Saturday, October 8, 2011

आज़ादी

सहज है फडफडाना
पिंजरों में
बंधके कैसे
कोई रह पायेगा
सूरज अगर
बाँध ले किरणों को
जीवन
धरती पर
कहाँ रह जाएगा
मोडना संभव है
धाराओं को
बंधन नदी पर
प्रलय बन जाएगा
खुशबू फूलों में
पवन मुठ्ठी में
रुकी है ना रोक पायेगा
खोल दो खिड़कियाँ
बहने दो हवा
गीत आजाद पाखी गुनगुनायेगा

Tuesday, October 4, 2011

महक उठी मेहंदी


आशा आई खिडकी के रस्ते

या सूरज की परछाई

महक उठी मेहंदी हाथों में

जब याद तुम्हारी आई

सदियों से गुम-सुम बैठी थी

आहट ये किसकी आई

परस गयीं तेरी सासे

या छेड़ गयी पुरवाई

पुलक उठा मन भीगे पत्तों सा

गालों पर अरुणाई

तुम गीत प्रीत का बनकर आये

या गूँज उठी शहनाई



Sunday, September 18, 2011

ग़ज़ल (आओ हवा की खामोशियाँ ....)

आओ हवाओं की खामोशियाँ सुनें हम,
पत्तों की मानिंद नेह नदी में बहें हम ।



बदलते मौसम की कहानी है जिन्दगी,
खट्टे मीठे धागों से ऋतुराज बुने हम ।

गिनती की साँसें लेकर जीते हैं सभी,
गुमनाम ही सही अफसाना अलग बनें हम ।

बहुत दिनों से है बंद कपाट उस घर का,
दस्तक दे खुलवायें मन आवाज सुने हम ।

महक सौंधी सी कैद पुरानी चिट्ठी में,
रिश्ते फिर बनाए फिर से खतूत लिखें हम ।



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