Wednesday, May 22, 2013

कीमत क्यूँ कम आंकी जाये

कोई तो हमको समझाये
सच क्यूँ सूली टांगा जाये

गम से कोई रिश्ता होगा
उन आँखों सहरा लहराये

बस्ती में बेमौसम ही क्यूँ
आशाओं के बादल छाये

झाँसा देने की फितरत है
झोली भर वादे ले आये

जुगनू ने झिलमिल कोशिश की
कीमत क्यूँ कम आंकी जाये

बाज़ी तो हमने जीती थी
तमगे उनके हिस्से आये

सींचे केवल पत्ते शाखें
क्यूँ ऐसे बादल लहराए

मेरे सपनों के आँगन में
गुलमोहर काँटे बिखराए

फसलें जो तुमने बोई थीं

सौदागर सौदा कर आये 

14 comments:

  1. बाज़ी तो हमने जीती थी
    तमगे उनके हिस्से आये... बहुत सुन्दर गजल..

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  2. बहुत सुन्दर सृजन.

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  3. वाह ... बेहतरीन

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  4. बाज़ी तो हमने जीती थी
    तमगे उनके हिस्से आये ..

    इस कड़वी सचाई को मान लेने से दुख कम हो जाता है ... यही सच है आज का ..
    हर शेर कुछ सचाई कहता हुआ है ...

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  6. जुगनू ने कोशिश तो की थी ,कीमत कम क्यूँ आँकी जाए ...वाह । बहुत सुन्दर ।

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  7. बढिया रचना
    बहुत सुंदर


    मेरे TV स्टेशन ब्लाग पर देखें । मीडिया : सरकार के खिलाफ हल्ला बोल !
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/05/blog-post_22.html?showComment=1369302547005#c4231955265852032842

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  8. वाह....
    बहुत सुन्दर!!!
    सींचे केवल पत्ते शाखें
    क्यूँ ऐसे बादल लहराए

    मेरे सपनों के आँगन में
    गुलमोहर काँटे बिखराए
    बेहतरीन....

    अनु

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (24-05-2013) के गर्मी अपने पूरे यौवन पर है...चर्चा मंच-अंकः१२५४ पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  10. भाई वाह ..
    सरलता से अतनी प्यारी अभिव्यक्ति !
    बधाई इस प्यारी कलम को !

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  11. खूबसूरत अभिव्यक्ति
    उम्दा गजल

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  12. बहुत सुन्दर रचना....

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  13. बहुत खूबसूरत रचना...

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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