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Tuesday, October 20, 2020

दीवार पार से

 


आकर्षक कैलेंडर भी दीवारों पर उभरे सीलन के धब्बों को छुपा नहीं पाते |


जब इन्हीं दीवारों के साथ मुझे रहना है तो क्यों इनका बदरंग होना मुझे खलता है ? क्यों बार-बार ऐसा लगता है कि दीवार पार रहने वालों की परछाइयाँ धब्बों के रूप में मुझे सताने चली आती हैं ? उनकी कमियां उनकी खामियां सभी कुछ दीवार पर उभर आते हैं | आखिर उनमें कमियां न होती तो ये दीवार हमारे बीच क्यों होती ?


यह सब सोच ही रही थी कि लगा जैसे दीवार की दरारों से शब्द फिसल रहे हैं और अनुरणन करते हुए कमरे में फ़ैल रहे हैं ,स्वर मेरा नहीं है पर शब्द अक्षरश: वही हैं ..... सीलन ...धब्बे .... खामियाँ .... शायद दीवार पार से ...



Tuesday, November 21, 2017

तरक्की

                                 


लगता था रफ़्तार है तो तरक्की है | लेकिन सड़कों के गड्ढ़े लगातार बढ़ रहे थे | नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत याद करते  हम इंतज़ार कर रहे  थे , कि कब आयेंगे अच्छे रफ़्तार भरे दिन | 
अचानक कुछ हलचल दिखाई दी कोलतार, रोड़रोलर और मजदूर .... लगा कि दिन पलटने को हैं लेकिन जैसे-जैसे सड़क उभरने लगी वैसे-वैसे ही उभरने लगे कुछ स्पीड ब्रेकर ...... लोगों ने खुद बनवाये थे .....ज्यादा नहीं हर दूसरे –तीसरे घर के बाद एक ...... 

Sunday, December 28, 2014

प्रशासन

सर्दियों की कुनकुनी धूप का आनन्द लेने मैं छत पर पहुंची तो पास की छतों पर बच्चे पतंग उड़ाने में व्यस्त थे कुछ दूर से  किसी चुनावी सभा की  धीमी-धीमी सी आवाज आ रही थी वहीँ चटाई पर अपने क़ागज फैलाये बिटिया मिनी नशा-मुक्ति सम्बन्धी पोस्टर तैयार करने में लगी थी |
पोस्टर कुछ इस तरह उभर रहा था –सिगरेट के चित्र के पास मानव कंकाल ... सिगरेट रूप में बनी अर्थी ..शराब की बोतल के पास स्वास्थ्य सम्बन्धी चेतावनी और आस-पास कुछ समाचारपत्रों की कतरनें ...जहरीली शराब पीने से बीस मरे .....| आगे एक खबर पर नज़र ठहर गयी जिसमें लिखा था कि फ़ैजाबाद में मेथेनोल के टैंकर से रिसते द्रव को लोगों ने शराब समझ कर पिया इसकी वजह से दस मरे और तीस को अस्पताल में भर्ती किया | टैंकर  पर चेतावनी लिखी होने के बावजूद उक्त हादसा हुआ | विपक्षी नेता सांत्वना देने पहुंचे और प्रशासन की गलती बताते हुए मृतकों के परिवारों के लिए  पांच –पांच लाख रूपये मुआवज़े की मांग की गयी  ...|
पढ़ते ही कौंध गयी कुछ घटनाएं .. बंद रेलवे फ़ाटक पर रेलवे-लाइन  पार करता युवक कट कर मरा ... मुआवज़े की मांग .... रात को बिजली के तार पर तार डालता हुआ युवक करंट लगने से घायल ..प्रशासन से मुआवज़े की मांग |
तभी पार्क से आती आवाज़ कुछ तेज हो गयी थी नेता जी कह रहे थे कि बिजली पानी की समुचित व्यवस्था न कर पाने के लिए यह परशासन  ही दोषी है सड़कों पर अतिक्रमण के लिए भी परशासन ही दोषी है सरकार को चाहिए .......|

मेरा मन  प्रशासन बनाम  पर-शासन की खींचतान में उलझा था   |

Tuesday, October 8, 2013

भागीरथ के देश में


प्राचार्य जी के साथ विद्यालय से निकल के कुछ दूर चले ही थे कि मुखिया जी ने पुकार लिया | बैठक में काफी लोग चर्चामग्न थे |

बढती बेरोजगारी और आतंकवाद के परस्पर सम्बन्धों  से लेकर शिक्षित लोगों के ग्राम पलायन तक अनेक मुद्दों पर सार्थक विचार गंगा बह रही थी |

कुछ देर बाद जब अधिकांश लोग उठकर चले गए तो मुखिया जी ने प्राचार्य जी से कहा –
“वो रामदीन के नवीं कक्षा वाले छोरे को पूरक क्यों दे दी ?”

