Friday, September 13, 2013

दोहे

सिकुड़े गलियारे सहन ऊँची मन दहलीज
गलती माली की रही  कैसे बोये बीज

पूर्वाग्रह तो छोडिये मिलिए निज बिसराय
धरिय डली मुख नून की स्वाद मधुर कस पाय

अनुशासित होकर रहे उड़े पतंग अकास
भागी फिरे कुरंग सम  डोर पिया के पास

कब तक परछाई चले पूछ न कितनी दूर
धूप चढ़े सिर बावरी छाया थक कर चूर

शापित मानव कर्म से धरा रो रही आज
चील झपट के खेल के बदले ना अंदाज़


फिर कहीं गिरा नीम या बरगद छायादार
यूँ गाँव को निगल गया शहरों का विस्तार 

17 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन प्रस्तुती,धन्यबाद।

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  2. बहुत सुंदर, अर्थपूर्ण दोहे रचे हैं ... शुभकामनायें

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  3. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-09-2013) के चर्चामंच - 1369 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  4. बहुत ही बेहतरीन और सार्थक ।

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  5. बहुत खुबसूरत अर्थपूर्ण रचना!!

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  6. महानगर ने फैंक दी मौसम की संदूक ,

    पेड़ परिंदों से हुआ कितना बुरा सुलूक।

    बहुत सुन्दर दोहावली पढवाई आपने सार्थक हमारे वक्त से संवाद करती पर्यावरण के प्रति खबरदार करती।

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  7. बहुत ही सुन्दर चुटीले दोहे ... अपनी बात को मजबूती से रखते हुए ...

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  8. कब तक परछार्इं चले, पूछ न कितनी दूर,
    धूप चढ़ी सिर बावरी, छाया थक कर चूर।

    दोहों में काव्य का सम्पूर्ण सौंदर्य झलक रहा है।

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  9. सार्थक एवं सुन्दर दोहे हैं.. पढ़कर अच्छा लगा..

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  10. वन्दना जी दोहे अच्छे हैं । चूँकि यह एक सुपरिचित मात्रिक छन्द है इसलिये मात्राओं की गडबडी अखरती है ।

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  11. आदरणीय गिरिजा जी बहुत बहुत आभार ध्यान दिलाने के लिए कम्प्यूटर पर पहले से टाइप किया हुआ था संशोधन जोड़े बिना ब्लॉग पर डाल दिया था इसी से गलती हुई अब सुधार दिया है

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  12. बहुत सुन्दर और सार्थक दोहे...

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  13. waah ....dohon mein bhi mahir hain aap ....

    achha abhinav imroz patrikaa baal visheshaank nikaal rahe hain aap apni baal kavitayein bhej sakti hain whaan .....

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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