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Sunday, March 16, 2014

कह मुकरियाँ








1


वो रंगीन मिजाजी भाये

रोम रोम गहरे रम जाये

कहने को तो केवल पाहुन

ए सखि साजन ? न  सखि  फागुन !


2


भेद हृदय के सारे खोले

जादू तो बस सिर चढ़ बोले

करे असर बौराये सर्वांग

का सखि साजन ? न सखि भांग !



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इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं