अब भी झांकती हैं
चश्मे के पीछे से वर्जनाएं
अभिलाषाएं आज भी
क़ैद हैं मुठ्ठियों में
जिन्हें बगल में दबाये
खड़े होते हो तुम
परछाइयों की तरह
कि जब भी चाहता हूँ कोई
लक्ष्मण-रेखा लाँघना
सोचता था हो जाऊँगा बड़ा
इतना कि मेरा बेटा
नहीं ताकेगा पडोसी की
लाल साईकिल
भरा रहेगा फ्रिज
चाकलेट टॉफी से
व कमरा उन खिलौनों से
जिन्हें हम देखा करते थे दूर से
कमरा आज वाकई भरा है
खिलौनों से
जहाँ तुम्हारा लाडला पोता
बैठा है रूठा हुआ
कि दिलवाया नहीं प्ले-स्टेशन
और ना ही देता हूँ उसे
स्कूटर चलाने की इजाजत
क्योंकि महज सातवीं में है वो
और कमरे की दहलीज पर
अपनी ऊष्मा से
बर्फ पिघलाते हुए तुम
उसे सहलाते समझाते
दे रहे हो सांत्वना मुझे
कि कामनाओं के असीम आकाश से
अनुकूल सितारे चुन लेना ही
होता है
बड़ा काम