Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Sunday, February 20, 2022

हर चुप्पी तो....

 बेशक

आसमां ने मौन रहकर

 दी है सहमति मेरे सपनों को 

और धरती ..

हां उसने भी 

चुप साध ली है

न वो दर्द बयां करती है

न मैंने समझने की

 कोशिश ही की

उसकी चुप्पी भी

सहमति में ही गिनी मैंने

पेड़ की चुप्पियों से

आरियों की धार

तेज होती रही

झुकी डालियों ने

लुटा दी 

समस्त संपदा अपनी

उनका मौन भी 

सहमति में शुमार हुआ 

पर हर चुप्पी तो 

सहमति नहीं होती !!

-वंदना

Wednesday, April 8, 2020

मैं मुट्ठी में जुगनू भरकर
सौदा सूरज से करती हूं
धता बताऊं तृष्णा को मैं
ऐसे साधन भी रखती हूं
बटुए में आशाएं रखकर
फुटकर सपने आंचल बांधे
कुलदीपक को सिखलाऊं मैं
कैसे अपनी राहें साधे
श्रम के सीकर जिसे सींचते
उस पथ से रोज गुजरती हूं
मैं मुट्ठी में.....
आवां की गोदी में तपकर
शीतलता बरसाने वाली
आंसू का खारा जल पीकर
अपनी प्यास बुझाने वाली
होंठों पर मुस्कान सजाए
डलिया में दिनकर रखती हूं
मैं मुट्ठी में जुगनू भरकर सौदा सूरज से करती हूं

_ वंदना

आदरणीय Kailash Meena जी की वाल के चित्र से प्रेरित

Friday, August 9, 2019

मां

कैसे कह दूं
कि समय के फ्रेम में
अब नहीं हो तुम
तस्वीरें
जो कैमरे में क़ैद
नहीं हो पाईं
मूल रंगों में
मेरे आस-पास ही रहतीं हैं
घर की देहरी पर
प्रतीक्षा में
मुस्कुराती तुम
मेरी पहली कविता
छपने पर
आंसुओ के
मोती बिखराती तुम
आरती के
थाल के उस पार
दीये की लौ सी
दिपदिपाती तुम
संघर्ष के पलों में
पीठ सहलाती हुई तुम
अनगिनत रूपों में
मेरे पास ही रहती हो मां
समय के हर फ्रेम में
तुम्हीं रहती हो
_वंदना

Friday, July 19, 2019

चाह



अगले जनम भी
कतई नहीं बनना
मुझे अमरबेल
न लाजवंती
न सूरजमुखी
कतई नहीं
हां बनना है
कोई पौधा
चाहे कास का
या फिर हरी दूब
हथेली पर ठहरी हुई
शबनम लिए

_वंदना

Sunday, December 31, 2017

आगत के स्वागत में

आने वाला पल मुट्ठी में , लाया है पैगाम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये

धुंध में लिपटे रहें सवेरे , तू आशा की ज्योत जला  
नई राह चलते साधक की , कदमताल से ताल मिला
मौसम तेरे हक में राही , लायेगा परिणाम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये
खेतों से रूठे बेटों के , हाथों में विश्वास लिखें
लोकचेतना की कूँची से, चिरंजीव मधुमास लिखें
वंचित जीवन के हिस्से भी , ले आयें सुखधाम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये

गतिविधियाँ हों नई नई सब , जीवन के सब बोध नये
परम्परा आँचल में बांधें , हों मानस के शोध नये
शुद्ध भाव से आपूरित हों चिंतन के शुभ काम नये
आगत के स्वागत  में ढूँढे  , हँसी-ख़ुशी आयाम नये

Thursday, February 11, 2016

कोहरे के पार ...वसंत


अलसाई सी कुछ किरणें
अंगड़ाई ले रही होंगी
या फिर 
घास पर फैली ओस
बादलों से मिलने की होड़ में
दम आजमा रहीं होंगी
वो तितलियाँ
जो धनक पहन कर सोई थीं
अपनी जुम्बिश से
आसमां में रंग भर रही होंगी
आखिर
तिलिस्म ही तो है 
कोहरा
अपनी झोली में
न जाने
क्या कुछ छुपाये होगा  
उस पार
शायद वसंत होगा

Friday, May 15, 2015

न डर तू सलोनी....




बहुत तेज है धूप संसार की
सुलभ छाँव तेरे लिए प्यार की
उदासी मिटा वेदना मैं हरूँ
अरी लाडली तू बता क्या करूँ

व्यथा पीर आये सताए मुझे
मगर आँच छूने न पाए तुझे
न डर तू सलोनी कि मैं साथ हूँ
धरे आज काँधे सबल हाथ हूँ

सुना था कि कहते तुझे सब सदय
धरा जब हिली तो न कांपा हृदय
बता लेख कैसे विधाता लिखा
कहीं क्रूर कुछ भी न तुझको दिखा

सरलमन बहन तू सरस काव्य है
मधुरतम प्रियंकर व स्तुत भाव्य है
बड़ा तो नहीं मैं मगर  भ्रातृ हूँ
सुरक्षा वचन से बँधा कर्तृ हूँ 

              -वंदना 






चित्र गूगल से साभार 
इस चित्र पर कविता आयोजन भी नेट से साभार 

Monday, January 26, 2015

फासले भी हैं जरूरी

मीत बनकर ये खड़े हैं शीत पावस घाम
पंक्ति पौधों की सुहानी दृश्य मन अभिराम
धडधडाती रेल गुजरे गूँजता जब शोर
पटरियों की ताल पर हों वृक्ष नृत्य विभोर


पटरियां रहती समांतर क्षितिज की है खोज
सह रही घर्षण निरंतर धारती पर ओज 
दूरगामी पथ सदा वो जो धरे वैराग
फासले भी हैं जरूरी हो भले अनुराग


रूपमाला छंद 

Sunday, January 18, 2015

अच्छे दिन ……


नवकोंपलों के स्वागत में
देह भर उत्साह से उमगते
कण-कण को वासन्तिक बनाने में
हर पल विषपान कर
प्राणवायु उलीचते
कर्तव्य हवन में
स्वयं समिधा बन
जो पाया उसे लौटाते
पात-पात तिनका-तिनका
'इदं न मम' कहकर
आहुति देते  
देव ,ऋषि 
और पितृ ऋण से
मुक्त होना सिखलाते
ये वृक्ष पूछा करते हैं
कि ऋणानुबंधों की 
सुनहरी लिखावट की  
स्याही में डूबे
क्या कभी आया करते हैं
अच्छे दिन !


चित्र गूगल से साभार 



Saturday, November 29, 2014

राह भूली इक कली

संसार कैसा मैं भला कुछ ,क्या कहीं थी जानती
घर से अगर निकली अकेली ,दोस्त सबको मानती
हाँ तैरते सपने सितारे ,चाँद आँखों में बसा
यूँ चल पड़ी बस सामने हो जग अनोखा रसमसा

थे पंख कोमल घोंसले से मैं कभी निकली न थी
है छोर दूजा भी गली का जानती पगली न थी  
अब चिलचिलाती धूप देखी चीरती मुझको हवा
आकर कहीं से गोद में ले दे मुझे तू ही दवा

माँ ढूँढती होगी विकल तू राह भूली यह कली
थकना नहीं मुमकिन कि जब तक ना मिले नाजो पली
वो लोरियाँ जब गूँजती है दिल समाये मोद है
सबसे सुरक्षित माँ मुझे तब खींचती यह गोद है


(हरिगीतिका छंद  )

चित्र नेट से साभार 

Thursday, November 20, 2014

बंधन

(1)

छटपटाकर निकली
घूंघट
और
बुर्केनुमा
कोकून से बाहर
अब खुश हैं
हाथों पर दस्ताने
और चेहरे पर
स्कार्फ लपेटे
तितलियाँ

(2)

उन्हें भी
कहाँ सुकून देते हैं
ये तराशे हुए बगीचे
फिर-फिर 
बुलाते हैं
बेतरतीब फैले जंगल
जंगल पर खुला आसमान
लेकिन लौटकर दुबक रहीं हैं
चिड़ियाएँ
बाज के पैंतरे देखकर



