पाखी बन मैं उडूं
विशाल तुम समंदर
अंक की सीप बनूँ
सलोना वह सपना
देखूं मैं नींद लूं
गंध इक मनभावन
सुवासित करे मानस
सुबह की मीठी धूप
हथेली में भर लूं
असीम तुम आकाश
पाखी बन मैं उडूं
स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना
साथ तेरा मेरा
धूप बारिश सा
यूँ तो अलग है
अस्तित्व दोनों का
किन्तु संग मिल बिखराते
सप्त रंग इन्द्रधनुष के
चाँदनी उंडेलती घडों शीतलता
रवि स्थित प्रज्ञ बन देता है प्रेरणा
किन्तु तुमने भी सराहा
गगन पट सांध्य समय का
हमराह चलते दोराहे पर किसी
राहे जुदा हो सकती हैं हमारी
किन्तु रिश्ता है हमारा
लक्ष्य और शुभेच्छा सा