Sunday, May 22, 2016

हलक जड़ी है फाँस


आत्ममुग्ध मानव करे प्रकृति से परिहास
खेल रहा नित आग से देकर नाम विकास

बूँद बूँद की याचना  हलक जड़ी है फाँस
मजबूरी मजदूर की कर्जदार है साँस
मंगल क्या एकादशी रोज रहे उपवास
खेल रहा नित आग से देकर नाम विकास


प्याऊ लगवाना जहाँ इक पवित्र था काम
बोतल पानी की बिके आज वहां अविराम
जीवन मूल्य अमोल का नित देखें हम ह्रास
खेल रहा नित आग से देकर नाम विकास


त्रस्त हो रहा प्यास से है मानव  बेहाल
गायब हैं इस दृश्य से उनका कौन हवाल
पंछी पौधे मूक पशु सब झेलें संत्रास
खेल रहा नित आग से देकर नाम विकास



चित्र : नेट पर काव्य आयोजन से साभार 




Thursday, February 11, 2016

कोहरे के पार ...वसंत


अलसाई सी कुछ किरणें
अंगड़ाई ले रही होंगी
या फिर 
घास पर फैली ओस
बादलों से मिलने की होड़ में
दम आजमा रहीं होंगी
वो तितलियाँ
जो धनक पहन कर सोई थीं
अपनी जुम्बिश से
आसमां में रंग भर रही होंगी
आखिर
तिलिस्म ही तो है 
कोहरा
अपनी झोली में
न जाने
क्या कुछ छुपाये होगा  
उस पार
शायद वसंत होगा

Tuesday, October 13, 2015

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

जिस माटी से चूल्हा बनाती है उसी से गण नायक रचती है ...... 

कक्षा 5 की छात्रा द्वारा बिना किसी ट्रेनिंग के खूबसूरत प्रतिमा का सृजन

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