1
वो रंगीन मिजाजी भाये
रोम रोम गहरे रम जाये
कहने को तो केवल पाहुन
ए सखि साजन ? न सखि फागुन !
2
भेद हृदय के सारे खोले
जादू तो बस सिर चढ़ बोले
करे असर बौराये सर्वांग
का सखि साजन ? न सखि भांग !
स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना