Thursday, July 15, 2010

पुराने चावल

इस दिवाली पर ननिहाल में सारा परिवार इकठ्ठा हुआ था । दिन भर रसोई में कुछ न कुछ चलता रहता था । नानी ने कुछ चावल अलग रखवा रखे थे । उनका कहना है कि पुराने चावल ज्यादा अच्छे बनते हैं । बासमती चावल तो अपने नाम के अनुरूप ही बनते ही घर को सुवासित कर देते हैं ।
दिवाली के रोज उस समय घर पर ज्यादा लोग नहीं थे । एक व्यक्ति पीठ पर बोरी लादे घर में दाखिल हुआ । उसने अन्दर आकर कहा " प्रसाद ले लो । " चौक में खड़े सुनीति के मामा ने उस व्यक्ति को मनाकर दिया ।
अचानक किसी अनजान व्यक्ति का घर में यूँ दाखिल हो जाना शहरी लोगों के लिए आश्चर्य का विषय था।
" लेकिन बाबूजी मैं तो हर साल प्रसाद दे जाता हूँ । " व्यक्ति ने कहा ।
"भाई हम बाजार से प्रसाद ले आये हैं । "मामा ने जवाब दिया । इसी बीच नानी भी वहां चली आई थी । उस व्यक्ति ने नानी से भी प्रसाद लेने का आग्रह किया परन्तु नानी ने भी दृढ़ता से मना कर दिया ।
व्यक्ति के चेहरे पर निराशा के भाव उतर आये और वह लौट गया । उसके चले जाने के बाद शहरों में बढती धोखा -धडी की घटनाओं की चर्चा चल पड़ी और उस व्यक्ति का आचरण भी उन्ही सबसे जुड़कर संदेह के घेरे में आ चुका था।
अचानक जैसे बिजली कौंधी !"अरे !ये तो हमारे गाँव का रहने वाला है । यहाँ बाजार में चने खील मुरमुरे बेचा करता है ....और हर साल दीवाली पर अपने गाँव की लड़कियों के यहाँ खील बताशे बांटने आता है ।"
नानी बैचैन हो उठी थी ।
अनजाने ही त्यौहार के दिन ,अपने गाँव के भाई का अपमान कर बैठी थी । "क्या करूँ ,क्या न करूँ ?"आँखों में आंसू भर आये ।
"मैं जरा पड़ोस में देख आऊंउनके यहाँ भी तो गया होगा ।" कहकर नानी नंगे पांव ही चल दी । कुछ ही देर में वह व्यक्ति और नानी घर आ गए ।
नानी अपनी याददाश्त को कोसते हुए बार बार माफ़ी मांग रही थी । उनके उस मुस्लिम भाई की आँखों में भी आंसू थे ।
" बेटी जरा एक बर्तन तो देना ।" व्यक्ति ने सुनीति से कहा ।
बर्तन में प्रसाद लेकर सुनीति ने पूछा "आपके लिए चाय बना दूँ ?"
"बहन बेटियों के यहाँ मैं कुछ नहीं खाता ।" व्यक्ति ने जवाब दिया ।
कुछ देर नानी से अपने गाँव के पुराने परिचितों को याद ताजा कर और दुःख -सुख पूछकर वह चल दिया ।
सुनीति को भाई बहन के इस नि :स्वार्थ प्रेम की सुगंध रसोई में पकते पुराने चावलों की सुवास सी महसूस हो रही थी ..........

Tuesday, July 13, 2010

ग़ज़ल (इम्तिहान बाकी है ..)

तू थक गया है क्यूँ अभी इम्तिहान बाकी है
चल उठा पतंग तेरे लिए आसमान बाकी है


हवा जब करके चलती है रेत पर चित्रकारी
नहीं देखती मुड़कर क्या क्या निशान बाकी है

स्वाभिमान तलक जिसने मेरा रख लिया गिरवी
कहता है बेचने को अभी सामान बाकी है

दुनिया ये तेरी मनचाही दुनिया कैसे हो
तेरे मेरे भीतर थोडा शैतान बाकी है

यूँ तो कहने को हम आजाद हैं लेकिन
मुश्किल यही है ,खुद की पहचान बाकी है

दिल की मासूमियत आँगन में भीगने चली
गगन की झोली से बरखा का दान बाकी है

चलो लड़े-झगडे और लिखे इतिहास फिर बोझिल
अभी मासूम चेहरों पर मुस्कान बाकी है

एक -एक करके कहानियां सभी सुना चुके हम
जिद करें हैं बच्चे ,दक्षिणा यजमान बाकी है

गुडिया , लोरी ,थपकी और मीठी यादें माँ
छूटा तेरी गोदी में मेरा सामान बाकी है ।

Saturday, July 10, 2010

नवजीवन का सेतु

सोचा था
चलेंगे उम्र भर
नदी के दो किनारों की तरह
हर कदम साथ साथ
निकले हिम की गोद से
श्वेत फेन पर
सतरंगी सपने सजाये
कुछ दूर ही चले थे
कि बिछड़ी वो सखियाँ
वो चंचल तरंगे
नयी भी मिली
उछाह से भरकर
पर खो गयी
भीड़ का हिस्सा होकर
साथी जो मजबूत थे
पत्थरों की तरह
तेज थी धार जिनकी
समय की सान पर
घिस गए
कुछ इस तरह
कि
धार भोंथरी हुई
या फिर
चिकना बना लिया खुद को
बहते जाने के लिए
पर
बहते भी कब तक
बहाव शिथिल हुआ
तो
रुक गए वे भी
गलत थे हम
जो किनारों के
चलने की बात करते थे
वास्तव में
किनारे कहीं नहीं जाते
बहती है
सिर्फ नदी!
गंतव्य है उसका
वो
अनंत अथाह सागर
खारा है
मगर अपना है
जीवन का हेतु
वो नवजीवन के सेतु !

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