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Thursday, November 20, 2014

बंधन

(1)

छटपटाकर निकली
घूंघट
और
बुर्केनुमा
कोकून से बाहर
अब खुश हैं
हाथों पर दस्ताने
और चेहरे पर
स्कार्फ लपेटे
तितलियाँ

(2)

उन्हें भी
कहाँ सुकून देते हैं
ये तराशे हुए बगीचे
फिर-फिर 
बुलाते हैं
बेतरतीब फैले जंगल
जंगल पर खुला आसमान
लेकिन लौटकर दुबक रहीं हैं
चिड़ियाएँ
बाज के पैंतरे देखकर



चित्र गूगल से साभार 

Saturday, March 16, 2013

रोकना ही होगा ....


कल फेसबुक पर  एक विडियो देखा जिसमे एक महिला वेस्टर्न स्टाइल में डांस कर रही थी | डांस करते वक़्त उसके सिर से पल्लू अगर सरक जाता तो वह तुरंत उसे संभाल रही थी | इस स्थिति में उसे देख कर मुंह से वाह ही निकल रही थी | कमेंट्स की संख्या सैकड़ों में थी लेकिन कुछ कमेंट्स में उसे बार डांसर बताया जा रहा था तो कुछ में आह भरते ,पेल्विक थ्रस्ट को केन्द्रित करते बेहूदे कमेंट्स भी थे  | अब सोचने की  बात यह थी कि विडियो क्या उस महिला ने इन ( ?!!) लोगों को अपनी कला दिखाने के लिए डाला होगा मुझे तो ऐसा नहीं लगा कि सस्ती!!! लोकप्रियता के लिए उसने इसे डाला होगा क्योंकि डांस किसी घरेलू फंक्शन में किया जा रहा था वार फेर करती महिलाओं को देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता था  |

प्राय: शादी ब्याह में लोग संगीत के कार्यक्रम में नाचते ही है,वे भी जिन्हें नाचना आता है और जिन्हें नहीं आता वे भी | बारात में पुरुषों के डांस को मस्ती नाम दिया जाता है लेकिन महिला के इस डांस को मस्ती नहीं बार डांसर जैसा उपमान दिया गया | चलिए मान लेते है कि कमेंट करने वालों का महिला से कोई रिश्ता नहीं था पर क्या उनके कमेंट्स उनकी कुत्सित मानसिकता बयां नहीं करते? क्या उस महिला का अपना फॅमिली फंक्शन एन्जॉय करना इतना बड़ा गुनाह हो गया ? क्या यहाँ उस शख्स का कोई दोष नहीं जो इसके प्रसारण के साथसाथ भद्दे कमेंट्स को भी प्रसारित कर एन्जॉय कर रहा था और बड़ी सादगी से टाइटल में महिला की कला की तारीफ़ कर रहा था  |  यहाँ कहीं न कहीं संस्कारों की कमी है और जब बोये पेड़ बबूल का तो ....यहाँ तो माँ के द्वारा दी गयी शिक्षा की ही कमी कही जायेगी  |    इन लोगों  की मानसिकता को स्त्री विमर्ष (विमर्श नहीं ) के माध्यम से तो शायद नहीं बदल सकते क्योंकि लेकिन विमर्श के ( जी विमर्श ) के माध्यम से इन की सोच पर लगातार चोट करते हुए सही आकार देने के प्रयास को जारी रखना ही होगा ताकि नेट पर अनुचित प्रसारण के कारण किसी महिला को आत्महत्या जैसा कदम न उठाना न पड़े  |  और ऐसे किसी प्रसारण को अमान्य कर रोकना ही होगा |

Thursday, March 7, 2013

स्पंदित है मन......

जलने से भी उजाला नहीं है
पलकें अपनी भिगोना नहीं है

बाँधे जो पंख पंछी सुकोमल
कारागृह वो घरौंदा नहीं है

ना ही ससुराल ना ठौर पीहर
दहलीज कहीं ठिकाना नहीं है

साँसे नित छंद नया रचतीं हैं
ऋण मात्र तुझे चुकाना नहीं है

बंदिश कोई बदलकर लिखेंगे
सुर गम का गुनगुनाना नहीं है

डोली से शेष अर्थी ठिकाना
बेटी को यह सिखाना नहीं है

नदिया ने कब गिने पाँव छाले
हो सिन्धु उत्सुक भरोसा नहीं है

अंचल में बाँध गीता चली चल
जीवन परवश बिताना नहीं है

धरती है वह खिलौना नहीं है
स्पंदित है मन बिछौना नहीं है 

Sunday, October 7, 2012

न दैन्यं न पलायनं



चित्रा !आज फ्री हो ?.....तुम्हारी बेटी तुमसे मिलना चाहती हैइरा ने फोन पर  बताया .
ओह नव्या !वो कब आईमैनें पूछा तो दूसरी तरफ से पुलकित नव्या का स्वर सुनाई दिया ...मौसी मिलकर बात करेंगे मेरी पसंद का खाना तैयार रखना .
खाना तैयार करते हुए सब कुछ एक फिल्म रील की तरह चल रहा था –
चित्रा दी !चित्रा दी !जल्दी दरवाजा खोलिए .
यह रेवा की आवाज थी ,घड़ी की ओर देखा रात के साढ़े दस बजे थे .दरवाजा खोला तो वो कुछ घबराई सी लगी .
घर चलो और अपनी सहेली के हाल देखोकहते हुए उसने सामने पड़ा बैग व स्टेथोस्कोप उठा लिया .एक बारगी तो मैं कुछ समझ नहीं पायी लेकिन जल्दी ही इरा का चेहरा सामने घूम गया, शायद उसके पति ने मार पीट की होगी यंत्रवत कदम उनके घर की ओर बढ़ गए . घर पर ताई (इरा की माँ )भी बैचैन दिखाई दी अरुण चाचा जो कि हमारे पडोसी हैं इरा के पास बैठे दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे .बदहवास सी पड़ी इरा की फटी फटी आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे .
देखते ही समझ आ गया कि शारीरिक आघात सहते रहने की आदी हो चुकी इरा इस बार विशेष मानसिक पीड़ा से जूझ रही है .दवाइयों के साथ नींद का इंजेक्शन दिया था, कुछ ही देर में इरा सो गयी .
बाहर के कमरे में पहुंची तो ताई का स्वर उभरा कंवर साहब को फोन कर देना चाहिए.
उस जल्लाद को !जिसने नन्हीं सी बेटी के साथ इरा दी को मौत के मुँह में धकेल दिया यह तो अरुण चाचा की नज़र पड़ गयी वर्ना तुम खुद अपनी बेटी का चेहरा देखने को तरस जाती रेवा ने चिढ़कर कहा .
तू खुद तो घर बसाने की सोचती नहीं उसे भी सही रास्ते पर मत चलने दे .ताई का स्वर ऊँचा हो गया था .
मैंने रेवा को चुप रहने का इशारा किया .मैं चित्रा दी के घर जा रही हूँ .कहकर रेवा ने बैग उठाया और मेरे साथ चल दी .
मैं जानती हूँ रेवा के जिस आक्रोश को मैंने रोका है वो अब मेरे सामने फूटेगा . ताई की नज़र में रेवा एक बिंदास लड़की है जिसे घर परिवार में रहने का सलीका नहीं आता. लेकिन हमारा नजरिया कुछ और है . भला जो लड़की घर बाहर के काम फुर्ती और सफलता से निपटाती है पढने लिखने में अव्वल हो पास पड़ोस वालों से सहृदयता से पेश आती हो उसे परिवार में रहना नहीं आता ,यह मानने वाली बात नहीं है , हाँ गलत बात को बर्दाश्त करना उसके बस की बात नहीं .घर के काम तो वह इतनी अच्छी तरह निपटाती है कि खुद ताई भी फूली नहीं समाती लेकिन उसके शादी न करने के फैसले से ताई दुखी हैं .
इरा की गृहस्थी को उदाहरण बना कर रखते ही रेवा और ताई के ग्रह एक दूसरे के विपरीत हो जाते हैं .
हमारे घर आते ही रेवा फफक कर रो पड़ी –जानती हो चित्रा दी आज उन लोगों ने इरा दी को इस ठिठुरती रात में दस बजे घर से बच्ची के साथ बाहर निकाल दिया .
इरा दी बेसुध सी रेल की पटरियों पर चल रही थी कि अरुण चाचा ने देख लिया और किसी तरह घर ले आये और अब माँ उन लोगों को ही फोन ......कहते कहते रेवा हथेलियों से मुँह ढक कर सिसकने लगी थी
कोफ़ी पी कर कुछ देर हम चुपचाप बैठे रहे .
हम सुबह इरा से बात करेंगे तुम फिलहाल उसकी सेहत का ध्यान रखो और ताई जी से बहस करने की कोई जरूरत नहीं .कहकर मैं रेवा को घर छोड़ आई .
बारह बज चुके थे और मेरी आँखों से नींद पूरी तरह से गायब थी .इरा और रेवा में बस सहनशीलता का ही अंतर था वरना दोनों खूबसूरती पढाई और शालीनता की मिसाल थी .रेवा जहाँ हर गलत बात का विरोध दृढ़ता से करती थी वहीँ इरा समझौते की राह में विश्वास करती थी .
विवाह से पूर्व लेक्चरर थी इरा ,पति के शक्की मिजाज के कारण नौकरी छोड़ी और दिनोदिन घरेलू समस्याओं में समझौते की राह पकड झुकती रही .जिन समस्याओं से वह किनारा कर रही थी वही सब उसे इस कायरतापूर्ण मार्ग पर धकेल ले गयीं थी .
इरा के बारे में सोचते सोचते ही नींद आ गई . सुबह इरा का हाल जानने पहुंची तो लगा पहले से कुछ ठीक है लेकिन रात के घटनाक्रम को लेकर शायद शर्म महसूस कर रही थी .टूटे हुए मन को जोड़ने का वक्त अभी नहीं आया था . उधर रेवा और ताई जी रात की सम्बन्धियों को खबर करने की बात को लेकर फिर उलझ गए थे .
चित्रा दी ! आप ही बताइए जब उन्हें इनकी जरूरत ही नहीं तो .........
रेवा ! हम लड़की वाले हैं आखिर हमें ही झुकना ...........
कब तक ताई जी कब तक ....... न चाहते हुए भी मुझे दखल देना पड़ा .आपकी इसी सोच ने रात को आपकी बेटी को कहाँ पहुंचा दिया था , अब तक आने उसके मन की सुध नहीं ली और फिर वही सब दुहराना चाहती हैं.
तुम लड़कियां यह क्यों नहीं समझती कि दुनिया जीने नहीं देगी , यही कहेगी कि लड़की में ही कोई खोट है ताई ने प्रतिवाद किया .
ताई जी !जिस राह पर वह रात चल पड़ी थी , उसके बारे में दुनिया क्या यही नहीं कहती ?
इतने कानून बन जाने के बाद भी ये पढ़ी लिखी महिलायें ..... रेवा अब भी आवेश में थी .
रेवा क़ानून समाज को सुधारने का मार्ग जरूर है पर जब उसे तोड़ मरोड़ कर गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है तो समाज को सही दिशा मिलने के बजाय उच्छृंखलता ही बढती है देखती नहीं किस तरह अदालतों में केसों के ढेर बढ़ रहे हैं... इस बार इरा का स्वर सुनाई दिया .
लेकिन दीदी इस तरह विरोध न करके बार बार सिर झुका कर क्या हासिल होने वाला है ? रेवा ने प्रश्न किया .
इस समाज ने नारी को देवी कहकर उसे अपनी संस्कृति और गौरव की रक्षा का भार सौंप रखा है .इस गौरव को वह उतार कर फेंक नहीं सकती और न ही केवल कानून उसे सम्मान दिला सकता है नदी की मंजिल तो सागर ही है .
सच कहती हो इरा किन्तु  क्या तुम्हें नहीं लगता कि यदि नदी समुद्र में समाहित हो कर अपना अस्तित्व मिटा देने के लिए लालायित रहती है तो केवल इसलिए कि सागर उसे अपनी विशालता के बल पर बाँधने में समर्थ है .छोटी मोटी तरंगों की बात तो जाने दो चंद्रमा के आकर्षण से उठने वाले ज्वार को भी समुद्र थामे रहता है फिर कोई नदी उससे अलग नहीं हो सकती . रही संस्कृति की बात तो वह कहती है न दैन्यं न पलायनं .... फिर चाहे नदी रूप में जीवन बांटती चलो या समुद्र संग मोती सिरजो .

