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Tuesday, March 24, 2020

सर्वे संतु निरामया:

पिछले दिनों एक शब्द ‘अनुनाद’ बहुत सुनने को मिला | लोगों के अलग अलग विचार भी पढने को मिले तो लगा कि विज्ञान में पढ़े इस शब्द को फिर से समझा जाए | दो उदाहरण याद आते हैं एक रेडियो का और एक सैनिकों की ट्रेनिंग का |
रेडियो पर हम पसंदीदा कार्यक्रम सुनने के लिए उसे एक विशेष आवृत्ति पर सेट करते हैं | रेडियो स्टेशन से प्रसारित आवृत्ति और रेडियो सेट की आवृत्ति एक होने की दशा में ही हम मनपसंद प्रोग्राम सुन पाते हैं |
सैनिकों को ट्रेनिंग देते वक़्त यह कहा जाता है कि पुल खासतौर पर निलंबित पुल से गुजरते वक़्त वे एक सी कदमताल न रखें क्योंकि पुल की अपनी एक आवृत्ति होती है और अगर वह आवृत्ति कदमताल की आवृत्ति के समान हो जाए तो पुल के टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है| ओपेरा गायकों के गाने से कांच के गिलास के टूट जाने की घटना भी अनुनाद से ही सम्बंधित है |
अनुनाद एक ऐसी घटना है जो अपने प्रभाव के घटित होने के लिए समान आवृत्ति की मांग करती है यानि अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग तो अनुनाद के घटित होने के लिए अप्रभावी है |
अब बात करें अध्यात्म की जो ध्यान की वकालत करता है | ध्यान में हमारे दिमाग के कम्पनों की आवृत्ति ब्रह्माण्ड के कम्पनों की आवृत्ति से एकरूप (तन्मय) हो जाएं तो साधक परमानंद की अवस्था प्राप्त कर लेता है |
अनुनाद का परिणाम आनंददायी भी हो सकता है और विध्वंसात्मक भी | मेरा इस पोस्ट को लिखने का कारण है कि सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को मूर्ख साबित करने का जो कम्पीटीशन चल रहा है वो भयानक है |जब हम किसी दूसरे को मूर्ख कह रहे होते हैं तो अगले के दिमाग में तरंगें ही उत्पन्न कर रहे होते हैं | अब दो विरोधी विचार रखने वालों की प्रतिकारात्मक तरंगें तन्मय हो कर विध्वंस ही पैदा करेंगी क्योंकि मूर्ख शब्द तो कॉमन है शब्द के प्रति उठने वाली भावनाओं की तरगें भी कॉमन हैं तो इन तरंगों का समान आवृत्ति हो जाना भी एक सामान्य घटना होगी और अनुनाद के रूप में विध्वंसात्मक घटना |
बहुत पीड़ा होती है जब देखते हैं कि महिलायें करवाचौथ पर जिस तरह एकत्र होकर कहानी सुनती हैं उसी तरह  कोरोना वायरस कथा का सीन वायरल हो रहा है ,कहीं सामूहिक गीत गायन हो रहा है | विभिन्न चैनल  जनता कर्फ्यू के दौरान  25 -30  लोगों को एकत्र कर कवरेज दे रहे हैं | अपने आसपास 20 लोगों का सैंपल चेक कीजिए अधिकतर लोगों ने घंटियाँ शंख इत्यादि कोरोना को भगाने के लिए बजाये न कि मेडिकल और प्रशासनिक कोरोना योद्धाओं के लिए | लोगों की गलतियाँ क्षम्य हो सकती हैं क्योंकि आज भी शिक्षित वर्ग के ग्रुप्स में तथाकथित चमत्कारों को 5-7 ग्रुप्स में फॉरवर्ड करने के उदाहरण सामने आते हैं तो शिक्षा पर सवाल उठते हैं |पर समाचार चैनल भी अपना दायित्व नहीं समझते ?? उनका यह प्रस्तुतिकरण उनकी गैर जिम्मेदारी को बताता है |
आइये इस मुश्किल समय में सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः के एक समान मन्त्र(विचारों) के अनुनाद से हम मानसिक शक्ति एकत्र कर इस कष्ट से मुक्ति पायें |मज़ाक में भी अन्धविश्वास और अफवाहों को बढ़ावा देने वाले  विडियो फॉरवर्ड न करें |यथा संभव घर रूककर प्रशासन की मदद करें देश के प्रतिबद्ध सिपाहियों की तरह सबको सुरक्षा दें |
एक बार फिर मेडिकल और प्रशासनिक टीम के रूप में डटे योद्धाओं को नमन |

Sunday, February 25, 2018

हिंदी ग़ज़ल के पथ प्रदर्शक गुलाब जी

1 min
आदरणीय श्री गुलाब खंडेलवाल जी की रचनाओं से मेरे प्रथम परिचय में मेरी स्थिति ठीक वैसी ही थी जैसे किसी ठेठ ग्रामीण व्यक्ति को अचानक किसी शहर के सुपरमॉल में लाकर खड़ा कर दिया गया हो | अद्भुत निर्वचनीय और विपुल साहित्य सामग्री और उनमें भी मेरी पसंदीदा विधा ग़ज़ल की चार चार पुस्तकें |
मौलिक उद्गारों के सृजक आदरणीय गुलाब जी ने बहुत ही कोमल भावों को अनेक विधाओं में समेटा है | उत्कृष्ट साहित्य लिखने के साथ-साथ गुलाब जी ने हिंदी के आधुनिक स्वरूप में नई-पुरानी विधाओं को इस रूप में प्रस्तुत किया कि पुराने वृक्षों पर नवशाखाओं नवपल्ल्वों ने इठलाना शुरू कर दिया मानों वसंत के आगमन पर बगीचों में गुलाब अपने रस गंध का हर कतरा न्यौछावर कर देना चाहता हो | गुलाब जी स्वयं अपना परिचय इन पंक्तियों के माध्यम से देते हैं कि –
“गंध बनकर हवा में बिखर जाएँ हम
ओस बनकर पंखुरियों से झर जाएँ हम”
यानि जीवन भले ही छोटा हो किन्तु सार्थक हो |
बड़ी ही सादगी से यह मूक साधक अपनी मेहनत को समर्पित करते हैं कि
“तू न देखे हमें बाग़ में भी तो क्या
तेरा आँगन तो खुशियों से भर जाएँ हम”
गुलाब जी ने हिंदी ग़ज़लों का प्रवर्तन सर्वप्रथम 1971 में किया | यद्यपि ग़ज़ल के प्रथम स्वरूप में
हमन है इश्क मस्ताना ,हमन को होशियारी क्या
रहें आजाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या
कबीर की इस रचना को माना जा रहा है तथापि तकनीकी पक्ष को मान देने वाले इस बात से सहमत नहीं | तकनीकी पक्ष में गुलाब जी की गज़लें बहुत मजबूत स्थिति में हैं |
हिंदी के अनेक रचनाकारों ने ग़ज़ल विधा को अपनाया। जिनमें निराला, शमशेर, बलबीर सिंह रंग, भवानी शंकर, त्रिलोचन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि प्रमुख हैं। इस क्षेत्र में सर्वाधिक प्रसिद्धि गुलाब जी के समकालीन दुष्यंत कुमार जी को मिली। दोनों रचनाकारों ने एक ही विधा में लिखा लेकिन दोनों के लेखन की गूँज बिलकुल अलग है अत: किसी भी रूप में दोनों की तुलना समीचीन नहीं कही जा सकती |
ग़ज़ल लेखन की विशेषता यह है कि इसके शिल्प में अरबी फ़ारसी से लेकर उर्दू हिंदी तक कोई बदलाव नहीं आया | ग़ज़ल के छंद जिसे बहर कहा जाता है उसे हिंदी की आत्मा तक लीन करने के लिए उसका मूल दर्शन,बिम्ब व प्रतीक योजना का मूल स्वरूप हिंदी लेखन से इतर नहीं हो सकता और गुलाब जी हर कसौटी पर खरे उतरे हैं |यही वज़ह है कि उनकी ग़ज़लों की चार पुस्तकों में से तीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत हुई हैं |
आचार्य विश्वनाथ सिंह उनकी पुस्तक के परिचय में लिखते हैं –
“गुलाब जी ने पहली बार हिंदी को वे ग़ज़लें प्रदान की हैं जो उर्दू की श्रेष्ठतम ग़ज़लों के समकक्ष सगर्व रखी जा सकती हैं| कथ्य की दृष्टि से ग़ज़ल की सुपरिचित भूमि पर रहकर भी कवि ने हिंदी के स्वीकृत सौन्दर्यबोध को कभी धूमिल नहीं होने दिया ....|”
आचार्य विश्वनाथ सिंह के इस कथन पर लेशमात्र भी संदेह नहीं किया जा सकता |
ग़ज़ल सम्बन्धी गुलाब जी की पहली पुस्तक “सौ गुलाब खिले” की पहली ग़ज़ल का मतला है –
“कुछ हम भी लिख गए हैं तुम्हारी किताब में
गंगा के जल को ढाल न देना शराब में”
ग़ज़ल विधा को अपनाते समय पवित्रता बनाए रखे का एक चौकस आग्रह स्पष्टत: दिखाई दे रहा है और यहीं आत्म विश्वास से रखा गया पहला कदम भी इसी ग़ज़ल के मक्ते में दृष्टिगोचर हो रहा है –
“हमने ग़ज़ल का और भी गौरव बढ़ा दिया
रंगत नयी तरह की जो भर दी गुलाब में”
गज़लें कोमल भावों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति के रूप में प्रेम को स्थापित करने का कार्य मूल रूप से करती रही हैं | सौन्दर्य के उद्दीपन से प्रेम की रसधार का अवतरित होना इन गजलों की सफलता का द्योतक है | गुलाब जी की ग़ज़लों में प्रेम का शाश्वत स्वरूप युगबोध से परे है | 70 के दशक में लिखे गए अशआर नित नूतनधर्मा है | संचार क्रांति के आज के युग में भी जब प्रेम एक क्षणिक आवेश भर है यदि प्रेम का अस्तित्व शेष रह जाता है तो गुलाब जी की ये पंक्तियाँ सहज ही दिल की गहराइयों में उतर जाती हैं –
“जान देना तो है आसान बहुत लपटों में
उम्र भर आग में तपना मगर आसान नहीं”
छायावादी युग के कवियों की भांति गुलाब जी द्वारा ग़ज़लों में किया गया प्रेम चित्रण सूक्ष्म और उदात्त है उनका अदृश्य के प्रति अनुराग देखिये कि –
“प्यार ही प्यार है भरा सब ओर
चेतना को निरावरण कर लो”
एक अन्य ग़ज़ल में वे कहते हैं - “ज्योति किसकी है दूर अम्बर में
क्षुद्र अणु में समा रहा है कोई
कोई है दृश्य कोई द्रष्टा है
और पर्दा उठा रहा है कोई”
ईश्वर के प्रति सुदृढ़ आस्था है तभी तो कहते हैं कि
“सब उसी का प्रसाद जीवन में
विष भी आया है तो ग्रहण कर लो”
सम्पूर्ण समर्पण का भाव भी द्रष्टव्य है –
आयेंगे कल नए रंग में फिर गुलाब
आज चरणों में उनके बिखर जाने दो
दूसरी ओर प्रेम का अल्हड शोख अंदाज भी रमणीय प्रतीत होता है –
“यों तो हर बात में आती है हँसी उनको मगर
जो हमें देख के आयी है अभी और ही है”
एक बानगी और
“पिलाने आये वे घूँघट में मुंह छिपाए हुए
सुराही फेर ले बाज आये ऐसे पीने से”
या फिर
“पाँव चितवन के पड़ रहे तिरछे
थोडा सीधा तो बांकपन कर लो”
सचमुच रोमांचित कर देने वाली कल्पना है |
भावों के सम्प्रेषण में गुलाब जी की बिम्ब योजना पानी पर तैरते गुलाब सा कोमल दृश्यानंद और भाव धारा में बहा ले जाने का सामर्थ्य रखती है -
