Sunday, March 16, 2014

कह मुकरियाँ








1


वो रंगीन मिजाजी भाये

रोम रोम गहरे रम जाये

कहने को तो केवल पाहुन

ए सखि साजन ? न  सखि  फागुन !


2


भेद हृदय के सारे खोले

जादू तो बस सिर चढ़ बोले

करे असर बौराये सर्वांग

का सखि साजन ? न सखि भांग !



Thursday, March 6, 2014

हर नए गम से ख़ुशी होने लगी

चोट जब संजीवनी होने लगी
जिंदगी बहती नदी होने लगी

त्याग कर फिर धारती नवपत्र है
फाग सुरभित मंजरी होने लगी

पल थमा कब ठौर किसके लो चला
रिक्त मेरी अंजली होने लगी

साजिश-ए-बाज़ार है अब चेतिए
तितलियों में बतकही होने लगी

मैं मसीहा तो नहीं हूँ जो कहूँ
"हर नए गम से ख़ुशी होने लगी"

डूबता सूरज भी पूछे अब किसे
शिष्टता क्यूँ मौसमी होने लगी

मन बिंधा घायल हुआ तो क्या हुआ
बाँस थी मैं बाँसुरी होने लगी



 तरही मिसरा मशहूर शायर जनाब सागर होशियारपुरी साहब की ग़ज़ल से 

"हर नए गम से ख़ुशी होने लगी"

Wednesday, February 5, 2014

सदका माँगे या खिराज....

कोई तुझसा होगा भी क्या इस जहाँ में कारसाज
डर कबूतर को सिखाने रच दिए हैं तूने बाज

तीरगी के करते सौदे छुपछुपा जो रात - दिन
कर रहे हैं वो दिखावा ढूँढते फिरते सिराज

ज्यादती पाले की सह लें तो बिफर जाती है धूप
कर्ज पहले से ही सिर था और गिर पड़ती है गाज
  
जो ज़मीं से जुड़ के रहना मानते हैं फ़र्ज़-ए-जाँ
वो ही काँधे को झुकाए बन के रह जाते मिराज

हम भला बढ़ते ही कैसे आड़े आती है ये सोच  
"माँगने वाला गदा है सदका माँगे या खिराज"

खीचकर फिर से लकीरें तय करो तुम दायरे
मैं निकल जाऊँगी माथे ओढ़कर रस्मो-रिवाज

पंछियों के खेल या फिर तितलियों का बाँकपन
मौज से गर देख पाऊं सुधरे शायद ये मिज़ाज  



तरही मिसरा "माँगने वाला गदा है सदका माँगे या खिराज" आदरणीय शायर अल्लामा इक़बाल साहब की ग़ज़ल से है |

Followers

कॉपी राईट

इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं