Monday, September 10, 2012

चलो ...नदी तक चलें



नींदें
जब
बही-खाते खोल कर
बैठ जाएँ
तो न जाने
कौन कौन से हिसाब
उलझ जाते हैं
कहीं बदगुमानियों के
कहीं आइनों पर आत्ममुग्ध अजगरों के
सूरज
जैसे बारिश के बाद
मुंह धो कर लौट आना चाहता है
और गर्द
फिर से उसे छूकर
मैला कर देती है
मन का कोई ज्वार
इन बहियों को बहा कर
 ले जा पाता नहीं
उतरते ज्वार के बाद भी
बचे रह जाते हैं
अनगिन हिसाब
आकर्षक शंख सीपियाँ नहीं
मोती भी नहीं
रह जाते हैं बस
रेत पर कुछ निशान
कुछ गहरे कुछ हलके
संशय के
अवचेतना के
क्या विचारों के उस छोर 
है कहीं कोई द्वार 
आस्था का
चेतना या विश्वास का
क्या द्वार के पार
बहती होगी कोई नदी
पत्थरों को
शिवाकार बनाती हुई
तो चलो ...

नदी तक चलें  










चित्र गूगल से साभार 

29 comments:

  1. वाह.....
    अद्भुत.......

    अनु

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  2. बहुत सुन्दर प्रभावी अभिव्यक्ति के लिये बधाई वन्दना जी,,,
    .....RECENT POST - मेरे सपनो का भारत

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  3. http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/09/blog-post_12.html

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  4. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  5. सच है .. जब नींद नहीं आती .. दुनिया भर की बातें मन में आ जाती हैं ... मन सोचते सोचते कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है ...
    सुन्दर अभिव्यक्ति ...

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  6. अनुपम आभा लिये सुन्दर अभिव्यक्ति ...

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  7. नदी जमकर बर्फ हो गई,आओ इसे पिघला दें अपने संबंधों की ऊष्मा से और उतार दें नाव फिर एक शुरुआत के लिए

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  8. आकर्षक शंख सीपियां नहीँ
    मोती भी नहीँ
    रह जाते हैँ बस
    रेत पर कुछ निशान
    कुछ गहरे कुछ हल्के

    बहुत सुन्दर, भावपूर्ण अभिव्यक्ति....।

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  9. बहुत ही प्यारी रचना ....

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  10. भावपूर्ण अभिव्यक्ति {
    आशा

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  11. बहुत सुन्दर रचना...

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  12. bahut sundar abhivyakti hai ..
    chetana pradan karti huii ...
    shubhkamnayen ..!!

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  13. सार्थक अभिव्यक्ति। मेरे नए पोस्ट 'समय सरगम' पर आपका इंतजार रहेगा।

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  14. नींद सदा से वही दिखाती आई है जिससे हम बच के भागना चाहते हैं.सरल शब्दों में ह्रदय की गहराई में उतरने वाली पंक्तियाँ. भई वाह.............

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  15. ऊँ नम: शिवाय

    चलिये नदी तक चलें.

    सुन्दर गहन प्रस्तुति.

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  16. मौलिक सोच को प्रदर्शित करती प्रशंसनीय कविता।

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  17. नींदें
    जब
    बही-खाते खोलकर
    बैठ जायें
    तो न जाने
    कौन-कौन से हिसाब
    उलझ जाते हैं।
    क्या कहने सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  18. वंदना जी बहुत सुंदर कविता. कुछ पंक्तियाँ तो एक दम अदभुत हैं. बहुत बधाई.

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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