मेरा ध्यान उसके सवाल पर नहीं था और मैं उसके सवाल तक पहुँचूँ इससे पहले उसने बड़ी मासूमियत से पूछा “आपको नहीं आता ?” मैंने ना में गर्दन हिला दी | कुछ दयापूर्ण दृष्टि से देखते हुए उसने अपने सहज अभिभावकीय अंदाज में कहा “कोई बात नहीं मैं सर से पूछ लूँगा |”
सरलता से कहा गया उसका यह वाक्य कितनी तरलता से भरा था मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती | एक तरफ खिल्ली उड़ाने का बहाना ढूंढते तथाकथित बुद्धिजीवी और एक तरफ बालमन की यह सहज स्वीकार्यता , कि आप जैसे हैं वैसे अच्छे हैं आप कुछ जानते हैं, तो ठीक , नहीं जानते तो भी ठीक ....|   उसका अभिभावकीय संरक्षण जो अपनी छोटी बहन के प्रति है बिलकुल वही अपनी अध्यापिका की तरफ भी |
वो तरलता वो सरलता जो सहज स्वभाव के रूप में उसकी पूँजी है क्या किसी विश्वविद्यालय की डिग्री किसी को दिला सकती है ? वो सुन्दर भाव जो अभावों में उसे उपलब्ध है वो भौतिक साधनों की उपलब्धता में कहीं दब जाते  हैं | अभावों के जीवन से उपार्जित यह विलक्षण भाव  चिरंजीवी हो यही प्रार्थना है !!!

    

Tuesday, November 21, 2017

तरक्की

                                 


लगता था रफ़्तार है तो तरक्की है | लेकिन सड़कों के गड्ढ़े लगातार बढ़ रहे थे | नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत याद करते  हम इंतज़ार कर रहे  थे , कि कब आयेंगे अच्छे रफ़्तार भरे दिन | 
अचानक कुछ हलचल दिखाई दी कोलतार, रोड़रोलर और मजदूर .... लगा कि दिन पलटने को हैं लेकिन जैसे-जैसे सड़क उभरने लगी वैसे-वैसे ही उभरने लगे कुछ स्पीड ब्रेकर ...... लोगों ने खुद बनवाये थे .....ज्यादा नहीं हर दूसरे –तीसरे घर के बाद एक ...... 

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