Saturday, November 29, 2014

राह भूली इक कली

संसार कैसा मैं भला कुछ ,क्या कहीं थी जानती
घर से अगर निकली अकेली ,दोस्त सबको मानती
हाँ तैरते सपने सितारे ,चाँद आँखों में बसा
यूँ चल पड़ी बस सामने हो जग अनोखा रसमसा

थे पंख कोमल घोंसले से मैं कभी निकली न थी
है छोर दूजा भी गली का जानती पगली न थी  
अब चिलचिलाती धूप देखी चीरती मुझको हवा
आकर कहीं से गोद में ले दे मुझे तू ही दवा

माँ ढूँढती होगी विकल तू राह भूली यह कली
थकना नहीं मुमकिन कि जब तक ना मिले नाजो पली
वो लोरियाँ जब गूँजती है दिल समाये मोद है
सबसे सुरक्षित माँ मुझे तब खींचती यह गोद है


(हरिगीतिका छंद  )

चित्र नेट से साभार 

11 comments:

  1. सुंदर और भावपूर्ण... मन को छू जाती पंक्तियाँ...

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-12-2014) को "ना रही बुलबुल, ना उसका तराना" (चर्चा-1814) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बेहतरीन ... सुन्दर !!

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  4. बहुत ही सुन्दर …

    मर्मस्पर्शी भाव लिए पंक्तियाँ

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  5. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण ...
    मर्म को छूते हुए शब्द ... माँ की गोद से अधिक सुरक्षित क्या ...

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  6. सुन्दर सृजन किया है आपने. मन अंदर तक भींगा.

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  7. बहुत ही सुन्दर …

    मर्मस्पर्शी भाव लिए पंक्तियाँ

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  8. सबसे सुरक्षित माँ मुझे तब खींचती यह गोद है.
    बेहतरीन ... सुन्दर !!

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  9. वाह सुंदर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...सुंदर छंद ..दिल को छू गया ....कलम को रौशनी देते रहिएगा...दिली डैड...वसूल पाइयेगा..!!!

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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