Saturday, September 25, 2021

कश्ती न ये जादुई बादबानी

 (भुजंग प्रयात छंद)


ज़माना कहेगा जिसे मां भवानी


अनूठी रहे याद ऐसी निशानी


पढूंगी बढूंगी रुकूंगी कभी ना


बनूं प्रेरणा मैं लिखूं वो कहानी


खिलें यत्न मेरे चली मैं अकेेली


भले नाव मेरी हवा की सहेली


चुनौती सभी जीतना चाहती हूं


कि कश्ती न ये जादुई बादबानी


मुझे व्याधि आंधी न कोई सताये


नदी पार आशा बुलाए रिझाये


इरादे भरोसे स्वयंसिद्ध मेरे


मिली शक्ति कोई मुझे आसमानी

 - वंदना

Friday, November 13, 2020

दीवाली के दोहे

 बांह पकड़ कर दीप की 

बोली नई कपास

गीत लिखेगी रोशनी 

ले स्नेहिल विश्वास

आभा का  संकल्प ले

जले देहरी दीप

नव आशाएं उर धरे

जैसे मोती सीप

  

Tuesday, October 20, 2020

दीवार पार से

 


आकर्षक कैलेंडर भी दीवारों पर उभरे सीलन के धब्बों को छुपा नहीं पाते |


जब इन्हीं दीवारों के साथ मुझे रहना है तो क्यों इनका बदरंग होना मुझे खलता है ? क्यों बार-बार ऐसा लगता है कि दीवार पार रहने वालों की परछाइयाँ धब्बों के रूप में मुझे सताने चली आती हैं ? उनकी कमियां उनकी खामियां सभी कुछ दीवार पर उभर आते हैं | आखिर उनमें कमियां न होती तो ये दीवार हमारे बीच क्यों होती ?


यह सब सोच ही रही थी कि लगा जैसे दीवार की दरारों से शब्द फिसल रहे हैं और अनुरणन करते हुए कमरे में फ़ैल रहे हैं ,स्वर मेरा नहीं है पर शब्द अक्षरश: वही हैं ..... सीलन ...धब्बे .... खामियाँ .... शायद दीवार पार से ...



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