Sunday, December 29, 2013

नक्श फ़रियादी है .....


इक तसल्ली इक बहाना जो मिले ताखीर का 
हम न पूछेंगे खुदाया क्या सिला तदबीर का

आँख पर बाँधे हुए कानून काली पट्टियाँ
हौसला कैसे बढ़े ऐसे में दामनगीर का

गुफ़्तगू अंदाज तेवर धार की पहचान हो
शख्स़ ऐसा क्या करेगा फ़िर भला शमशीर का

हम भी आखिर सीख लेंगे इस गज़लगोई का फ़न
हमक़दम होने लगा है जब हुनर अकसीर का

रेत के दाने मुसल्सल परबतों से तुल रहे
खास है मौसम कि या फिर खेल राह्तगीर का

रंज राहत धूप छाया इब्तिदा या इन्तिहा
नक्श फ़रियादी है किसकी शोखी ए तहरीर का

उलझनों से जूझ लेते हौसला तो था बहुत
इक सही सा मिल न पाया लफ्ज़ बस तकबीर का


****

तरही मिसरा जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की ग़ज़ल से 

नक्श फ़रियादी है किसकी शोखी ए तहरीर का 

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर गजल.... बधाई..

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 'निर्भया' को ब्लॉग बुलेटिन की मौन श्रद्धांजलि मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-12-13) को "यूँ लगे मुस्कराये जमाना हुआ" (चर्चा मंच : अंक-1477) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. उलझनों से जूझ लेते हौसला तो था बहुत
    इक सही सा मिल न पाया लफ्ज़ बस तकबीर का ..
    लाजवाब शेर है इस गज़ल का ... बुत ही उम्दा गज़ल ...

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  5. बेहतरीन..... एक से बढ़कर एक पंक्ति रची है ........

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  6. बहुर खुबसूरत रचना !
    नई पोस्ट मिशन मून
    नई पोस्ट ईशु का जन्म !

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  7. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल.....

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  8. कलम की धार चमक बिखेर रही है। और धार देती रहे।

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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