मणि तारक ले गोद में
, सबमें बांटे आश
रहता थामे पोटली ,
वो बूढा आकाश
धरणी तो यह पल रही
तेरे अंक विशाल
प्रलय राग तू क्यूँ रचे सृजन हेतु दिक्पाल
मनों आकाश पितृ सम
हरे धरा संताप
देख पीड़ा बरस गया
खोकर धीरज आप
तृष्णा पीछे भागते
सुने न मन का शोर
कैसे सोयी रात थी
कैसे जागी भोर
प्रकृति के सम्मान
पर चोट करे सायास
कैसा तेरा रुदन था
कैसा तेरा हास
सप्तरंग मिलकर
करें जीवन सुधा प्रकाश
ऐसे रंग न बांटिये जो
नित करें हताश
शिव है लय की साधना
शिव प्रलय का रूप
शिव कला की छांव हैं
शिव ही मंगल धूप