“मुखिया जी लड़के की स्कूल में 30 प्रतिशत हाजिरी भी नहीं होती और परीक्षा की कॉपियाँ बिलकुल खाली छोड़ रखी थी फिर भला ......”

“मास्टर जी सरकार तो साक्षरता बढ़ाने की बात करती है और आप बच्चों की पढाई छुडवाने में लगे हैं |

“मुखिया जी, साक्षरता के नाम पर ही आठवीं तक बच्चों को फ़ेल नहीं किया जाता | परिणामत:  मेहनत के अभाव में उस स्तर तक  बच्चा सामान्य गणित और अंग्रेजी की बात तो जाने दीजिये , हिंदी में भी अपनी बात अभिव्यक्त नहीं कर पाता और फिर हमें दसवीं का परिणाम भी तो देखना होता है |” मैं बिना बोले न रह सका |

“दसवीं तो फिर देखना..... अभी तो उसे पास करने का ध्यान रखो बस इसीलिये बुलवाया था |” कहकर मुखिया जी ने हाथ जोड़ हमें अपने हाव भाव से विदाई दे दी थी |


अब मैं सोच रहा था कि “क्यूँ भागीरथ के देश में अब कोई गंगा चौपाल की सीढियां तक नहीं उतर पाती|” 

Friday, August 30, 2013

बाड़े


बहुत बरस पहले एक राजा था एक रात उसने एक सपना देखा कि सूरज भरी दोपहर में अपना सुनहरा पीला रंग छोड़ कर लाल हो रहा था एकदम सुर्ख लाल|  राजा अनजाने भय से काँप उठा  सुबह उसने अपनी बिरादरी के लोगों से इस सपने का जिक्र किया पता लगा उन्होंने भी ऐसा ही सपना देखा है |  
मंत्रियों पंडितों से विचार विमर्श कर पाया कि यह किसी परिवर्तन का संकेत है|  
ओह !तब तो जल्द ही कुछ सोचना होगा राजा परेशान हो उठा  | सलाह मशविरा किया तो पता लगा राज्य में कुछ लोगों का जीवन स्तर सामान्य से कहीं बहुत नीचा है इतना कि उन लोगों साँसलेने के लिए भी हवा बहुत कम रहती है इसीलिये गर्मी बढ़ रही है और उनकी गर्म साँसे सूरज को तपाने लगी हैं |  
राजा ने फैसला किया कि उन लोगों को थोड़ी खुली जगह व सुविधाएँ दी जाएँ तो वे लोग भी सामान्य रूप से साँस ले सकेंगे और सूरज को लाल होने से रोका जा सकेगा |
ऐसा ही किया गया और एक बाड़ा बना दिया गया  बाड़े के लोगों को साँस लेने की जगह तो मिल गयी पर मुख्य सड़क पर आने के लिए उनसे पहचान की मांग की जाने लगी और पहचान के रूप में बैसाखी लेकर चलना अनिवार्य कर दिया गया |
उधर जो लोग बाड़े से बाहर सामान्य जीवन जी रहे थे उन्हें लगा कि बाड़े वालों को अधिक महत्व मिल रहा है तो उन्होंने भी राजा से बाड़े में जाने की मांग की  | वे भी बैसाखियाँ लेकर चलने को तैयार थे |  राजा के मन में सपने का भय अब भी था  | इन लोगों को वह पुराने में तो नहीं भेज सकता था इसलिए एक नया बाड़ा बना दिया गया |  बाड़ों की सुविधाओं का प्रचार जोरों पर था अत: साल दर साल नए नए बाड़ों की मांग बढती रही |  बाड़े बनते रहे और नए नामकरण होते रहे नवीनतम बाड़े का नाम बी.पी.एल. रखा गया था |  सब्सिडी ज्यादा थी या नहीं लेकिन सुविधा संपन्न लोग भी इस बाड़े की तरफ अपना साजो सामान उठाये भाग रहे थे और राजा के महल में तरक्की की शहनाई को फेफड़े भर हवा मिल रही थी  |
सूरज लाल तो था पर गर्म नहीं शायद रात आने को थी  |


Friday, June 7, 2013

एक कोना आकाश ...


आसमान में इक्का दुक्का बादलो के टुकड़े...मन की शून्यता जैसे इसी कैनवास पर उभर रही थी . अचानक हलकी सी नींद के बाद मन किसी अनजाने भय से चौंक उठता और नींद पलकों से निकल कर भाग खड़ी होती .
दिन में तो रेडियो का सहारा रहता है किन्तु रात के सन्नाटे मन के अंधेरों को और भी गहरा देते हैं . लगता है चारों ओर कैक्टस उग रहे हैं और न जाने कब कोई एक कैक्टस का टुकड़ा दामन से चिपक जाएगा .यह विचारमात्र शरीर के रोम रोम में चुभन उत्पन्न कर देता है .
बचपन में भी सपने आया करते थे पर उनके रंग इतने हलके न थे .... बहुत से रंग हुआ करते थे उनमें ....तरह तरह के चित्र बना करते थे . समुद्र झील पहाड़ पंछी फूल .....हर शै पूरे उल्लास के साथ गा रही होती थी . और सपने ही क्यों जिंदगी भी पहाड़ी झरने की तरह सरगम बिखराती आगे बढती सी लगती थी .
कभी कभी सोचती हूँ क्या माँ बाऊ जी को भी आते होंगे ऐसे सपने जैसे आज मुझे आते हैं .परेशानियां चिंताएं तो तब भी हुआ करती थीं . संयुक्त परिवार और हर नई जिम्मेदारी पहली वाली से बड़ी हुआ करती थी लेकिन कोई भी अपने सपनों से भागता हुआ नहीं लगता था. छोटे-छोटे उन घरों में हरेक सपने का अपना एक कोना होता था और उस कोने का अपना एक आकाश भी खुद चुरा ही लिया करते थे लेकिन आज यह रिक्तता .....
हर त्यौहार पर घर के लिए कुछ न कुछ खरीद ही लेती हूँ कभी फर्नीचर कभी परदे कभी सजावटी सामान किन्तु घर आने के बाद सब बेरंग बेरौनक लगने लगता .
बहुत मेहनत से परिवार के हर सदस्य को उनके सपनों के पीछे चलने का उत्साह दिया था तब कहाँ जानती थी कि कौन किस सपने के पीछे मन्त्रमुग्ध सा ऐसे चल देगा कि वापस लौटने का रास्ता तक ढूँढ पायेगा ..सिर्फ आवाजें सुनाई देंगी . और शायद बरसों बाद तो वो आवाजें भी नहीं .
.. तो रात में ये पुकार जो उन्हें बैचैन कर देती हैं क्या उन्हीं अपनों की हैं ... नहीं ये उनकी नहीं हैं क्योंकि वो लोग तो अब पुकारते ही नहीं . बस बाते करते हैं वो भी फोन पर सहलाने की ...अपनी मजबूरियों की ..डरते हैं वे कि पुकारने पर कहीं पहले की तरह मैं एक साया बनकर खड़ी हो गयी तो  प्यार से अपना हाथ उनके माथे पर फेरने लगी तो ...  न! न! झुर्रियां पड़े ये हाथ अब उतने मजबूत थोड़े ही रह गए हैं जो मात्र एक अंगुली के सहारे दलदल से निकाल घास के मैदानों में तितली पकड़ने के लिए छोड़ आया करते थे
पानी पीकर फिर से सोने की कोशिश करने लगी . अब बताओ निंदिया रानी तुम्हे मनाने के लिए क्या करूँ ...? लोरियां तो अब याद भी नहीं रहीं एक एक कर सब चुक गयीं ..अ... हाँ याद करने की कोशिश भी नहीं करती भला अपने लिए लोरियां गाता भी कौन है और दूसरे किसी को सुनने की फुर्सत भी नहीं रज्जो की बेटी को भी नहीं .
रज्जो .. काम वाली ...उसकी बिटिया तो खुद समय से पहले बड़ी होने लगी है उसे लोरियां नहीं सुनाई देती बस बर्तनों की खटपट सुनती है एक घर से दूसरे घर भागते हुए माँ के आगे या माँ के पीछे .क्या रज्जो सुनाती होगी उसे लोरियां ? नहीं रात को तो वह  अपने शराबी पिता की गालियाँ सुनकर ही सो जाती होगी .
तुझे सपने आते हैं रज्जो ? एक दिन मैंने पूछा था.
सपने ...!! न बीबीजी सपनों का कहाँ टेम है थक कर नींद कब आई और कब उठने का टेम हो गया पता ही नहीं चलता ...
हाँ ऐसा समय तो मेरा भी था तब घर में जगह कम और प्राणी ज्यादा थे .बड़े होने के नाते कमाने की जिम्मेदारी मुझ पर ज्यादा थी .
अब घर में हर साल दीवारें आयल पेंट से सजती हैं तब सफेदी भी कई बरसों में नसीब होती थी दरवाजों पर महँगे परदे नहीं माँ की इक्का दुक्का कम घिसी साडी टंगी होती थी . न होने पर भी किसी को याद नहीं आता था कि परदे की जरूरत भी है . सब आँखों के परदे को ही महत्व देते थे .
