Wednesday, October 30, 2013

ग़ज़ल

उफ़क पे हो न सही फ़ाख्ता उड़ाने से                 
हुनर की पैठ बने पंख आजमाने से

चलो समेट चलें बांधकर उन्हें दामन
मिले जो फूल तिलस्मी हमें ज़माने से

रही उदास नदी थम के कोर आँखों की
पलेंगे सीप में मोती इसी बहाने से

निकल न जाए कहीं ये पतंग इक मौका
अगर गया तो रही डोर हाथ आने से

बुझे अलाव हैं सपने मगर अहद अपना
मिली हवा तो रुकेंगे न मुस्कुराने से

शफ़क मिली है वसीयत जलेंगे बन जुगनू               
इक आफ़ताब के बेवक्त डूब जाने से

अभी तो आये पलट कर तमाम खुश मौसम
बँटेंगे खास बताशे छुपे ख़ज़ाने से
  

(उफ़क = क्षितिज, सही = हस्ताक्षर )
(शफ़क = सूर्योदय या सूर्यास्त की लाली ) 


तरही मिसरा मशहूर शायर  जनाब इकबाल अशर साहब  की ग़ज़ल से 

16 comments:

  1. इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :-31/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -37 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....

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  2. बेहतरीन ग़ज़ल......
    हर शेर बहुत ही सुन्दर.........
    दिल से दाद दे रही हूँ.
    अनु

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  3. BAHUT SUNDAR GAZAL HAI.
    mere blog par aapka swagat hai
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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  4. दीप पर्व आपको सपरिवार शुभ हो!
    कल 02/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  5. लाजवाब गज़ल ... हर शेर कमाल है ...
    दीपावली के पावन पर्व की बधाई ओर शुभकामनायें ...

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  6. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...हरेक शेर बहुत उम्दा और दिल को छू गया...दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें!

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  7. वाह .... बेहतरीन गज़ल

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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