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Tuesday, October 10, 2017

पटाखों पर बैन

पटाखों पर बैन को लेकर बहुत से लोग इसे हिंदुत्व के विरोध में बता रहे हैं | इन दिनों लोगों की कुछ मुद्दों पर प्रतिक्रियाएं पढ़कर बार बार यह प्रश्न मेरे मन में उठ रहा है कि हिंदुत्व आखिर है क्या ? मेरी अल्पबुद्धि तो अपने हिंदुत्व को इतना ही समझ पाई है कि यदि मैं राम के आदर्शों पर कुछ दूर भी चल सकूँ तो हिंदुत्व के गौरव की रक्षा में मेरा योगदान रामसेतु निर्माण में गिलहरी के मुट्ठी भर रेत के योगदान जैसा तो हो ही जाएगा |
भाई के लिए सम्पूर्ण राज्य का त्याग करने वाले राम शायद आज उन भाइयों से पूछना चाहते होंगे कि क्यों तुम छोटी छोटी बातों को लेकर नित्य न्यायालयों में जूझने चल देते हो ? आओ मुझे मानते हो तो कुछ त्याग करके दिखाओ |
आज राम पूछना चाहते होंगे कि-
जरा बताओ तो क्या तुम छुआछूत छोड़ चुके हो मैनें तो माँ शबरी के जूठे खाते वक़्त एक बार भी नहीं पूछा कि तुम्हारी जाति क्या है , क्या तुम सहज ऐसा कर पाओगे ?
माँ कैकेयी के आदेश को जिस तरह मैनें शिरोधार्य किया क्या तुम अपनी माँ के आदेश का मान बिना कोई प्रश्न किये रख पाते हो ?
जिस तरह मैनें सुग्रीव नल नील हनुमान और अंगद को नेतृत्व का मौका दिया क्या तुम अपने सहयोगियों अपने छोटे भाई बहनों को आगे बढ़ने का मौका देते हो ?
क्या अपने भाई को इतना प्रेम देते हो कि वो तुम्हारी अनुपस्थिति में भी तुम्हारे हिस्से की रक्षा मेरे अनुज भरत की तरह कर सके ?
क्या तुम में इतनी उदारता है कि अपने विरोधी के दुष्प्रयासों को निष्फल करने के बाद भी उसके ज्ञान का आदर कर सको ?
क्या इतना साहस जुटा पाओगे कि देश के हितार्थ सेवार्थ दो जोड़ी कपड़ों में चल पड़ोगे ?
अगर वाकई इतना साहस है तो अपने बीमार भाई बहनों के स्वास्थ्य हित चिंतन से तुम्हारा हिंदुत्व किसी दृष्टि से कमजोर नहीं होगा |
प्रदूषण संबंधी बयानों में गाड़ियों के प्रदूषण संबंधी बात की जा रही है हाँ एक उपाय ऑड-इवन नंबर वाला कुछ हद तक कारगर हुआ था तो क्यों न  बिना किसी विरोध के हम उसे अपना लें |
हाँ बिलकुल मैं इस बात से सहमत हूँ कि नववर्ष , शादी ब्याह जैसे मौकों पर भी पटाखे और कानफोडू डीजे से दूर रहना जरुरी है |
प्रदूषण कारखानों से भी फैलता है अगर अनावश्यक खरीदारी को संयमित कर सकें तो इस पर भी अंकुश लग सकेगा |इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मांग की गयी थी कि पटाखों के लिए दिवाली और चार दिन की  ही इजाजत हो साथ ही पटाखे चलाने के लिए कोई स्थान निर्धारित हो और शाम 7 बजे से नौ बजे तक का समय हो |सुप्रीम कोर्ट ने इस सम्बन्ध में पुरानी गाइड लाइन को ही मानने के आदेश जारी किये हैं जिसमें वर्ष २००५ में सुप्रीम कोर्ट ने रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच रोक लगाईं थी |ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका तो दुष्यंत जी सोच की तरह बिलकुल स्पष्ट है कि
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सारी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए”
  