बिना नए कपड़ों के भी दीवाली का उल्लास फूटते अनारों से ज्यादा खिलखिलाते चेहरों पर दिखता था अब तो चेहरों पर कब दीवाली आई कब होली गयी पता ही नहीं चलता
हाथ बढ़ाकर लैंप जलाया देखूं तो क्या समय हुआ है ? चलो तीन तो  बज ही चुके हैं डेढ़ दो घंटों में सूरज का उजाला भी फैलने लगेगा  .
सामने दीवार पर एस .एस . हल्दानकर की पेंटिंग लगी है सीधे पल्ले की साडी पहने तन्मयता से दीप जलाती महिला मनोयोग से रौशनी को बुलाती प्रतीत होती है पेंटिंग का नाम है दैविक लौ . कैसे पायी जाती होगी यह दैविक लौ ?
चित्र गूगल से साभार 
कबीर मीरा रैदास ...क्या सबने वास्तव में कर लिया होगा अपनी आत्मा में परमात्मा का साक्षात् ....हाँ तभी तो डूब कर गाया उन्होंने और आज सदियों बाद भी कोई उन गीतों के पास से गुजर जाये तो रसानन्द के छींटे पड़ ही जाते हैं . तदाकार हो पाए तो शायद पावन डुबकी का सुख भी मिल ही जाए , किन्तु अहंकार इस सुख तक पहुँचाने ही कहाँ देता है ? ये अहंकार भी कितना अजीब भाव है ?जब तक दूसरे के पास है जिद या अभिमान कहलाता है और जब मेरे पास हो तो इसे आत्मसम्मान का दर्जा दे दिया जाता है . सचमुच इसके स्वरूप को पहचानना है टेढ़ी खीर . तभी तो आँख बंद करके खुद में झाँकने से डर लगता है .
आँखे बंद कर ही लूँमैंने सोचा .कुछ ही देर में चकवा चकवी के स्वर सुनाई देने लगे .रात के बिछड़े पंछी एक दूसरे को पुकारने लगे हैं .कितना उल्लास है इनके स्वर में ....कितनी चंचलता . सुबह सुबह ये गहरे भूरे रंग के चकवा चकवी और दिन में इक्की दुक्की गौरैया दिख जाते है दूसरे पंछी तो अब कभी-कभी ही दिखाई देते हैं. कहाँ गए होंगें ? पेड़ पौधे तो रहे नहीं . पहले कितने पेड़ थे कॉलोनी में अब तो घरों की बालकोनियाँ ही सड़कों के ऊपर तक छ गयी हैं पेड़ पौधों की जगह तो 8 -10 फुट के लॉन कमरों में बोनसाई के रूप में सिमट कर रह गयी है .
छुटका भी घर का विस्तार तो करना चाहता है पर बजट ने हाथ बाँध रखे हैं मेरे सामने भी प्रस्ताव तो रखा था पर घर के पुराने स्वरूप के मोहवश मैं चुप ही रही .भाभी व बच्चों को यह चुप्पी खली थी वो उन लोगों के चेहरे पर साफ़ दिख रहा था उनके मूड भी कहाँ तक देखे जाएँ . न तो मैं बच्चों की बुआ थी न भाभी की  ननद  ले देकर छुटके से तुम्हारी बहन कह कर ही संबोधित किया जाता था त्यौहारों पर कहीं बहन को नेग देना होता तो पीछे हाथ बांधकर खड़ी हो जाती तुम्हारी बहन है तुम ही दो. रिश्ता मुझसे कुछ नहीं था लेकिन अगर इनके बच्चे तरक्की नहीं कर रहे तो दोष मेरा होता मैं ही उनके भाग्य की अड़चन ठहराई जाती .
लगता था परिवार की परिभाषा ही बदली है पर एक इकाई तो रह ही जाउंगी .लेकिन रिश्तेदारों ने भी इकाई सा मानने से इनकार कर दिया है तभी तो किसी भी न्यौते के कार्ड पर मेरा जिक्र तक नहीं होता सोचते सोचते खिड़की में आ बैठी थी. जहाँ से बगीचा दिखाई देता है तराशे हुए पौधे हैं जिनकी देखभाल माली करता है फिर भी रंगत नहीं दिखाई देती. बसंत की ऋतु के आने जाने का भी आभास नहीं हो पाता . पता नहीं मन का पतझड़ है या मौसम की चाल बदल गयी है .उस दिन माली को टोक बैठी थी – इन पौधों में देसी खाद लाकर डालो . पर माली से पहले ही छुटका बोल पड़ा – दीदी आप दूसरों के काम में क्यों दखलंदाजी करती हो उसे भी तो अपने काम की नॉलेज होगी
शायद छुटके के कहने का असर तो न होता पर उसके बच्चों को फिस्स से हँसते देख मन खट्टा हो गया था ...माना नई तकनीक के साथ कदम ताल करने की हिम्मत नहीं बची लेकिन आई .क्यू. लेवल तो आज भी नए ज्ञान को अपना सकने का सामर्थ्य रखता है ...दोष बच्चों का है या माता पिता के संस्कारों का .

