स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना
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Thursday, November 20, 2014
Wednesday, November 5, 2014
दिवाली में
सजी दहलीज कंदीलें बुलाती हैं दिवाली में
कतारें नवप्रभावर्ती रिझाती हैं दिवाली में
अमा की रात में कैसे लिखे वो छंद पूनम के
हुनर यह दीपमालाएं सिखाती हैं
दिवाली में
भुलाकर रिश्तों के बंधन डटें हैं सीमा पर भाई
तो बहनें चैन की बंसी बजाती
हैं दिवाली में
जले दीपक से दीपक जब खिले है खील सा हर मन
तो गलियाँ गाँव की हमको बुलाती
हैं दिवाली में
दिये को ओट में रखकर नयन के ज्योतिवर्धन को
ख़ुशी से माँ मेरी काजल बनाती हैं दिवाली में
अकेले भी करो कोशिश अगर तम को हराने की
सफलताएँ सगुन मंगल मनाती हैं दिवाली में
हठीली आग रख सिर पर निभाती है कसम कोई
फिज़ाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में
जला कब दीप है बोलो निरी माटी की यह रचना
उजाले बातियाँ स्नेहिल सजाती हैं
दिवाली में
अनूठा दृश्य रचते हैं कतारों में सजे दीपक
विभाएं शुद्ध अनुशासन दिखाती है दिवाली में
तरही
मिसरा “ फिज़ाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में“
जनाब
एहतराम इस्लाम साहब की ग़ज़ल से
चित्र गूगल से साभार
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ग़ज़ल/अगज़ल
Wednesday, June 11, 2014
‘ फूल कौन तोड़ेगा डालियाँ समझती हैं '
मुस्कुरा किसे देखे बालियाँ समझती हैं
लाज के हैं क्या माने कनखियाँ समझती हैं
रंग की हिफ़ाज़त में क्यूँ न घर रहा जाए
बारिशों की साजिश को तितलियाँ समझती हैं
शूल ये नहीं साहब सिर्फ है सजगता बस
‘ फूल कौन तोड़ेगा डालियाँ समझती हैं '
सिसकियाँ सुने बेबस कटते मूक पेड़ों की
दाम क्या तरक्की का आरियाँ समझती हैं
हौसलों की तक़रीरें सर्द पड़ ही जाएँ जब
खून की रवानी को धमनियाँ समझती हैं
पत्थरों को सहकर भी फल हुलस के बांटेंगी
नन्हें मन की चाहत को बेरियाँ समझती हैं
सुबह इक नयी होगी इक नया सा युग होगा
ओस की प्रतीक्षा को रश्मियाँ समझती हैं
( तरही मिसरा आदरणीय शायर जनाब दानिश अलीगढ़ी साहब की ग़ज़ल से )
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