Tuesday, January 14, 2014

उलटी शिकायतें


महफ़िल की असलियत ये दिल पहचान तो गया

समझे गए मसीहा वो क्यूँ जान तो गया

पुरजे उड़ा के जब मेरी शख्सियत के कहा

उलटी शिकायतें हुई एहसान तो गया 



(तजमीनी कता : उलटी शिकायतें हुई एहसान तो गया)

Saturday, January 11, 2014

'जानता कौन है पराई चोट'

वज्न
2122   1212   22

पैरवी मेरी कर न पाई चोट

पास रहकर रही पराई चोट



फलसफ़े अनगिनत सिखा देगी

अस्ल में करती रहनुमाई चोट



महके चन्दन घिसें जो सिल पर तो

रोता कब है कि मैनें खाई चोट



सब्र का ही मिला सिला हमको

सहते रहकर मिली सवाई चोट



तन्हा ढ़ोता है दर्द हर इंसाँ

क्यूँ तू रिश्ते बढ़ा न पाई चोट
 

रस्म केवल मिज़ाजपुर्सी भी

'जानता कौन है पराई चोट'



उठ ही पाये न देख ही पाये 

मुस्कुराई कि खिलखिलाई चोट 


***
तरही मिसरा आदरणीय  फ़ानी बदायुनी साहब की ग़ज़ल से 

Sunday, January 5, 2014

पापा कहते हैं बड़ा काम करेगा


अब भी झांकती हैं
चश्मे के पीछे से वर्जनाएं
अभिलाषाएं आज भी
क़ैद हैं मुठ्ठियों में
जिन्हें बगल में दबाये
खड़े होते हो तुम
परछाइयों की तरह
कि जब भी चाहता हूँ कोई
लक्ष्मण-रेखा लाँघना
सोचता था हो जाऊँगा बड़ा
इतना कि मेरा बेटा
नहीं ताकेगा पडोसी की
लाल साईकिल
भरा रहेगा फ्रिज
चाकलेट टॉफी से
व कमरा उन खिलौनों से
जिन्हें हम देखा करते थे दूर से
कमरा आज वाकई भरा है
खिलौनों से
जहाँ तुम्हारा लाडला पोता 
बैठा है रूठा हुआ
कि दिलवाया नहीं प्ले-स्टेशन
और ना ही देता हूँ उसे
स्कूटर चलाने की इजाजत
क्योंकि महज सातवीं में है वो
और कमरे की दहलीज पर
अपनी ऊष्मा से
बर्फ पिघलाते हुए तुम
उसे सहलाते समझाते
दे रहे हो सांत्वना मुझे
कि कामनाओं के असीम आकाश से
अनुकूल सितारे चुन लेना ही
होता है
बड़ा काम

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