 न दैन्यं न पलायनं..... दोहराते हुए इरा ने नन्हीं नव्या को सीने से लगाते हुए बाहों में समेट लिया . चेहरे की दृढ़ता ने जता दिया था कि वह अब इस बच्ची के लिए नौकरी भी करेगी और आत्मसम्मान से जियेगी भी .
डोरबेल बज उठी थी .बाहर निकल कर देखा तो नव्या एयरफोर्स ऑफिसर की यूनिफ़ॉर्म में खड़ी थी सेल्यूट मार कर ,मौसी .... कहते हुए मुझसे लिपट गयी . ओह नव्या ...मन प्रफुल्लित हो उठा था उसे देखकर . इरा का दृढ विश्वास से देखा गया सपना पूरा हो गया था                  
   यह कहानी रचनाकार पर भी  
http://www.rachanakar.org/2012/09/94.html                         

Wednesday, March 21, 2012

आत्मबल इतना ...



देख कर हवाओं की
मुखालफत
पंछियों के पर 
खुलने लगे थे
अनछुई ऊँचाइयों को
छूने का संकल्प
मन की गागर में
आलोड़ित होते होते
बन चुका था 
एक ज्वार
तिनकों के घोंसले
अब परों को ना बाँध पाएँगे
पुकारता है 
सुनहरा रश्मि पुंज
अँधेरों को ठेलते हुए
कर लेनी है मुट्ठी में  
अपने हिस्से की रोशनी
और भर लेनी है डैनों में
इतनी शक्ति
कि कोई ब्लैक होल
निगल न सके 
हौसलों को

और यह
मात्र गर्जना से संभव नहीं
भरनी होगी
स्वार्थहीन
और आडम्बर से रहित
एक उड़ान
बना देना होगा
एक रास्ता
आसमान तक
पीढ़ियों के 
अनुगमन के लिये
चाहिए आत्मबल इतना 
कि
लडखडाएं साँसें
तो 
पथ विचलित न कर दे
लुभावने 
आश्वासनों की
शापित बैसाखी कोई


Monday, January 9, 2012

गौरैया भी.....















जुटा लिया है
मैंने
भविष्य से
आँख मिलाने का साहस
अतीत के
 डैनों के नीचे
कब तक
सुरक्षित रहूंगी मैं
बाज हैं
रहें वे
गौरैया भी
 पँख पसारेगी ही .....
















picture source :google image 

Saturday, December 17, 2011

एक और एक



उन्हें
एक और एक ग्यारह नहीं                           1+1=11......                           
                                                                            
एक होना था    ......                                           
केवल एक
और वे हुए भी
उनमें से एक
या तो पंगु हुआ
या परजीवी
और
अस्तित्व  
एक का ही बाकी रहा                1+1=01
                                                  


Sunday, December 11, 2011

कल्पना बनाम यथार्थ



नहीं छलती कल्पना उतना
जितना यथार्थ ने छला है
जो सामने है
वही एक सच है
यह दिखलाने की कला में
न जाने कितनी बार
मासूम एक सपना जला है
वो वैरभाव किस कोख में पनपा
और दुर्विनीत
बिन माँ के बच्चे सा पला है
श्रद्धा की गोद में
जिसे खेलना था
प्यार के काँधे पर बैठकर
मेला देखना था
तृष्णा और स्वार्थ की
 देहरी पर
याचक सा खड़ा है
जो नया करना जानते हैं
मानते हैं सपनो की नींव को
उन्हें
पृथ्वी की परिधि के बाहर
अंतरिक्ष में जाने को
कल्प हंस की पाँखों पर
बैठने का
हौसला जुटाना ही पड़ा है 

Saturday, November 26, 2011

पगली


पगली
बहुत हँसती है
वो
न जाने क्यों
शायद बेवजह
बेवजह ?
पागल है क्या
क्या पता !
और क्या
बिना कारण तो
पागल ही हँसते हैं
वो सुनकर भी हँस रही थी
मानो कह रही थी
दर्द छुपाना भी
एक वजह है
हँसने के लिए
मन के सितार को
घंटो साधा जाता है
हँसने के लिए
लिखी जाती है
नई कविता
स्मित रेखाओं से
भरे जाते हैं
अनुभूति के रंग
पलकों की कूँची से
नम आँखे लिए
पगली सोच रही थी
वो अब भी हँस रही थी .......

Monday, November 7, 2011

बिटिया



तू आई गोदी में बिटिया

जीवन मेरा मुस्काया

भूला रस्ता आज चाँद ज्यूँ

मेरे आँचल में आया


मृगतृष्णा से व्याकुल मनवा

कैसे इत उत भटक रहा था

चिंता चिंतन भूल भुलैया

रस्ता कोई खोज रहा था

भूली मैं सुध बुध आसकिरण

बचपन अपना फिर पाया


मधुर रागिनी तू सपनों की

उषा गीत तेरी किलकारी

आँगन अब वसंत है छाया

गुँजित फाग राग से क्यारी

नन्हीं तुतलाती बातों में

रस मधुरिम घुल-घुल आया


धूल उड़ाती तू इठलाती

माटी के घरौंदे बनाती

फूल पत्तियां टहनी लेकर

अनुपम जीवन बेल सजाती

आनंद नव सृजन का मैंने

नन्हें हाथों में पाया



सरदी की मीठी धूप बनी तू

या फिर इन्द्रधनुष खिल आया

आज चली तू डगमग डगमग

झूला गगन संग बतियाया

और सहसा ही उठा एडियाँ

तारों से हाथ मिलाया

Saturday, October 29, 2011

शक्ति सृजन की

अस्मिता की खोज में
मेरे मन की
शुचिता को
मिली जब भी
तुम्हारी ओर से
अवमानना
निरंतर जलती रही
उपेक्षा और अविश्वास
के आँवाँ में
किन्तु अब
हो गयी हैं परिपक्व
मेरी पीडाएं
परिभूत होकर भी
इतनी परिपक्व
कि बन सकती हैं
आहुति
किसी आश्रय यज्ञ की
एक मजबूत ईंट सी
क्योंकि होती है
वेदना में
शक्ति सृजन की
Siti Hawa, 38, making bricks at a brick factory in the village of Tungkop, Aceh, on Monday. In Aceh, most women work in various sectors to contribute to the livelihood of their families. (EPA Photo)

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