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Monday, May 9, 2022

ग़ज़ल

 

बिना शर्त अनुबंध है इक दुआ मां

तेरा हाथ सिर पर है मेरी दवा मां

झुलसती दुपहरी में राहत दिलाती

फुहारों सी बरसे निराली घटा मां

गमों को छुपाए उठा बोझ अनगिन 

भरी धूप में गुनगुनाती सबा मां

पड़े पांव छाले या कांटे हों मग में

कठिन राहों में मुस्कुराती सदा मां

वो त्योहार हर दिन वो मनुहार हर पल

तेरे बिन है छूटा कहीं सिलसिला मां

सितारों से आगे कहीं ठांव तेरा

पहुंच मेरी सीमित कहां रास्ता मां

अकेली तुझे छोड़ की भूल ऐसी

कि जिन्दा हूं पर जिंदगी है सज़ा मां

 

(आपके जन्म दिवस पर शब्द पुष्पांजलि मां)

Thursday, March 12, 2020

निकाला यूं खसारे से खसारा जा रहा है

चलन अब जिंदगी का यूं सुधारा जा रहा है
कहीं अस्तित्व को अपने नकारा जा रहा है
बनाए चित्र तारों के अंधेरों के पटल पर
निकाला यूं खसारे से खसारा जा रहा है
बढ़ा तारीकियों का जोर पिघला है मुलम्मा
कि जबरन  रंग सूरज का उतारा जा रहा है
अचानक यूं तेरा जाना न आया रास मुझको
मेरे हर रोम से तुझको पुकारा जा रहा है
वो जो खुद टूटकर भी दे रहा था आस हमको
चमक अब आखिरी देकर सितारा जा रहा है
बिखरने के भी होते हैं किसी के ठाठ ऐसे
महक देकर वो फूलों का इदारा जा रहा है
खिले हैं फूल वैसे ही तेरे आंगन में माई
जिन्हें सूनी सी आंखों से निहारा जा रहा है

मां की याद में___

Friday, August 9, 2019

मां

कैसे कह दूं
कि समय के फ्रेम में
अब नहीं हो तुम
तस्वीरें
जो कैमरे में क़ैद
नहीं हो पाईं
मूल रंगों में
मेरे आस-पास ही रहतीं हैं
घर की देहरी पर
प्रतीक्षा में
मुस्कुराती तुम
मेरी पहली कविता
छपने पर
आंसुओ के
मोती बिखराती तुम
आरती के
थाल के उस पार
दीये की लौ सी
दिपदिपाती तुम
संघर्ष के पलों में
पीठ सहलाती हुई तुम
अनगिनत रूपों में
मेरे पास ही रहती हो मां
समय के हर फ्रेम में
तुम्हीं रहती हो
_वंदना

Friday, July 12, 2019

माँ-गुलमोहर



मेरे तपते जीवन पर थी माँ तुम हुलसित छाया
सूरज को नित आँख दिखाती गुलमोहर की माया

पाँव पड़े थे छाले मेरे या डगमग पग डोले
बिन बोले भी भाव समझकर भेद जिया के खोले
संबंधों का तार अनोखा तुमसे मुझ तक आया
मेरे तपते .....

मौन रही तुम जब भी सूखे संवेदन के धारे
बिना शर्त ही माफ़ किया सब गलती पाप सुधारे
पुण्यफलित थे मेरे मैया मैंने तुमको पाया
मेरे तपते ....

अब जो बिछड़ी लौ दीये की चैन कहाँ से पाऊं
जग के सारे तिलिस्म हैं झूठे मैं बैठी पछताऊं
क्यों ना वो आवाज सुनी जब तुमने मुझे बुलाया
मेरे तपते ......

-वंदना

Monday, April 15, 2019

मां



पथ अंधेरे लग रहे मुझको सभी
मां मेरी रहबर रही तू ज्योत सी

ख्वाहिशें खिलती थी तेरी गोद में
रिक्त लेकिन अब है मेरी अंजुरी

तू अथक ही जागती थी रात दिन
ख्वाब मेरे सींचे तूने हर घड़ी

याद करती हैं तुझे फुलवारियां
मुस्कुराहट बिन तेरी सब सूखती

भाग्य ने छीना है कैसे मान लूं
पुष्पगंधा तू सदा मन में बसी

धुन नयी देती रही तू जोश को
माधुरी घोले रही बन बांसुरी

मां कहां है लौट आ फिर से जरा
दूरियां निस्सीम कैसी बेबसी

मां को समर्पित

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