“हुआ है प्यार भी ऐसे ही कभी सांझ ढले
कि जैसे चाँद निकल आये और पता भी न चले”
एक ओर प्रेम का कोमल स्वरूप तो दूसरी ओर संघर्ष से जूझते इंसान का चित्रण देखिये -
“झांझर नैया डाँडे टूटी नागिन लहरें तेज हवा
टिक न सकेगा पाल पुराना मेरे साथी मेरे मीत”
और पद योजना का चमत्कार अद्वितीय है –
“कहे जो हाँ तो नहीं है हाँ भी, नहीं कहे तो नहीं नहीं है
भले ही आँखों से हैं वे ओझल खनक तो पायल की हर कहीं है”
“हँस के बहला भी लिया रूठ के तडपा भी दिया
हम हैं मुहरे तेरी बाजी के हमारा क्या है”
एक साहित्यकार द्वारा सहृदय सामाजिक चित्रण का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है और परदुःखकातरता कवि का वैशिष्ट्य | गुलाब जी की ग़ज़लों में दोनों की उपस्थिति दृढ़ता के साथ दर्ज होती है |सहज संप्रेषणीयता के साथ साथ मार्मिक संवेदना गुलाब जी की खास विशेषता रही है -
दिये तो हैं रोशनी नहीं है खड़े हैं बुत जिंदगी नहीं है
ये कैसी मंजिल पर आगये हम कि दोस्त हैं दोस्ती नहीं है”
आम आदमी के सपने जो मरते दम तक पूरे न हो पायें उनके लिए बड़ी तड़प के साथ उन्होंने कहा है -
“राख पर अब उनकी लहरायें समंदर भी तो क्या
सो गए जो उम्र भर हसरत लिए बरसात की”
इसी तरह विषम स्थितियों पर जनता की चुप्पी उन्हें बेहद खलती है -
“क्या किससे पूछिए कि जहाँ मुंह सिये हों लोग
है नाम के ही शहर ये वीरान बहुत हैं”
लेकिन गुलाब जी स्वयं दूसरेके दुःख को अपना बनाने का जज्बा रखते हैं -
“मिलेंगे हम जो पुकारेगा दुःख में कोई कभी
हरेक आँख के आंसू में है हमारा पता”
गुलाब जी स्वतंत्रता के हिमायती हैं -
बंधकर रही न डाल से खुशबू गुलाब की
कोयल न कूकती कभी सुर और ताल में
संघर्ष की बात करते गुलाब जी जिजीविषा को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं -
“यों तो राही हैं सभी एक ही मंजिल के गुलाब
तेरा इस भीड़ में खपना मगर आसान नहीं”
परिस्थितियां जो हाथ से निकल जाती हैं उनके बारे में शानदार कहन है –
“डांडे हम खूब चलाते हैं मगर क्या कहिये
नाव दो हाथ ही रहती है भँवर के आगे”
लेकिन संघर्ष में हार कर बैठ जाना उन्हें गवारा नहीं -
“जब्त होता नहीं मांझी अब उठा दो लंगर
नाव को फिर किसी तूफ़ान से टकराने दो”
विशिष्ट व्यक्तित्व होने के लिए विशिष्ट गुण होना आवश्यक हैं -
“सभी के खून की रंगत तो लाल ही है मगर
वो रंग और ही कुछ है कि जो गुलाब बना”
गुलाब जी की ग़ज़लों में प्रतीकात्मकता अपनी विशेषताओं के साथ व्यक्त हुई है | खुद गुलाब की इतनी विशेषताएं उनके संग्रहों में अभिव्यक्त हुई है कि पाठक को आश्चर्य में डाल देती हैं –
“कुछ और होंगी लाल पंखुरियां गुलाब की
काँटों से जिंदगी को सजाने चले हैं हम”
वास्तविकता को स्वीकार कर अपनी गुणवत्ता बनाए रखने की सलाह देते हुए वे कहते हैं -
“जा रहे हैं मुंह फेरकर भौंरे गुलाब
आपकी खुशबू में दम कुछ भी नहीं”
सफलता के लिए मेहनत की जरुरत होती है इस बात को गुलाब को प्रतीक बना कर वे कहते हैं -
“सर पे कांटे भी बड़े शौक से रखते हैं गुलाब
तख़्तपोशी तो बिना ताज नहीं होती है”
शेर दो पंक्तियों में अपनी बात कहने में समर्थ होता है अत: मुहावरा और कथन वक्रता शेर की मुख्य विशेषता होती हैं सम्पूर्ण संग्रह में कथन वक्रता और मुहावरों के चुनाव में व्यक्ति लाचारगी महसूस करता है किसे छोड़े और किसका चयन करे –
“कसो तो ऐसे कि जीवन के तार टूट न जाए
पड़े जो चोट कहीं पर तो रागिनी ढले”
मंजिल से एक कदम पहले अतिउत्साह की वज़ह से मंजिल हाथ से छूट जाती है इस स्थिति के लिए शेर मुलाहिजा फरमाइए -
“डूबी है नाव अपने पांवों की चोट से
हम नाचने लगे थे किनारों को देखकर”
बहुत ही गज़ब के अशआर गजब के कहन के साथ गुलाब जी ने अभिव्यक्त किये हैं -
“हमको तलछट मिला अंत में
वो भी औरों से छीना हुआ”
“अब तो पतझड़ हैं गुलाब
ठाठ पत्तों का झीना हुआ”
मरणधर्मा संसार के प्रति गुलाब जी पूरी तरह जागरूक हैं तो जिंदगी के प्रति सम्मान भी दृढ़ता से निभा रहे हैं –
“फूंक न देना इसे काठ के अंबार के साथ
साज यह हमने बजाया है बड़े प्यार के साथ”
बेशक इस जिंदगी से शिकायत है पर दुबारा भी जिंदगी की ही मांग करते हैं -
“सैंकड़ों छेद हैं इसमें मालिक
अब यह प्याला दूसरा ही देना”
लघुता का बोध भी है तो आत्मविश्वास भी -
“बस कि मेहमान सुबह शाम के हैं
हम मुसाफिर सराय आम के हैं”
“जो सच कहें तो यह कुल सल्तनत हमारी है
पड़े हैं पांवों में तेरे ये खाकसारी है”
अपने स्तर से ही अपना मुकाबला शायद तरक्की का सबसे सही तरीका है -
“खुद ही मंजिल हैं हम अपनी हमको अपनी है तलाश
दूसरी मंजिल पे कोई लाख भटकाए तो क्या”
गुलाब जी का अंदाज वाकई अलहदा है -
“यूँ तो खिलने को नए रोज ही खिलते हैं गुलाब
पर यह अंदाज तो किसी और में पाया न गया”
शब्द चित्रात्मकता का उदाहरण अतुल्य है –
“हवा में घुंघरू से बज रहे थे दिशाएं करवट बदल रही थीं
किरण के घूँघट में मुंह छिपाकर तुम आ रहे थे पता नहीं था”
बहुत ही सादगी से साहित्य सेवा करते हुए आदरणीय गुलाब जी ने अपनी रचनाओं को यह कहकर समर्पित किया –
“खाए ठोकर न हम सा कोई फिर यहाँ
एक दीपक जलाकर तो धर जाएँ हम”
सच है आने वाले समय में भी आदरणीय गुलाब जी की गज़लें सच्चे पथ प्रदर्शक के रूप में नई पीढ़ी को दीपक दिखाकर मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी | इस सच्चे साधक को हमारा सादर नमन |

Sunday, January 19, 2014

जहान को जहाँ या जहां - क्या लिखें

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परं: संयतेन्द्रिय: । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ||
                                                                                                 -श्रीमद्भगवत गीता


पिछले दिनों एक चर्चा में उठे प्रश्न को लेकर मंथन प्रारम्भ हुआ जिसके निष्कर्ष रूप में जो बातें सामने आईं उन्हें साझा करना जरूरी प्रतीत हुआ |
जहान शब्द के संक्षिप्त रूप  जहाँ और जहां के रूप में प्रिंट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में देखे गए हैं इनमें से प्रामाणिक रूप कौनसा है ? विविध पुस्तकों के अध्ययन और भाषा ,लिपि व लेखन के प्रति जागरूक वरिष्ठ व्यक्तियों से चर्चा करके पता लगा कि उर्दू भाषा के जहान,बयान नादान जैसे शब्दों में ‘न’ का लोप करके क्रमश: जहाँ, बयाँ और नादाँ इत्यादि रूप लिखे जाते हैं | यहाँ अनुनासिक अर्थात् चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग किया गया है| वास्तव में यही रूप प्रामाणिक माना गया है क्योंकि देवनागरी लिपि में उच्चारण के अनुसार ही लिखा जाता है |तब फिर जहां, बयां, नादां इत्यादि रूप क्यों देखे जाते हैं तो उत्तर मिला कि कभी-कभी कुछ की-बोर्ड में सभी लिपि चिह्न उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में अनुनासिक ध्वनि (चंद्रबिंदु युक्त) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग कर लिया जाता है जैसे चाँद को चांद तथा अँधेरा को अंधेरा भी लिखा देखा जाता है | कभी-कभी इसका कारण यह भी दिया जाता है कि अनुस्वार कम जगह घेरता है यद्यपि स्थान कम घेरने वाला तर्क केवल अनुस्वार ध्वनि (न्,म् आदि )के उपयोग के संबंध तक ही सीमित होने की सम्भावना है यथा सम्बन्ध के स्थान पर संबंध कम स्थान घेरता है |
मेरे सामने एक  प्रश्न और था कि जहाँ (स्थानवाची) और जहाँ (दुनिया ) में क्या अंतर है तो यह अंतर भी स्पष्ट हुआ कि लिपि रूप में ये दोनों शब्द एक ही हैं किन्तु जहाँ (दुनिया )शब्द मूल रूप से फारसी भाषा से आया है और यह जहान का लघु अथवा संक्षिप्त रूप है जिसका प्रयोग यौगिक पदों (यथा जहाँगीर ,शाहजहाँ , जहाँआरा आदि) में होता है, इसके अतिरिक्त पद्य में भी लय की आवश्यकतानुसार संक्षिप्त रूप का प्रयोग किया जाता है |
हिंदी भाषा में अन्य भाषा से आये शब्दों को यथासंभव उनके मूलस्वरूप में ही अपनाया गया है और भाषा विकास के क्रम में नए लिपि चिह्नों को भी अपनाया गया जैसे ऑफिस का ‘ऑ’ (अंग्रेजी) और उर्दू भाषा का नुक्ता (क़, ग़, ज़) आदि |
संस्कृत व्याकरण के अनुसार पंचम वर्ण का लोप होने पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है, यदि पंचम वर्ण से अंत होने वाले शब्द के बाद  स्वर आये तो अनुस्वार (ं) का प्रयोग न करके अनुनासिक व्यंजन का प्रयोग किया जाता है यथा अहम् पि (म्+अ) लिखा जाएगा किन्तु पंचम वर्ण के पश्चात व्यंजन हो जैसे  अहं गच्छामि (म्+ग) लिखते समय अनुस्वार (ं) का प्रयोग किया जायेगा |
एक मान्यता यह भी है कि व्याकरण पर अत्यधिक बल दिए जाने से भाषा का विकास रुक जाता है काफी हद तक यह सही भी है | पाणिनि व्याकरण बिलकुल वैज्ञानिक व्याकरण कहा जाता है किन्तु सभी नियम न तो याद रहते हैं और न सामान्य जन उसका पालन कर सकता है और लेखन के आँचलिक स्वरूप का भी अपना महत्व है |
कई बार  अमुक शब्द प्रचलन में आगया है या मान्य है कहकर भी शब्द प्रयुक्त होते हैं और इसी क्रम में  मिलते जुलते शब्दों से सम्बंधित  प्रयोग भी शुरू हो जाते हैं ऐसे में कुछ शब्दों के बारे में भ्रामक स्थिति भी उत्पन्न होती है | प्रामाणिकता का अपना महत्व है और इस खोज में बहुत सी नई व रोचक बातें भी सामने आती हैं जैसे सन्न्यासी शब्द देखकर मैं चौंक गयी क्योंकि इससे पहले यह मेरे सामने कभी इस रूप में नहीं आया था इसका कारण यह बताया गया  कि यहाँ सम् + न्यासी की संधि हुई है और जब दो अनुनासिक व्यंजन एक साथ आते हैं तो प्रथम स्वर रहित अनुनासिक व्यंजन मूल रूप में ही लिखा जाता है | इस प्रकार संन्यासी के स्थान पर सन्न्यासी को सही माना जाता है किन्तु प्रचलित रूप संन्यासी है अत: मान्य है |
भाषाविज्ञानियों ने भाषा को बहता नीर कहा है इसमें अन्य धाराएँ जुड़कर इसको समृद्ध बनाती है किन्तु यह ध्यान भी रखना होगा कि यथासंभव इस धारा को प्रदूषित होने से बचाया जाए व नए विकल्पों के द्वार भी खुले रहें |

