Saturday, October 8, 2011

आज़ादी

सहज है फडफडाना
पिंजरों में
बंधके कैसे
कोई रह पायेगा
सूरज अगर
बाँध ले किरणों को
जीवन
धरती पर
कहाँ रह जाएगा
मोडना संभव है
धाराओं को
बंधन नदी पर
प्रलय बन जाएगा
खुशबू फूलों में
पवन मुठ्ठी में
रुकी है ना रोक पायेगा
खोल दो खिड़कियाँ
बहने दो हवा
गीत आजाद पाखी गुनगुनायेगा

10 comments:

  1. खोल दो खिड़कियाँ
    बहने दो हवा
    गीत आजाद पाखी गुनगुनायेगा
    सार्थक आह्वान .. सुन्दर रचना

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  2. खूबसूरत भाव, सुंदर शब्द।

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  3. azadi ka apna hi mahatwa hai..aaj ham bhi pinjaron me baithe daana kha rahe hain..hamari swachandata khatam ho gayi..saral shabdon me behatrain disha ki taraf ishara karti shandar rachna..sadar badhayee aaur apne blog per aane aaur judne ke amnatran ke sath

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  4. अंतिम पंक्तियाँ बहुत सुंदर यही मतलब है आज़ादी का क्या बात है .

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  5. सम्मोहक संवेदनशील काव्य सुन्दर है .शुभकामनायें /

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  6. खूबसूरत भाव, सुंदर रचना....

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  7. और झूम जायेगा कण-कण.... बेहद खुबसूरत...

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  8. वाह क्या बात है ...बहुत भावपूर्ण रचना.
    कभी समय मिले तो http://akashsingh307.blogspot.com ब्लॉग पर भी अपने एक नज़र डालें .फोलोवर बनकर उत्सावर्धन करें .. धन्यवाद .

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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