बगीचे में आज ताजा खिले किसी फूल को तलाशने लगी रात बीत चुकी थी सपना बीत गया था लेकिन मन तनाव से बोझिल था . फिर आँखे मुंदने लगी और एक चित्र तैर गया नवरात्रों के पंडाल ...बेहद खूबसूरत मूर्तियाँ और कलकत्ता के पंडालों में देवी की मूर्तियों के साथ मदर टेरेसा की मूर्ति ....!!! हाँ कर्म से मदर टेरेसा कलकत्ता वासियों की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में माँ के नाम से जानी जाती हैं .
अचानक लगा कि रात के प्रश्न हल हो रहें हैं सपनों को दिशा मिल रही है और अब जागती आँखों से देख रही हूँ एक आश्रम का सपना जहाँ मेरी तरह कुछ पेंशन प्राप्त व्यक्ति अनाथ और असहाय लोगों के कल्याण के लिए योगदान देंगे . दैहिक और दैविक परिवार से इतर एक दुनिया  और  सपनों के आकाश का एक अपना कोना....  

Thursday, May 9, 2013

काम वाली



उफ़ ! ये सरला कहाँ मर गयी ....दस बजने को आये...सारा काम पड़ा है अब तक नहीं आई

कुछ परेशानी ही होगी वर्ना रोज तो टाइम पर आ ही जाती है मि. शर्मा ने पत्नी से कहा

उंह! टाइम पर .... जब जी चाहे छुट्टी मार लेती है कभी पति के बहाने कभी बच्चों की बीमारी के ...

मेरे ख्याल से तो कई महीनों बाद यह नौबत आई है  मि. शर्मा ने समझाने के लहजे में कहा
बहुत पक्ष लेते है आप उसका ... अब टोस्ट सेको और चाय भी बना लेना मैं तो  वैसे भी लेट हो रही हूँ ....आँखे तरेरती मिसेज शर्मा ने कहा और जल्दी जल्दी तैयार होने लगी

तैयार होकर मिसेज शर्मा ऑफिस पहुँची तो साढ़े ग्यारह बज रहे थे

बॉस के केबिन पहुँचकर लम्बी सी मुस्कान चेहरे पर लाकर अभिवादन किया
मिसेज शर्मा कल कहाँ थी आप ?

वो .. वो सर ...मेरे पति की तबि ..
.
आज भी आप साढ़े ग्यारह बजे तशरीफ़ ला रही हैं आपके सीट पर ना होने से लोगों को कितनी तकलीफ होती है जानती हैं

सॉरी सर ....कहते हुए मिसेज शर्मा ने आज और पिछले दिन के दोनों कॉलम में साइन किये और सीट पर आ बैठीं

कल क्यों नहीं आई ? एक सहकर्मी ने पूछा

अरे यार!.... पिक्चर का मूड बन गया था  

Sunday, October 14, 2012

कैसे



श्राद्ध पक्ष में पितृ-पूजन आदि की प्रक्रिया देख चुनमुन ने दादा जी से पूछा ...
दादा जी !यह जल इस तरह क्यों चढ़ाया जाता है ?




बेटा यह स्वर्ग में हमारे पितृ पूर्वजों को प्राप्त होता है ....

 "...कैसे..."

बेटा यह एक तरह से अपने पूर्वजों को धन्यवाद देने का तरीका है ...प्रकृति के अनमोल उपहार ,ये संस्कृति  और ये थाती जो उन्होंने हमें सौंपी है हम उन्हें उसके लिए धन्यवाद देते हैं ...

लेकिन दादाजी हमारी मैडम कहती हैं कि आज जिस तरह पानी का दुरूपयोग हो रहा है तो धरती से पानी जल्दी ही ख़त्म हो जाएगा ...

हाँ बेटा वो ठीक कहती हैं

तो फिर हम अपने पूर्वजों को धन्यवाद कैसे दे पायेंगे .....? 

Sunday, October 7, 2012

न दैन्यं न पलायनं



चित्रा !आज फ्री हो ?.....तुम्हारी बेटी तुमसे मिलना चाहती हैइरा ने फोन पर  बताया .
ओह नव्या !वो कब आईमैनें पूछा तो दूसरी तरफ से पुलकित नव्या का स्वर सुनाई दिया ...मौसी मिलकर बात करेंगे मेरी पसंद का खाना तैयार रखना .
खाना तैयार करते हुए सब कुछ एक फिल्म रील की तरह चल रहा था –
चित्रा दी !चित्रा दी !जल्दी दरवाजा खोलिए .
यह रेवा की आवाज थी ,घड़ी की ओर देखा रात के साढ़े दस बजे थे .दरवाजा खोला तो वो कुछ घबराई सी लगी .
घर चलो और अपनी सहेली के हाल देखोकहते हुए उसने सामने पड़ा बैग व स्टेथोस्कोप उठा लिया .एक बारगी तो मैं कुछ समझ नहीं पायी लेकिन जल्दी ही इरा का चेहरा सामने घूम गया, शायद उसके पति ने मार पीट की होगी यंत्रवत कदम उनके घर की ओर बढ़ गए . घर पर ताई (इरा की माँ )भी बैचैन दिखाई दी अरुण चाचा जो कि हमारे पडोसी हैं इरा के पास बैठे दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे .बदहवास सी पड़ी इरा की फटी फटी आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे .
देखते ही समझ आ गया कि शारीरिक आघात सहते रहने की आदी हो चुकी इरा इस बार विशेष मानसिक पीड़ा से जूझ रही है .दवाइयों के साथ नींद का इंजेक्शन दिया था, कुछ ही देर में इरा सो गयी .
बाहर के कमरे में पहुंची तो ताई का स्वर उभरा कंवर साहब को फोन कर देना चाहिए.
उस जल्लाद को !जिसने नन्हीं सी बेटी के साथ इरा दी को मौत के मुँह में धकेल दिया यह तो अरुण चाचा की नज़र पड़ गयी वर्ना तुम खुद अपनी बेटी का चेहरा देखने को तरस जाती रेवा ने चिढ़कर कहा .
तू खुद तो घर बसाने की सोचती नहीं उसे भी सही रास्ते पर मत चलने दे .ताई का स्वर ऊँचा हो गया था .
मैंने रेवा को चुप रहने का इशारा किया .मैं चित्रा दी के घर जा रही हूँ .कहकर रेवा ने बैग उठाया और मेरे साथ चल दी .
मैं जानती हूँ रेवा के जिस आक्रोश को मैंने रोका है वो अब मेरे सामने फूटेगा . ताई की नज़र में रेवा एक बिंदास लड़की है जिसे घर परिवार में रहने का सलीका नहीं आता. लेकिन हमारा नजरिया कुछ और है . भला जो लड़की घर बाहर के काम फुर्ती और सफलता से निपटाती है पढने लिखने में अव्वल हो पास पड़ोस वालों से सहृदयता से पेश आती हो उसे परिवार में रहना नहीं आता ,यह मानने वाली बात नहीं है , हाँ गलत बात को बर्दाश्त करना उसके बस की बात नहीं .घर के काम तो वह इतनी अच्छी तरह निपटाती है कि खुद ताई भी फूली नहीं समाती लेकिन उसके शादी न करने के फैसले से ताई दुखी हैं .
इरा की गृहस्थी को उदाहरण बना कर रखते ही रेवा और ताई के ग्रह एक दूसरे के विपरीत हो जाते हैं .
हमारे घर आते ही रेवा फफक कर रो पड़ी –जानती हो चित्रा दी आज उन लोगों ने इरा दी को इस ठिठुरती रात में दस बजे घर से बच्ची के साथ बाहर निकाल दिया .
इरा दी बेसुध सी रेल की पटरियों पर चल रही थी कि अरुण चाचा ने देख लिया और किसी तरह घर ले आये और अब माँ उन लोगों को ही फोन ......कहते कहते रेवा हथेलियों से मुँह ढक कर सिसकने लगी थी
कोफ़ी पी कर कुछ देर हम चुपचाप बैठे रहे .
हम सुबह इरा से बात करेंगे तुम फिलहाल उसकी सेहत का ध्यान रखो और ताई जी से बहस करने की कोई जरूरत नहीं .कहकर मैं रेवा को घर छोड़ आई .
बारह बज चुके थे और मेरी आँखों से नींद पूरी तरह से गायब थी .इरा और रेवा में बस सहनशीलता का ही अंतर था वरना दोनों खूबसूरती पढाई और शालीनता की मिसाल थी .रेवा जहाँ हर गलत बात का विरोध दृढ़ता से करती थी वहीँ इरा समझौते की राह में विश्वास करती थी .
विवाह से पूर्व लेक्चरर थी इरा ,पति के शक्की मिजाज के कारण नौकरी छोड़ी और दिनोदिन घरेलू समस्याओं में समझौते की राह पकड झुकती रही .जिन समस्याओं से वह किनारा कर रही थी वही सब उसे इस कायरतापूर्ण मार्ग पर धकेल ले गयीं थी .
इरा के बारे में सोचते सोचते ही नींद आ गई . सुबह इरा का हाल जानने पहुंची तो लगा पहले से कुछ ठीक है लेकिन रात के घटनाक्रम को लेकर शायद शर्म महसूस कर रही थी .टूटे हुए मन को जोड़ने का वक्त अभी नहीं आया था . उधर रेवा और ताई जी रात की सम्बन्धियों को खबर करने की बात को लेकर फिर उलझ गए थे .
चित्रा दी ! आप ही बताइए जब उन्हें इनकी जरूरत ही नहीं तो .........
रेवा ! हम लड़की वाले हैं आखिर हमें ही झुकना ...........
कब तक ताई जी कब तक ....... न चाहते हुए भी मुझे दखल देना पड़ा .आपकी इसी सोच ने रात को आपकी बेटी को कहाँ पहुंचा दिया था , अब तक आने उसके मन की सुध नहीं ली और फिर वही सब दुहराना चाहती हैं.
तुम लड़कियां यह क्यों नहीं समझती कि दुनिया जीने नहीं देगी , यही कहेगी कि लड़की में ही कोई खोट है ताई ने प्रतिवाद किया .
ताई जी !जिस राह पर वह रात चल पड़ी थी , उसके बारे में दुनिया क्या यही नहीं कहती ?
इतने कानून बन जाने के बाद भी ये पढ़ी लिखी महिलायें ..... रेवा अब भी आवेश में थी .
रेवा क़ानून समाज को सुधारने का मार्ग जरूर है पर जब उसे तोड़ मरोड़ कर गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है तो समाज को सही दिशा मिलने के बजाय उच्छृंखलता ही बढती है देखती नहीं किस तरह अदालतों में केसों के ढेर बढ़ रहे हैं... इस बार इरा का स्वर सुनाई दिया .
लेकिन दीदी इस तरह विरोध न करके बार बार सिर झुका कर क्या हासिल होने वाला है ? रेवा ने प्रश्न किया .
इस समाज ने नारी को देवी कहकर उसे अपनी संस्कृति और गौरव की रक्षा का भार सौंप रखा है .इस गौरव को वह उतार कर फेंक नहीं सकती और न ही केवल कानून उसे सम्मान दिला सकता है नदी की मंजिल तो सागर ही है .
सच कहती हो इरा किन्तु  क्या तुम्हें नहीं लगता कि यदि नदी समुद्र में समाहित हो कर अपना अस्तित्व मिटा देने के लिए लालायित रहती है तो केवल इसलिए कि सागर उसे अपनी विशालता के बल पर बाँधने में समर्थ है .छोटी मोटी तरंगों की बात तो जाने दो चंद्रमा के आकर्षण से उठने वाले ज्वार को भी समुद्र थामे रहता है फिर कोई नदी उससे अलग नहीं हो सकती . रही संस्कृति की बात तो वह कहती है न दैन्यं न पलायनं .... फिर चाहे नदी रूप में जीवन बांटती चलो या समुद्र संग मोती सिरजो .