*****

विविध स्तरीय पुस्तकों एवं विद्वजनों से चर्चा पर आधारित  

Friday, June 21, 2013

चिंतन

प्रकृति का वह स्वरूप जो भारत के उत्तरी प्रदेश में देखने को मिला वाकई भयावह है आत्मा को झकझोर गया सम्पूर्ण मंजर साथ ही याद आई प्रसाद जी की कामायनी शतपथ ब्राह्मण पर आधारित महाकाव्य की ये  पंक्तियां –

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह
नीचे जल था ऊपर हिम था एक तरल था एक सघन
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन
*******

निकल रही थी मर्म वेदना करुणाविकल कहानी सी वहां अकेली प्रकृति सुन रही हँसतीसी पहचानी सी
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उनको देख कौन रोया यों अन्तरिक्ष में बैठ अधीर
वयस्त बरसने लगा अश्रुमय यह प्रलय हलाहल नीर
हाहाकार हुआ क्रंदनमय  कठिन कुलिश होते थे चूर
हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार बार होता था क्रूर
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भारतीय दर्शन ने मनुष्य को सदैव संतुलित जीवन जीने का सन्देश दिया है लेकिन हम दर्शन को छोड़कर दूरदर्शन के पीछे भाग रहे हैं जो निरंतर विलासिता के पीछे पागल होने पर जोर दे रहा है
टी.वी पर उत्तराखंड के दृश्य दिखाते समय बार बार प्रकृति से किये जा रहे खिलवाड़ की बात दोहराई जा रही थी टिहरी बाँध पर सवाल उठाये जा रहे थे लेकिन सोचिये कि टिहरी बाँध की जरूरत क्यों पड़ी ?सभी जानते हैं कि नदियों पर बाँध सिंचाई अथवा ऊर्जा उत्पादन के लिए बनाये जाते हैं. सिंचाई के अभाव में अन्न उत्पादन कैसे हो? निरंतर बढती जनसँख्या को अन्न उपलब्ध करवाने का अन्य उपाय क्या है? रही बात ऊर्जा उत्पादन की तो कुछ घंटे बिजली के अभाव में हमारी क्या हालत हो जाती है यह किसी से छिपा नहीं है ऑफिस घर बाज़ार सभी जगह बढ़ते बिजली उपकरण निरंतर ऊर्जा की मांग करते हैं और ऊर्जा प्राप्ति का जरिया है प्रकृति एकमात्र प्रकृति

टी.वी. पर शोर मचा रहे इन बुद्धिजीवियों से कोई पूछे कि इनके पास ऊर्जा के क्या स्रोत हैं कैसे ये 24*7 अपने कार्यक्रमों को प्रसारित कर पाते हैं क्या इनके पास कोई निजी संसाधन हैं ऊर्जा प्राप्ति के ?यदि नहीं तो जरा आकलन करके बताइये कि सारे दिन में वास्तव में कितने आवश्यक एवं उपयोगी कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं और कुल कितनी ऊर्जा इसमें खर्च होती है

कहने को तो आप कहते कि इस कार्यक्रम के प्रायोजक हैं फलां फलां विज्ञापन लेकिन वास्तव में विज्ञापनों को इन कार्यक्रमों एवं समाचारों के द्वारा प्रायोजित किया जाता है

ऊर्जा केवल टी.वी. प्रसारण में ही खर्च नहीं होती कार्यक्रमों को तैयार करने से लेकर दर्शकों के देखने के लिए काम आ रहे उपकरणों तक करोड़ों यूनिट बिजली प्रयोग में आती है एक समाचार का विस्तार देखने के लिए हम घंटों टी.वी. पर नजरें गडाए रहते हैं और विस्तार के बजाय हाथ आती हैं वे क्लिपिंग्स जिन्हें घिस जाने की हद तक बार बार प्रसारित किया जाता है