जिस दिन अपने भाईयों और बहनों के प्रति हमारी सोच इतनी उदारता पूर्ण होगी कि हम यह समझ लें कि श्री  राम का प्रत्येक संकेत ,चेष्टा और प्रसन्नता भारत के राज्याभिषेक के लिए थीं और भरत की सारे प्रयास श्री राम के राज्याभिषेक के लिए थीं और हमें इनका अनुकरण करना है तो हिंदुत्व और हमारी संस्कृति को कोई हानि  नहीं पहुंचा सकेगा |



Friday, June 21, 2013

चिंतन

प्रकृति का वह स्वरूप जो भारत के उत्तरी प्रदेश में देखने को मिला वाकई भयावह है आत्मा को झकझोर गया सम्पूर्ण मंजर साथ ही याद आई प्रसाद जी की कामायनी शतपथ ब्राह्मण पर आधारित महाकाव्य की ये  पंक्तियां –

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह
नीचे जल था ऊपर हिम था एक तरल था एक सघन
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन
*******

निकल रही थी मर्म वेदना करुणाविकल कहानी सी वहां अकेली प्रकृति सुन रही हँसतीसी पहचानी सी
*****

उनको देख कौन रोया यों अन्तरिक्ष में बैठ अधीर
वयस्त बरसने लगा अश्रुमय यह प्रलय हलाहल नीर
हाहाकार हुआ क्रंदनमय  कठिन कुलिश होते थे चूर
हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार बार होता था क्रूर
 *******

भारतीय दर्शन ने मनुष्य को सदैव संतुलित जीवन जीने का सन्देश दिया है लेकिन हम दर्शन को छोड़कर दूरदर्शन के पीछे भाग रहे हैं जो निरंतर विलासिता के पीछे पागल होने पर जोर दे रहा है
टी.वी पर उत्तराखंड के दृश्य दिखाते समय बार बार प्रकृति से किये जा रहे खिलवाड़ की बात दोहराई जा रही थी टिहरी बाँध पर सवाल उठाये जा रहे थे लेकिन सोचिये कि टिहरी बाँध की जरूरत क्यों पड़ी ?सभी जानते हैं कि नदियों पर बाँध सिंचाई अथवा ऊर्जा उत्पादन के लिए बनाये जाते हैं. सिंचाई के अभाव में अन्न उत्पादन कैसे हो? निरंतर बढती जनसँख्या को अन्न उपलब्ध करवाने का अन्य उपाय क्या है? रही बात ऊर्जा उत्पादन की तो कुछ घंटे बिजली के अभाव में हमारी क्या हालत हो जाती है यह किसी से छिपा नहीं है ऑफिस घर बाज़ार सभी जगह बढ़ते बिजली उपकरण निरंतर ऊर्जा की मांग करते हैं और ऊर्जा प्राप्ति का जरिया है प्रकृति एकमात्र प्रकृति

टी.वी. पर शोर मचा रहे इन बुद्धिजीवियों से कोई पूछे कि इनके पास ऊर्जा के क्या स्रोत हैं कैसे ये 24*7 अपने कार्यक्रमों को प्रसारित कर पाते हैं क्या इनके पास कोई निजी संसाधन हैं ऊर्जा प्राप्ति के ?यदि नहीं तो जरा आकलन करके बताइये कि सारे दिन में वास्तव में कितने आवश्यक एवं उपयोगी कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं और कुल कितनी ऊर्जा इसमें खर्च होती है

कहने को तो आप कहते कि इस कार्यक्रम के प्रायोजक हैं फलां फलां विज्ञापन लेकिन वास्तव में विज्ञापनों को इन कार्यक्रमों एवं समाचारों के द्वारा प्रायोजित किया जाता है

ऊर्जा केवल टी.वी. प्रसारण में ही खर्च नहीं होती कार्यक्रमों को तैयार करने से लेकर दर्शकों के देखने के लिए काम आ रहे उपकरणों तक करोड़ों यूनिट बिजली प्रयोग में आती है एक समाचार का विस्तार देखने के लिए हम घंटों टी.वी. पर नजरें गडाए रहते हैं और विस्तार के बजाय हाथ आती हैं वे क्लिपिंग्स जिन्हें घिस जाने की हद तक बार बार प्रसारित किया जाता है

क्या बुराई थी कि हम आकाशवाणी पर 15 मिनट के समाचार सुन कर जानकारी हासिल कर लेते थे और अब घंटों बैठकर भी उतनी जानकारी नहीं जुटा  पाते आकाशवाणी पर सरकारी तोता होने का इल्जाम था और अब हम देसी विदेशी रंगीन तोतों की टांय टांय सुनने को विवश हैं

अगर वास्तव में प्रकृति की चिंता है तो महात्मा गाँधी जी की इस उक्ति को ध्यान में रखना होगा –

Earth provides enough to satisfy every man’s need but not every man’s greed .