 न दैन्यं न पलायनं..... दोहराते हुए इरा ने नन्हीं नव्या को सीने से लगाते हुए बाहों में समेट लिया . चेहरे की दृढ़ता ने जता दिया था कि वह अब इस बच्ची के लिए नौकरी भी करेगी और आत्मसम्मान से जियेगी भी .
डोरबेल बज उठी थी .बाहर निकल कर देखा तो नव्या एयरफोर्स ऑफिसर की यूनिफ़ॉर्म में खड़ी थी सेल्यूट मार कर ,मौसी .... कहते हुए मुझसे लिपट गयी . ओह नव्या ...मन प्रफुल्लित हो उठा था उसे देखकर . इरा का दृढ विश्वास से देखा गया सपना पूरा हो गया था                  
   यह कहानी रचनाकार पर भी  
http://www.rachanakar.org/2012/09/94.html                         

Saturday, April 28, 2012

वाणी



घर में शादी की तैयारी चल रही है .सभी लोग काम में लगे हुए हैं . दादी के कमरे के एक कोने में खिन्नमना बन्नी वाणी बैठी है और दूसरी ओर कुछ बच्चे दादी को घेर कर बैठे हैं कहानी सुनने के लिये .

.....दरवाजे पर दो-दो बारातें एक पिता की बुलाई हुई और दूसरी भाई की तय की हुई .दोनों बारातें सशक्त राजपरिवारों की .किसी को भी लौटाना संभव नहीं ...ब्याह के नगाड़े युद्ध के नगाड़े बनते देर नहीं लगती थी उन दिनों .....बात राजकुमारी कृष्णा तक पहुंची ....राज्य की आन पिता और भाई का मान बचाने के लिये राजकुमारी कृष्णा ने  हीरे की अंगूठी निगल ली ......आत्मोत्सर्ग कर दिया राजकुमारी ने ...देशहित .....परिवारहित....


 


कहानी के कुछ-कुछ अंश वाणी के कानों में पड़े थे .विचारों का झंझावात चल रहा था .....परिवार हित ....!! ब्याह हो रहा है वाणी का या सौदा किया जा रहा है.... अच्छे परिवार के लड़के से रिश्ता जोड़ने की कीमत दी जा रही है ....जमीन बेचकर गाड़ी और नगदी का इंतजाम किया जा रहा है .....
दुल्हन की इच्छा का तो पहले भी कोई मोल नहीं था और पढ़-लिखकर भी  क्या कुछ नहीं बदल पाई नारी ? नहीं ...वह अपने पैरों पर खड़ी है . वह स्वीकार नहीं करेगी यह मोलभाव .... यह जमीन उसके परिवार की आजीविका है ..वह उसे नहीं बिकने देगी . जो व्यक्ति  बिना दहेज के उससे विवाह नहीं कर सकता वह वाणी का सम्मान करता है या गाड़ी नगदी का ...
...नहीं अब अपने और अपने परिवार दोनों के ही 
सम्मान की रक्षा वह करेगी , लेकिन राजकुमारी की तरह नहीं ..अपने तरीके से ...नए तरीके से ...लौटा देगी ऐसे रिश्ते को दरवाजे से जो उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा रहा है ...
अपना निर्णय परिवार वालों को सुनाने के लिये तैयार है वाणी .








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Saturday, April 14, 2012

नाम दोष



आजादी के वक़्त की बात है चेतना ने  दो बच्चों को जन्म दिया और बड़े प्यार से उनका नाम रखा ... अधिकार और कर्तव्य . पहले अधिकार जन्मा फिर कर्तव्य . 
चेतना ने हमेशा दोनों सहोदरों को एक सा प्यार और पालन पोषण दिया लेकिन   अधिकार लोगों को अधिक आकर्षक लगा तो जनता का दुलारा बन अच्छा फूला-फला . शुरू-शुरू में तो कर्तव्य ने भी काफी हाथ पैर मारे कि उसे भी कुछ मिल जाये पर....
उधर चेतना भी दुर्बल हो रही थी तो उसका साथ भी कितने दिन मिलता इसीलिये  धीरे-धीरे भाग्य की दुर्बलता मान उसने गुमनामी को स्वीकार कर लिया था . दूसरी ओर  अधिकार का व्यापार अच्छा चल निकला और अब शहर ही नहीं देश-विदेश में भी अनेकों संस्थाएं उसके नाम से विकसित हो रही थी जिनकी चर्चा अख़बारों में अक्सर पढ़ने को मिल जाती थी .
अधिकार की नई पीढ़ी पर भी भाग्य का वरद हस्त रहा  लोगों ने उन्हें राजा का बेटा कहकर पता नहीं भय से या सम्मान से सदा ही शीश नवाया . शायद .... समरथ को नहीं दोष गुसाईं....मानकर
एक दिन एक ढाबे पर एक छोटे से बच्चे को चाय पकडाते देखा . बड़ा ही मासूम और प्यारा सा ....देखा कि लोग उससे हंसी ठट्टा कर रहे थे और चिढा रहे थे देखो इसका नाम भी अधिकार है देखो यहाँ बर्तन मांज रहा है अधिकार... उत्सुकतावश मैंने उस बच्चे से पूछा तुम्हारा असली नाम अधिकार ही है ! 
उसने कहा हाँ.
 ...उसके नाम में दोष है.... वहीँ बैठे किसी ज्योतिषी ने कहा
मैंने पूछा कैसे?  
उन्होंने कहा अधिकार के साथ शिक्षा भी जोड़ दिया है ना इसलिए दोष है .(अधिकार शिक्षा का )
तुम्हारा नाम किसने रखा? मैनें बच्चे से पूछा.
बाबा ने उसने उत्तर दिया
और तुम्हारे बाबा का नाम?”
कर्तव्य....  इतना कहकर वह  जूठे गिलास समेटने लगा .




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