Thursday, February 11, 2016

कोहरे के पार ...वसंत


अलसाई सी कुछ किरणें
अंगड़ाई ले रही होंगी
या फिर 
घास पर फैली ओस
बादलों से मिलने की होड़ में
दम आजमा रहीं होंगी
वो तितलियाँ
जो धनक पहन कर सोई थीं
अपनी जुम्बिश से
आसमां में रंग भर रही होंगी
आखिर
तिलिस्म ही तो है 
कोहरा
अपनी झोली में
न जाने
क्या कुछ छुपाये होगा  
उस पार
शायद वसंत होगा

Tuesday, October 13, 2015

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

जिस माटी से चूल्हा बनाती है उसी से गण नायक रचती है ...... 

कक्षा 5 की छात्रा द्वारा बिना किसी ट्रेनिंग के खूबसूरत प्रतिमा का सृजन

Friday, May 15, 2015

न डर तू सलोनी....




बहुत तेज है धूप संसार की
सुलभ छाँव तेरे लिए प्यार की
उदासी मिटा वेदना मैं हरूँ
अरी लाडली तू बता क्या करूँ

व्यथा पीर आये सताए मुझे
मगर आँच छूने न पाए तुझे
न डर तू सलोनी कि मैं साथ हूँ
धरे आज काँधे सबल हाथ हूँ

सुना था कि कहते तुझे सब सदय
धरा जब हिली तो न कांपा हृदय
बता लेख कैसे विधाता लिखा
कहीं क्रूर कुछ भी न तुझको दिखा

सरलमन बहन तू सरस काव्य है
मधुरतम प्रियंकर व स्तुत भाव्य है
बड़ा तो नहीं मैं मगर  भ्रातृ हूँ
सुरक्षा वचन से बँधा कर्तृ हूँ 

              -वंदना 






चित्र गूगल से साभार 
इस चित्र पर कविता आयोजन भी नेट से साभार 

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