तो आइये बंद करें बिना जरूरत चल रहे पंखे कूलर ,ऊंघते कम्प्यूटर और अलसाई लाइटें  जहाँ तक हो सके ऊर्जा  बचाएं . थोड़ी सहन शक्ति बढ़ाएं और उस गर्मी को सहन करने के बारे में सोचें जिसे हम बिना ac कूलर बर्दाश्त नहीं कर पाते पर सैकड़ों लोग उसी तपती गर्मी में आजीविका के लिए पूरा दिन खड़े रहते हैं

बड़ी लालसा यहाँ सुयश की
अपराधों की स्वीकृति बनती
अंध प्रेरणा से परिचालित
कर्ता में करते निज गिनती

तो.... या तो हम प्रकृति के दोस्त बन जाएँ या प्रकृति का तांडव देखने को तैयार रहें

प्रकृति रही दुर्जेय पराजित
हम सब थे भूले मद में
भोले थे हाँ तिरते केवल
सब विलासिता के नद में 
 





Saturday, April 20, 2013

सुरक्षित आँगन की जरूरत .....


अभी कहीं कोई चोरी लूट धन हानि जैसी कोई घटना होती या वर्ग विशेष पर हमला होता तो शहर बंद का आह्वान किया जाता राजनीतिक ढोंग रचना होता तो भारत बंद का आह्वान किया जाता पर देश की हर महिला इन घटनाओं से आहत होकर भी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखती कि बस अब बंद करो मुझे बार बार अपमानित करना वर्ना मैं भी देश की धड़कन बंद कर सकती हूँ
बाजार.... जो हमारे नैतिक मूल्यों को कुचलने का सबसे बड़ा षड्यंत्र रच रहा है मैं उसका विरोध करती हूँ बाजार.... जिसकी मैं एक उपभोक्ता हूँ और चाहूँ तो मुझे व्यापार  की एक वस्तु समझने वाली मानसिकता को चुटकियों में नष्ट कर सकती हूँ

http://www.freedigitalphotos.net


क्यों देश के राजनीतिज्ञ चिंतन नहीं कर सकते कि इन घटनाओं को कैसे रोका जाए क्यों कठोर दंड की अनुशंसा करने में झिझक रहे है वास्तविकता यह है कि उनके लिए मछली की आँख के रूप में वे उद्योग धंधे हैं जो कमाई का साधन हैं और मूर्ख जनता पैसे खर्च कर अपने घर में कबाड़ इकठ्ठा करती है और कुछ दिन बाद उसे फेंक कर फिर बाजार चल देती है  राजनीतिज्ञों को लगता है कि जनता इसी तरह अपनी सुरक्षा और बिगडती व्यवस्था के सवाल पर दो चार डंडे खाएगी और बैठ जाएगी उन्हें (राजनीतिज्ञों को )लाभ पहुंचाने वाला  बाजार अपनी रफ़्तार से चलता रहेगा

हमारी बच्चियों को एक सुरक्षित आँगन की जरूरत है जहाँ वे कम से कम अपना बचपन तो जी सकें

आइये आज हम कहें कि हमारी सुरक्षा हमें सबसे ज्यादा प्यारी है इसलिए अब हम तुम्हारे व्यापार तभी चलने देंगे जब इस बारे में सरकार और विपक्ष एक राय होकर सही फैसला ले लेंगे


Saturday, March 16, 2013

रोकना ही होगा ....


