स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना
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Saturday, October 8, 2011
Tuesday, October 4, 2011
महक उठी मेहंदी
आशा आई खिडकी के रस्ते
या सूरज की परछाई
महक उठी मेहंदी हाथों में
जब याद तुम्हारी आई
सदियों से गुम-सुम बैठी थी
आहट ये किसकी आई
परस गयीं तेरी सासे
या छेड़ गयी पुरवाई
पुलक उठा मन भीगे पत्तों सा
गालों पर अरुणाई
तुम गीत प्रीत का बनकर आये
या गूँज उठी शहनाई
Sunday, September 18, 2011
ग़ज़ल (आओ हवा की खामोशियाँ ....)
पत्तों की मानिंद नेह नदी में बहें हम ।
खट्टे मीठे धागों से ऋतुराज बुने हम ।
गुमनाम ही सही अफसाना अलग बनें हम ।
दस्तक दे खुलवायें मन आवाज सुने हम ।
रिश्ते फिर बनाए फिर से खतूत लिखें हम ।