चित्र गूगल से साभार 

Sunday, January 5, 2014

पापा कहते हैं बड़ा काम करेगा


अब भी झांकती हैं
चश्मे के पीछे से वर्जनाएं
अभिलाषाएं आज भी
क़ैद हैं मुठ्ठियों में
जिन्हें बगल में दबाये
खड़े होते हो तुम
परछाइयों की तरह
कि जब भी चाहता हूँ कोई
लक्ष्मण-रेखा लाँघना
सोचता था हो जाऊँगा बड़ा
इतना कि मेरा बेटा
नहीं ताकेगा पडोसी की
लाल साईकिल
भरा रहेगा फ्रिज
चाकलेट टॉफी से
व कमरा उन खिलौनों से
जिन्हें हम देखा करते थे दूर से
कमरा आज वाकई भरा है
खिलौनों से
जहाँ तुम्हारा लाडला पोता 
बैठा है रूठा हुआ
कि दिलवाया नहीं प्ले-स्टेशन
और ना ही देता हूँ उसे
स्कूटर चलाने की इजाजत
क्योंकि महज सातवीं में है वो
और कमरे की दहलीज पर
अपनी ऊष्मा से
बर्फ पिघलाते हुए तुम
उसे सहलाते समझाते
दे रहे हो सांत्वना मुझे
कि कामनाओं के असीम आकाश से
अनुकूल सितारे चुन लेना ही
होता है
बड़ा काम

Friday, October 11, 2013

परंपरा और परिवार

स्वस्थ परम्पराएं
तराशती हैं
परिवार
ठीक वैसे  ही
जैसे बेतरतीब
किसी जंगल को
सांचे में ढालकर
दे दिया जाता है
रूप सुन्दर बगीचे का
परम्पराएं
होती हैं पोषित
देश और काल के
अनुशासन में
निरंतर
समष्टि के चिन्तन से
बांधती हैं
मर्यादित किनारे स्वच्छंद नद नालों के
और
बचा ले जाती है
क्षीण होने से
किसी धारा को
तभी तो
शिव कही जाती हैं
परम्पराएं  !!!

Saturday, August 24, 2013

इक दर्पण रहे तो ...!!

संबंधों के बीच  

इक दर्पण रहे तो कैसा हो

जो तोड़ता हो दर्प को

बस

ऐसा हो  

करें कभी हम शिकायत
 
हमें चेहरा दिखा दें

रिश्तों की आजमाइश में

पलटकर मुँह चिढ़ा दें

और जो टूटे कभी तो

उसकी किरचियाँ

मेरे कद पर

मेरे किरदार पर

बढ़ चढ़ के बोलें

चाहे कुछ भी हो जाये

मगर बस सच ही तोले 


Saturday, August 10, 2013

नीम निमोली गदराई

 


                 
पाती सावन की आई
नीम निमोली गदराई

थिरक रहे मन मोर कहीं
कहीं झूमे प्रेम हिंडोले
रोमांच हुआ धरती आँगन
भीगे कंठ पपीहे बोले
मेहँदी राचे हाथ सखी
झूलों ने पेंग बढाई
पाती सावन की आई
नीम निमोली गदराई

हो रहे हवा के चपल पंख
मुख कोयल के रसधार बहे
चांदी के घुंघरु बांधे दूब
बिजुरी ने हाथों साज गहे
मल्हार राग गूंजे सितार
 हर शाख नाच इतराई 
पाती सावन की आई
नीम निमोली गदराई
-वंदना

Thursday, April 11, 2013

रिक्त पात्र लिये


सुना है
आकाश तक जाती हैं
सीढियां कामनाओं की
आकाश
वह तो शून्य है
फिर क्या लाते होंगे
अपनी झोली में भरकर
वे जो जाते हैं
चढ़कर
सीढियां कामनाओं की  
शून्यता !!!
हाँ शून्यता ही तो होगी वहां
जहाँ पहुंचकर
व्यक्ति अकेला रह जाता है
शीर्षतम सिरे तक तो कोई पहुंचा नहीं
क्योंकि
सुना नहीं
किसी की कामनाओं का
पूर्ण हो जाना
और
ऊर्ध्व गति में
जो पीछे छूट जाता है   
वह होता जाता है
छोटा और छोटा
और अंततः
अदृश्य
इस शून्यता और अदृश्यता के बीच
खड़ा भी कैसे
कोई रह सकता है
रिक्त पात्र लिये


Monday, February 4, 2013

तपस्विनी तू



सांय सांय गूंजेगी

आंगन में तेरी प्रार्थनाएं

तेरे मन्त्र

बाँधा था कवच

कीला था काल

अनगिनत

अदृश्य ताबीजों में

तेरे आशीष

तेरी दुआओं से

सराबोर

मेरी रूह

तुझे बुलाना चाहती है

मनीप्लांट चुपचाप 

लिए बैठा है मंजीरे


तुलसी

तेरी मौन तपस्या में

स्वर मिलाना चाहती है

कहाँ सो रही है

चिरनिद्रा में लीन 

सनातन

शाश्वत 

तपस्विनी तू   

( श्रद्धा सुमन नानी के लिए )

Followers

कॉपी राईट

इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं