Sunday, May 25, 2014

‘अपना भी कोई खास निशाना तो है नहीं ‘

उद्देश्य मेरा भीड़ रिझाना तो है नहीं
जो चब चुका उसी को चबाना तो है नहीं

निर्दोष है मरीचिका बदनाम क्यूँ भला
जब सिन्धु सी हो प्यास अघाना तो है नहीं

उलझाते हैं नियम भले ही लाख नित बने
परिणाम इनका गाँठ छुड़ाना तो है नहीं

उनको सलाम तीर चला कर जो यह कहें
‘अपना भी कोई खास निशाना तो है नहीं ‘

अब दे रहे हैं दोष हवाओं के जोर को
क्यूँ कट गयी पतंग बहाना तो है नहीं 


आकर करे वो बात भला किसलिए कहो 
कारूं का मेरे पास खज़ाना तो है नहीं 


फिर फुरसतों में बैठ खंगालेंगे चाँदनी
वादा किया था कोरा बयाना तो है नहीं


‘अपना भी कोई खास निशाना तो है नहीं ‘
तरही मिसरा :  शायर जनाब मुज़फ्फर हनफ़ी साहब की एक ग़ज़ल से
  

Sunday, March 30, 2014

ग़ज़ल

जिस्मो जाँ अब अदालती हो क्या

साँस दर साँस पैरवी हो क्या


क्यूँ उदासी का अक्स दिखता है

ये बताओ कि आरसी हो क्या


थरथराते हैं लब जो रह-रहकर

कुछ खरी सी या अनकही हो क्या


रतजगों की कथाएं कहती हो

चांदनी तुम मेरी सखी हो क्या


शाम का रंग क्यूँ ये कहता है

"मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या"


मैं जरा खुल के कोई बात कहूँ

पूछे  हर कोई मानिनी हो क्या


माँ से विरसे में ही मिली हो जो

ए नमी आँखों की वही हो क्या



तरही मिसरा आदरणीय शायर जॉन एलिया साहब की ग़ज़ल से 

" मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या "

Sunday, March 16, 2014

कह मुकरियाँ








1


वो रंगीन मिजाजी भाये

रोम रोम गहरे रम जाये

कहने को तो केवल पाहुन

ए सखि साजन ? न  सखि  फागुन !


2


भेद हृदय के सारे खोले

जादू तो बस सिर चढ़ बोले

करे असर बौराये सर्वांग

का सखि साजन ? न सखि भांग !



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