Friday, May 15, 2015

न डर तू सलोनी....




बहुत तेज है धूप संसार की
सुलभ छाँव तेरे लिए प्यार की
उदासी मिटा वेदना मैं हरूँ
अरी लाडली तू बता क्या करूँ

व्यथा पीर आये सताए मुझे
मगर आँच छूने न पाए तुझे
न डर तू सलोनी कि मैं साथ हूँ
धरे आज काँधे सबल हाथ हूँ

सुना था कि कहते तुझे सब सदय
धरा जब हिली तो न कांपा हृदय
बता लेख कैसे विधाता लिखा
कहीं क्रूर कुछ भी न तुझको दिखा

सरलमन बहन तू सरस काव्य है
मधुरतम प्रियंकर व स्तुत भाव्य है
बड़ा तो नहीं मैं मगर  भ्रातृ हूँ
सुरक्षा वचन से बँधा कर्तृ हूँ 

              -वंदना 






चित्र गूगल से साभार 
इस चित्र पर कविता आयोजन भी नेट से साभार 

6 comments:

  1. बेहद मर्मस्पर्शी रचना, संवेदनात्मक तथा भावपूर्ण!!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-05-2015) को "धूप छाँव का मेल जिन्दगी" {चर्चा अंक - 1978} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  3. बेहद मर्मस्पर्शी रचना

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  4. बहुत तेज है धूप संसार की
    सुलभ छाँव तेरे लिए प्यार की
    उदासी मिटा वेदना मैं हरूँ
    अरी लाडली तू बता क्या करूँ ...
    मर्म को छूते हुए भाव ... भाई कितना भी छोटा हो ... बहन का दर्द नहीं देख पाता ... शायद इसी को सच्चा प्रेम भी कहते हैं ...

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  5. व्यथा पीर आये सताए मुझे
    मगर आँच छूने न पाए तुझे
    न डर तू सलोनी कि मैं साथ हूँ
    धरे आज काँधे सबल हाथ हूँ

    अमोल भावनाओं का सुंदर निरूपण ।

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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