क्या बुराई थी कि हम आकाशवाणी पर 15 मिनट के समाचार सुन कर जानकारी हासिल कर लेते थे और अब घंटों बैठकर भी उतनी जानकारी नहीं जुटा  पाते आकाशवाणी पर सरकारी तोता होने का इल्जाम था और अब हम देसी विदेशी रंगीन तोतों की टांय टांय सुनने को विवश हैं

अगर वास्तव में प्रकृति की चिंता है तो महात्मा गाँधी जी की इस उक्ति को ध्यान में रखना होगा –

Earth provides enough to satisfy every man’s need but not every man’s greed .

तो आइये बंद करें बिना जरूरत चल रहे पंखे कूलर ,ऊंघते कम्प्यूटर और अलसाई लाइटें  जहाँ तक हो सके ऊर्जा  बचाएं . थोड़ी सहन शक्ति बढ़ाएं और उस गर्मी को सहन करने के बारे में सोचें जिसे हम बिना ac कूलर बर्दाश्त नहीं कर पाते पर सैकड़ों लोग उसी तपती गर्मी में आजीविका के लिए पूरा दिन खड़े रहते हैं

बड़ी लालसा यहाँ सुयश की
अपराधों की स्वीकृति बनती
अंध प्रेरणा से परिचालित
कर्ता में करते निज गिनती

तो.... या तो हम प्रकृति के दोस्त बन जाएँ या प्रकृति का तांडव देखने को तैयार रहें

प्रकृति रही दुर्जेय पराजित
हम सब थे भूले मद में
भोले थे हाँ तिरते केवल
सब विलासिता के नद में 
 





Sunday, September 4, 2011

शिक्षक की भूमिका

समाज में हमेशा से ही शिक्षक स्थिति का आकलन उस दीपक से तुलना कर किया गया है जिसे अपने ज्ञान की रोशनी से समाज को दिशा ज्ञान देना है .आज सामाजिक वैषम्य की स्थिति के चलते शिक्षक के दायित्व पर पुनर्विचार करना आवश्यक है .
व्यवसायीकरण के दौर में शिक्षण जैसे पुनीत कार्य पर भी व्यावसायिक पैंतरे हावी होने लगे हैं. कुकुरमुत्तों की तरह गली गली में उग रही शिक्षण संस्थाएं इस बात को प्रमाणित कर रही हैं ऐसा नहीं है कि सभी शिक्षण संस्थाएं अपने दायित्व को दरकिनार रख कोरा व्यवसाय कर रहीं हैं बल्कि कई संस्थाएं इस पुनीत यज्ञ में आशानुरूप सहयोग कर रहीं हैं
कोई भी संस्था व्यक्ति से प्रारम्भ होती है और शिक्षण संस्था की इकाई है शिक्षक .इस व्यवसायीकरण के दौर में शिक्षक को अपना दायित्व निभाने के लिए और अधिक मेहनत करनी पड़ेगी .सामाजिक प्रदूषण के इस दौर में नन्हे बालकों को हथेलियों के बीच किसी पुष्प जैसी सुरक्षा की आवश्यकता है
कक्षाएं पास कर बेरोजगारों की भीड़ में खड़े हो जाने वाले बच्चे स्वयं कुंठित रहेंगे तो निश्चय ही समाज में कुंठा का रोग निरंतर फैलता रहेगा .इस संक्रामक रोग को फैलने से रोकना शिक्षक का दायित्व है .समाज में फ़ैल रही हिंसा कुंठा का ही दूसरा रूप है .
प्रत्येक व्यक्ति जो इस समाज की इकाई है आगे चलकर परिवार और समाज का निर्माण करेगा .उसे जिंदगी के प्रति विश्वास और आस्था की आवश्यकता है .शिक्षक को उसकी लुप्त हो रही जिजीविषा को पुनर्जाग्रत करना है और जीवन संघर्ष के लिए प्रेरित करना है श्री कृष्ण की भांति "न दैन्यं न पलायनम्" का पाठ पढाना है .
मूलतः शिक्षण एक त्रिविमीय प्रक्रिया है और लक्ष्य तक पहुँचने के लिए परिवार और वातावरण की भूमिका भी शिक्षक के समान ही महत्वपूर्ण है .परिवार और वातावरण से भी बालक सीखता है अतः निर्धारित पाठ्यक्रमों को पूरा कर यदि बालक फिर से वही प्रश्न ले कर खड़ा हो जाता है कि "अब मैं क्या करूँ...." तो निश्चय ही शिक्षण प्रक्रिया दोषपूर्ण है यदि विवेक जाग्रत करने में शिक्षा असमर्थ है तो उसे शिक्षा कहा ही नहीं जाएगा .
शिक्षण की सम्पूर्णता तभी कही जायेगी जब बालक आने वाली परिस्थिति के सम्मुख सीना तान कर खड़ा होगा और विषम परिस्थितियों से संघर्ष का हौसला रख सकेगा .
आज की परिस्थितियों में हमे बालक को श्री राम और महात्मा गाँधी के रूप में तैयार करना है उन्हें बताना है कि इन महापुरुषों के पास न साधन थे न ही सहारा देने के लिए लंबे चौड़े परिवार फिर भी उनके व्यक्तित्व की रेखाएं समय की चट्टान पर अमिट हैं .
उपभोक्ता संस्कृति की चकाचौध से अलग ऐसे शिष्य तैयार करने हैं जो विवेकशील नाविक की भांति भंवरों और तूफानों में भी नाव को आगे बढ़ा ले जाएँ .यह केवल शिक्षक और शिष्य के आपसी विश्वास से ही संभव हो सकेगा . ऐसे में किसी कवि की पंक्तियाँ याद आती हैं .....
" मैं तुमको विश्वास दूँ तुम मुझको विश्वास दो
शंकाओं के सागर हम लंघ जायेंगे"




नोट : यदि फॉण्ट छोटा लगे तो तो ctrl +mouse wheel के प्रयोग से बदल कर पढ़ा जा सकता है

Monday, August 15, 2011

क्या हम स्वतंत्र हैं


आज हम हर्ष और उल्लास से स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं किन्तु कहीं कुछ खटक भी रहा है और वह है एक प्रश्न कि क्या हम स्वाधीन हैं ?

स्वाधीन शब्द बना है स्व और अधीन से मिलकर .स्वाधीन होने के लिए हमें ‘स्व’ के अधीन होना होगा और तब हमें पहचानना होगा ‘स्व’ को .यह आसान काम नहीं है क्योंकि हम तो ‘पर’ को देखने में व्यस्त हैं इतने व्यस्त कि स्व पर उठती अँगुलियों को मुट्ठी में कैद कर ‘पर’ के भ्रष्ट आचरण पर आंसू बहाते रहते हैं .

स्वतंत्र रहने के लिए ‘स्व’ का तंत्र एक अनुशासन की अपेक्षा रखता है .स्वानुशासन के बिना स्व-तंत्र कभी स्थापित हो ही नहीं सकता .अनुशासन के बंधन को स्वीकार कर ही स्वतंत्र होने के उत्सव को मनाया जा सकता है .यहाँ उद्धृत करना चाहती हूँ गुप्त जी के ‘साकेत’ के अंश ....

सीता और राम के संवाद .....

बंधन ही का तो नाम नहीं जनपद है ?देखो कैसा स्वच्छंद यहाँ लघु नद है

इसको भी पुर में लोग बाँध लेते हैं हाँ वे इसका उपयोग बढ़ा देते हैं

पर इससे नद का नहीं उन्हीं का हित है ,पर बंधन भी क्या स्वार्थ हेतु समुचित है

मैं तो नद का परमार्थ इसे मानूंगा हित उसका उससे अधिक कौन जानूंगा

जितने प्रवाह हैं बहें अवश्य बहें वे ,निज मर्यादा में किन्तु सदैव रहें वे

केवल उनके ही लिए नहीं यह धरणी है औरों की भी भार धारिणी भरणी



जनपद के बंधन मुक्ति हेतु है सबके

यदि नियम न हो उच्छिन्न सभी हों कबके


जब हम सोने को ठोक पीट गढते हैं

तब मान मूल्य सौंदर्य सभी बढते हैं

सोना मिटटी में मिला खान में सोता

तो क्या इससे कृत कृत्य कभी वह होता



हाँ तब अनर्थ के बीज अर्थ बोता है

जब एक वर्ग में मुष्टि बद्ध वह होता है

जो संग्रह करके त्याग नहीं करता है

वह दस्यु लोक धन लूट लूट धरता है



निज हेतु बरसता नहीं व्योम से पानी

हम हों समष्टि के लिए व्यष्टि बलिदानी



देवत्व कठिन दनुजत्व सुलभ है नर को

नीचे से उठना सहज कहाँ ऊपर को



हम सुगति छोड़ क्यों कुमति विचारें जन की

नीचे ऊपर सर्वत्र तुल्य गति मन की

Wednesday, April 20, 2011

बच्चे और कल्पना

कल्पना को आधार बनाकर यथार्थ के नए धरातल गढे जा सकते हैं .कहीं न कहीं तो पहली बार चाँद पर उतरने का सपना देखा गया होगा भले ही यथार्थ में चाँद पर चरखा चलाती बुढिया न मिली हो ना ही कोई बूढा बाबा बच्चों के मामा के रूप मे मिला पर चंदा के घर जाने का सपना तो पूरा हुआ और आज वहाँ कॉलोनी बसाने की बात सोची जा रही है

सोचिये अगर मानव को पता होता कि चाँद हजारों किलोमीटर दूर है वहाँ न हवा है न पानी तो क्या इन तथ्यों के आधार पर कोई चंदा के घर जाने का सपना सजा सकता था

मेरा मानना है कि तथ्यात्मक जानकारी के साथ साथ यदि बालकों की कल्पना शक्ति का विकास किया जाए तो बालक का सर्वांगीण विकास स्वतः स्फूर्त होगा .आज पाठ्यक्रम और शिक्षा पद्धति मे तथ्यों की भरमार है और कल्पनाधारित संक्रियाएँ बहुत कम (नगण्य) .यहाँ तक कि हिंदी अंग्रेजी जैसे भाषाई पाठ्यक्रमों मे भी कल्पना आधारित प्रश्नों को आदर्शों की सीमा मे बाँध देते हैं कहीं सकारात्मक उत्तर अपेक्षित है तो नकारात्मक उत्तर को कतई स्वीकार नहीं किया जाता .

प्रत्येक सिक्के के दो पहलू होते हैं फिर भी कतिपय विद्वान मानते हैं कि कंप्यूटर युग में बच्चों को परियों और जादू के किस्सों से क्या सरोकार उन्हें ऐसे किस्सों से दूर रखा जाना चाहिए .

बेशक कोरी कल्पना मे बहते जाना एक नादानी है किन्तु तैरना सिखाने के लिए बच्चे को धारा मे तो नहीं छोड दिया जाता . उसे संरक्षित परिस्थितियों में प्रशिक्षण दिया जाता है ठीक उसी तरह पाठ्यक्रमों में भी कल्पना को उचित स्थान दिया जाना आवश्यक है .कंप्यूटर स्वयं कल्पना प्रसूत यंत्र है और कल्पना के लिए अनंत आकाश भी .इस अनंत आकाश में उड़ान के लिए पंख पसारने का हौसला हो तो ब्रह्मांड अपनी मुट्ठी में करना क्या मुश्किल है ?

