Friday, May 28, 2010

पानी

ढूँढोगे मन हिरणा किधर गया पानी
आज अगर आँखों से उतर गया पानी

सीपी के गर्भ में रहकर दो चार दिन
मोती बन के देखो सँवर गया पानी

कभी बिगाड़े कभी संवारे गाँव घर
जब जब जिस रस्ते से गुज़र गया पानी

पूछा कैसे गुजारी ज़िन्दगी की शाम
क्यूँ माँ की आँखों से छलक गया पानी

सजा देगा उपवन बादल का कारवां
अंजुरी भर धोरों में बिखर गया पानी

उजड़ी कोई माँग सिसक रही राखियाँ
यूँ आतंकी आँख का मर गया पानी

सिरजेगा नवजीवन तपेगा दिनोदिन
यूँ ही नहीं समंदर ठहर गया पानी

झील ने गाया मर्यादा का गीत है
अंगुली भर छुअन से सिहर गया पानी ।

जवाब चाहिए

फूलों से कैसे दोस्ती बढाती है तितलियाँ क्यूँकर हाथों से फिसल जाती है मछलियाँ उड़ने को कैसे पंख फैलाती कोई चिड़िया 
बस्ते में मेरे कैसे सिमट सकती है दुनिया जी चाहता है मैना बुलबुल के गीत सुनने बारिश में भीगने का सपना लगा हूँ बुनने केवल तस्वीरों में टंगे देखे मैंने नदी झरने बंद कमरों में कौन आएगा कल कल का नाद भरने चारों तरफ है मेरे बंद कांच की खिड़कियाँ छूने को आसमां मचलती मेरी हथेलियाँ बैठूं न कभी छत पर देखी न मंदाकिनियाँ किताबों से कैसे नापूं चाँद तारों की दूरियां पंख तो है मेरे पास मुझे आकाश चाहिए मुझ जैसा ही नन्हा सा मुझे विश्वास चाहिए पिंजरे से बाहर खुली हवा का आभास चाहिए मन में उठते हर सवाल का मुझे ज़वाब चाहिए ।

प्रकृति और माँ

अपनी ज़रूरतें कांट छाँट
जिसने ज़िन्दगी को सिया है
हलक से बाहर न आने पाए
अरमानों को पिया है
उस माँ की स्नेहिल छाया से
क्रमशः दूर
और दूर होते
ऊँचाइयों पर बढ़ते
उसके लाडलों ने
हवाओं को
कमरे में
कैद कर लिया है
बौनी ज़रूरतों को ढूंढती
इच्छाएं बढती रही
भूसे के ढेर सी
उड़ा न दे कहीं कोई
साँसों को केप्सूल में
बंद कर लिया है
धरती का यह बेटा
सुविधाएँ जुटा रहा है
या सामान दर्द के बटोर रहा है
क्या जाने नादान
माँ की उंगली छोड़
कब बैसाखियों को थाम लिया है ।

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इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं