Sunday, January 19, 2014

जहान को जहाँ या जहां - क्या लिखें

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परं: संयतेन्द्रिय: । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ||
                                                                                                 -श्रीमद्भगवत गीता


पिछले दिनों एक चर्चा में उठे प्रश्न को लेकर मंथन प्रारम्भ हुआ जिसके निष्कर्ष रूप में जो बातें सामने आईं उन्हें साझा करना जरूरी प्रतीत हुआ |
जहान शब्द के संक्षिप्त रूप  जहाँ और जहां के रूप में प्रिंट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में देखे गए हैं इनमें से प्रामाणिक रूप कौनसा है ? विविध पुस्तकों के अध्ययन और भाषा ,लिपि व लेखन के प्रति जागरूक वरिष्ठ व्यक्तियों से चर्चा करके पता लगा कि उर्दू भाषा के जहान,बयान नादान जैसे शब्दों में ‘न’ का लोप करके क्रमश: जहाँ, बयाँ और नादाँ इत्यादि रूप लिखे जाते हैं | यहाँ अनुनासिक अर्थात् चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग किया गया है| वास्तव में यही रूप प्रामाणिक माना गया है क्योंकि देवनागरी लिपि में उच्चारण के अनुसार ही लिखा जाता है |तब फिर जहां, बयां, नादां इत्यादि रूप क्यों देखे जाते हैं तो उत्तर मिला कि कभी-कभी कुछ की-बोर्ड में सभी लिपि चिह्न उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में अनुनासिक ध्वनि (चंद्रबिंदु युक्त) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग कर लिया जाता है जैसे चाँद को चांद तथा अँधेरा को अंधेरा भी लिखा देखा जाता है | कभी-कभी इसका कारण यह भी दिया जाता है कि अनुस्वार कम जगह घेरता है यद्यपि स्थान कम घेरने वाला तर्क केवल अनुस्वार ध्वनि (न्,म् आदि )के उपयोग के संबंध तक ही सीमित होने की सम्भावना है यथा सम्बन्ध के स्थान पर संबंध कम स्थान घेरता है |
मेरे सामने एक  प्रश्न और था कि जहाँ (स्थानवाची) और जहाँ (दुनिया ) में क्या अंतर है तो यह अंतर भी स्पष्ट हुआ कि लिपि रूप में ये दोनों शब्द एक ही हैं किन्तु जहाँ (दुनिया )शब्द मूल रूप से फारसी भाषा से आया है और यह जहान का लघु अथवा संक्षिप्त रूप है जिसका प्रयोग यौगिक पदों (यथा जहाँगीर ,शाहजहाँ , जहाँआरा आदि) में होता है, इसके अतिरिक्त पद्य में भी लय की आवश्यकतानुसार संक्षिप्त रूप का प्रयोग किया जाता है |
हिंदी भाषा में अन्य भाषा से आये शब्दों को यथासंभव उनके मूलस्वरूप में ही अपनाया गया है और भाषा विकास के क्रम में नए लिपि चिह्नों को भी अपनाया गया जैसे ऑफिस का ‘ऑ’ (अंग्रेजी) और उर्दू भाषा का नुक्ता (क़, ग़, ज़) आदि |
संस्कृत व्याकरण के अनुसार पंचम वर्ण का लोप होने पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है, यदि पंचम वर्ण से अंत होने वाले शब्द के बाद  स्वर आये तो अनुस्वार (ं) का प्रयोग न करके अनुनासिक व्यंजन का प्रयोग किया जाता है यथा अहम् पि (म्+अ) लिखा जाएगा किन्तु पंचम वर्ण के पश्चात व्यंजन हो जैसे  अहं गच्छामि (म्+ग) लिखते समय अनुस्वार (ं) का प्रयोग किया जायेगा |
एक मान्यता यह भी है कि व्याकरण पर अत्यधिक बल दिए जाने से भाषा का विकास रुक जाता है काफी हद तक यह सही भी है | पाणिनि व्याकरण बिलकुल वैज्ञानिक व्याकरण कहा जाता है किन्तु सभी नियम न तो याद रहते हैं और न सामान्य जन उसका पालन कर सकता है और लेखन के आँचलिक स्वरूप का भी अपना महत्व है |
कई बार  अमुक शब्द प्रचलन में आगया है या मान्य है कहकर भी शब्द प्रयुक्त होते हैं और इसी क्रम में  मिलते जुलते शब्दों से सम्बंधित  प्रयोग भी शुरू हो जाते हैं ऐसे में कुछ शब्दों के बारे में भ्रामक स्थिति भी उत्पन्न होती है | प्रामाणिकता का अपना महत्व है और इस खोज में बहुत सी नई व रोचक बातें भी सामने आती हैं जैसे सन्न्यासी शब्द देखकर मैं चौंक गयी क्योंकि इससे पहले यह मेरे सामने कभी इस रूप में नहीं आया था इसका कारण यह बताया गया  कि यहाँ सम् + न्यासी की संधि हुई है और जब दो अनुनासिक व्यंजन एक साथ आते हैं तो प्रथम स्वर रहित अनुनासिक व्यंजन मूल रूप में ही लिखा जाता है | इस प्रकार संन्यासी के स्थान पर सन्न्यासी को सही माना जाता है किन्तु प्रचलित रूप संन्यासी है अत: मान्य है |
भाषाविज्ञानियों ने भाषा को बहता नीर कहा है इसमें अन्य धाराएँ जुड़कर इसको समृद्ध बनाती है किन्तु यह ध्यान भी रखना होगा कि यथासंभव इस धारा को प्रदूषित होने से बचाया जाए व नए विकल्पों के द्वार भी खुले रहें |

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विविध स्तरीय पुस्तकों एवं विद्वजनों से चर्चा पर आधारित  

9 comments:

  1. बहुत सुंदर जानकारी.
    नई पोस्ट : पलाश के फूल

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  2. भाषा सम्बन्धी बहुत ही उपयोगी जानकारी दी है आपने ... कई नए बिंदुओं पे प्रकाश डाला है ... आभार ...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (21-01-2014) को "अपनी परेशानी मुझे दे दो" (चर्चा मंच-1499) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. शुरूआती दिनों में ही मुझे आपके भाषा प्रेम का सहज अनुमान हो गया था। शुभकामनाएँ।

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  5. बहुत बढ़िया लिखा है आपने. हिंदी के कई शब्दों के भ्रामक रूप ऐसे प्रश्न अक्सर लाते हैं मन में. खासकर अंतरजाल पर उपलब्ध हिंदी में ऐसे कितने उदहारण है जिससे अगर आप सीखने की कोशिश करें तो गलत ही सीख कर जाएंगे. अक्सर ऐसी त्रुटियाँ ट्रांसलिटरेशन की होती है मगर फिर भी लिखने वाली की कोशिश जरूर होनी चाहिए कि सही लिखा जाए. चन्द्रबिंदु में का सच में लोप सा हो गया है.

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  6. बहुत सुंदर जानकारी.

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  7. अच्छा लगा पढ़कर!

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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