कल फेसबुक पर  एक विडियो देखा जिसमे एक महिला वेस्टर्न स्टाइल में डांस कर रही थी | डांस करते वक़्त उसके सिर से पल्लू अगर सरक जाता तो वह तुरंत उसे संभाल रही थी | इस स्थिति में उसे देख कर मुंह से वाह ही निकल रही थी | कमेंट्स की संख्या सैकड़ों में थी लेकिन कुछ कमेंट्स में उसे बार डांसर बताया जा रहा था तो कुछ में आह भरते ,पेल्विक थ्रस्ट को केन्द्रित करते बेहूदे कमेंट्स भी थे  | अब सोचने की  बात यह थी कि विडियो क्या उस महिला ने इन ( ?!!) लोगों को अपनी कला दिखाने के लिए डाला होगा मुझे तो ऐसा नहीं लगा कि सस्ती!!! लोकप्रियता के लिए उसने इसे डाला होगा क्योंकि डांस किसी घरेलू फंक्शन में किया जा रहा था वार फेर करती महिलाओं को देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता था  |

प्राय: शादी ब्याह में लोग संगीत के कार्यक्रम में नाचते ही है,वे भी जिन्हें नाचना आता है और जिन्हें नहीं आता वे भी | बारात में पुरुषों के डांस को मस्ती नाम दिया जाता है लेकिन महिला के इस डांस को मस्ती नहीं बार डांसर जैसा उपमान दिया गया | चलिए मान लेते है कि कमेंट करने वालों का महिला से कोई रिश्ता नहीं था पर क्या उनके कमेंट्स उनकी कुत्सित मानसिकता बयां नहीं करते? क्या उस महिला का अपना फॅमिली फंक्शन एन्जॉय करना इतना बड़ा गुनाह हो गया ? क्या यहाँ उस शख्स का कोई दोष नहीं जो इसके प्रसारण के साथसाथ भद्दे कमेंट्स को भी प्रसारित कर एन्जॉय कर रहा था और बड़ी सादगी से टाइटल में महिला की कला की तारीफ़ कर रहा था  |  यहाँ कहीं न कहीं संस्कारों की कमी है और जब बोये पेड़ बबूल का तो ....यहाँ तो माँ के द्वारा दी गयी शिक्षा की ही कमी कही जायेगी  |    इन लोगों  की मानसिकता को स्त्री विमर्ष (विमर्श नहीं ) के माध्यम से तो शायद नहीं बदल सकते क्योंकि लेकिन विमर्श के ( जी विमर्श ) के माध्यम से इन की सोच पर लगातार चोट करते हुए सही आकार देने के प्रयास को जारी रखना ही होगा ताकि नेट पर अनुचित प्रसारण के कारण किसी महिला को आत्महत्या जैसा कदम न उठाना न पड़े  |  और ऐसे किसी प्रसारण को अमान्य कर रोकना ही होगा |

Tuesday, February 12, 2013

वसंत की अगवानी में


ओस अमृत का 
आभार प्रकट करने 
चली आई
 नवांकुरों की सेना

सुगंध के 
सौदागर 
बतियाते हैं 
चंपा गुलाब
बेला चमेली से
कि अब तो कैक्टस भी 
अपने व्यक्तित्व के 
विशेषणों से 
उकताया हुआ है
 इसीलिये
 छोटे छोटे फूल लिए 
वह भी खड़ा है
 किसी सम्राट की अगवानी में 
 और बूढ़े पत्ते भेज  रहें हैं
आगे नवोदित अनुजों को
 लाल धारियों वाली पोशाक में सजे
 ये नन्हें 
गर्व मिश्रित लुनाई लिए
 हर किसी से पूछते हैं 
मैं अच्छा लग रहा हूँ ना !!
वहीँ कुछ बीज
 लड़ रहें हैं
 अँधेरे की
 सत्ता से
कि प्रकाशनुवर्ती हूँ मैं
 और प्रकाश को
 मेरे जीवन में 
आना ही होगा
बेशक तेरी सत्ता से
 नाराज नहीं हूँ मैं 
क्योंकि
 तेरी ही गोद मे
 जन्मा है संघर्ष मेरा 
और यहीं पायी है 
ऊर्जा अदम्य साहस
प्रकाश के आँचल में
 प्रतीक्षारत
 अनंत संघर्षों से
 लड़ने के लिए
इसीलिये 
तेरे साथ रहेंगी मेरी जड़े 
जीवनपर्यंत
 जैसे रहती हैं दिल की धड़कन
 जिंदगी के साथ
प्रकाश को पाने की 
व्याकुलता लिए

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