मूर्तिपूजा जैसी अवधारणा के समर्थक भी है और अनेको उसके विरोधी भी दोनों पक्षों के अपने अपने तर्क हैं .मूति को आधार बनाने वालो का कथन है कि यह एकाग्रता में सहायक है तो दूसरी ओर मूर्तिपूजा के विरोधी इस तर्क को आधार-हीन मानते है .यहाँ न्याय करना कि दोनों में से कौन सही है कौन गलत यह हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है लेकिन मध्यम मार्ग को अपनाते हुए यह स्वीकार करने में तो बुराई नहीं कि लक्ष्य प्राप्ति का साधन जो भी हो परिणाम सुन्दर होना चाहिए . एकलव्य यदि गुरू की मूर्ति में गुरू कल्पना से एक अच्छा धनुर्धर बन सकता है तो क्या जरूरी है कि द्रोण मनुष्य रूप में ही शिक्षा दें.

Saturday, April 16, 2011

आधुनिकता और भारतीय नारी

इन दिनों फिल्मों में शराब पीकर बहकती गालियाँ देती नायिकाओं को दिखलाये जाने का चलन देख मन वितृष्णा से भर जाता है .साहित्य मे किसी भी प्रकार की नायिका इन फ़िल्मी नायिकाओं से मेल नहीं खाती .नारी शक्ति आन्दोलनों को चलाने वाले भी इस पर सवाल नहीं उठाते कहीं इस स्वरूप को उनकी मौन सहमति तो नहीं .

भारतीय नारी आदिकाल से ही विश्व मे सर्वोच्च स्थान पर रही है .प्रेम ममता वात्सल्य की वह प्रतिमूर्ति सदा ही कथाओं की उदात्त नायिका रही है .वैदिक काल मे गार्गी मैत्रेयी जैसी विभूतियाँ हमारे इतिहास का गौरव पृष्ठ हैं तो स्वतंत्रता का सीमांकन करने वाली विद्योत्तमा अपने ज्ञान के बल पर ही राज दरबार मे शास्त्रार्थ हेतु पंडितजनों को ललकार सकने का साहस रखती थी . सीता जैसी महानायिका ने क्या अपने स्वाभिमान पर आंच आने दी थी जहाँ एक ओर अपनी निडरता से उसने रावण के सामने समर्पण से इनकार किया था वहीँ दूसरी ओर अकेले ही लव कुश को सुशिक्षित कर ममता और दायित्व निर्वहन की योग्यता का प्रदर्शन किया था .अपनी जड़ अपनी जमीन को थामें रखने मे ही नारी की सार्थकता है सहजता है सम्पूर्णता संप्रभुता है

नारी सृष्टि की सृजनहार है ....

मिटा दे अपनी हस्ती को गर मर्तबा चाहे

कि दाना ख़ाक मे मिलकर गुलो गुलज़ार होता है

अपने आपको आँचल मे ढक लेना समाज से ज्यादा परिस्थितियों की देन थी यवनों मुगलों के आक्रमण ने नारी को देहरी के भीतर बाँधने का प्रयास भले ही किया हो किन्तु याद रहे कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मे अपने शिशु को गोद मे लेकर लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना ने आतताईयों का सामना किया था .

आज आधुनिकता का तथाकथित प्रश्न बाजारवाद के निजी स्वार्थों की पूर्ति का साधन मात्र है .सिगरेट ,शराब पीकर बहकना डियो–डरेंट के पीछे भागना आधुनिकता की मांग तो नहीं कही जा सकती.

भला शारीरिक सौंदर्य विपणन आधुनिकता की पहचान कैसे हो सकती है उपभोक्तावादी इस संस्कृति मे किरण बेदी इंदिरा गांधी ,ऍम एस सुब्बालक्ष्मी,मदर टेरेसा ,इंदिरा नुई जैसे नाम भी हैं जिन्होंने अपनी कर्मठता निडरता और योग्यता का परिचय देकर विश्व के प्रमुख समाचार पत्र पत्रिकाओं मे अपना स्थान बनाया न कि सौंदर्य प्रतियोगिताओं मे ईनाम जीतकर सौन्दर्य की भव्यता उसके कर्म क्षेत्र मे है ना कि मुखौटों मे .

आधुनिकता शब्द की आड़ मे नारी का केवल ऊर्जा दोहन हो रहा है .पतन की खाइयो मे उसे धकेला जा रहा है . भारतीय नारी सदा से ही अपनी स्वतंत्रता को परिस्थिति अनुसार ढालकर श्रद्धेय बनी रही है और सदा रहेगी तथाकथित आधुनिकता की मोहर की उसे कभी आवश्यकता न थी और न होगी . बुद्धि चातुर्य ज्ञान भारतीय नारी मे पहले से था आज भी है फिर भला ऐसे आधुनिकीकरण जैसे छलावे को वह अपनी बैसाखी क्यों बनाए? भारतीय नारी समय की वह नदी है जो अपनी पीड़ा भूल हरियाली बिखराती आजीवन बहती है जहाँ से गुजरती है रास्ता बना लेती है .

जो नारी अपने बच्चों से दूर हो स्वयं के मनोरंजन को प्राथमिकता देने लगी है वह भूल रही है कि आम के वृक्ष की पहचान उसके फलों से है गुलाब का पौधा अपने फूल के कारण ही आकर्षित करता है .

आधुनिकता का अर्थ ग्रहण सुशिक्षा के रूप मे किया जाना आवश्यक है नारी को बैसाखियों के सहारे की नहीं वरन आत्म बल विकसित करने की आवश्यकता है

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