Friday, October 11, 2013

परंपरा और परिवार

स्वस्थ परम्पराएं
तराशती हैं
परिवार
ठीक वैसे  ही
जैसे बेतरतीब
किसी जंगल को
सांचे में ढालकर
दे दिया जाता है
रूप सुन्दर बगीचे का
परम्पराएं
होती हैं पोषित
देश और काल के
अनुशासन में
निरंतर
समष्टि के चिन्तन से
बांधती हैं
मर्यादित किनारे स्वच्छंद नद नालों के
और
बचा ले जाती है
क्षीण होने से
किसी धारा को
तभी तो
शिव कही जाती हैं
परम्पराएं  !!!

Tuesday, October 8, 2013

भागीरथ के देश में


प्राचार्य जी के साथ विद्यालय से निकल के कुछ दूर चले ही थे कि मुखिया जी ने पुकार लिया | बैठक में काफी लोग चर्चामग्न थे |

बढती बेरोजगारी और आतंकवाद के परस्पर सम्बन्धों  से लेकर शिक्षित लोगों के ग्राम पलायन तक अनेक मुद्दों पर सार्थक विचार गंगा बह रही थी |

कुछ देर बाद जब अधिकांश लोग उठकर चले गए तो मुखिया जी ने प्राचार्य जी से कहा –
“वो रामदीन के नवीं कक्षा वाले छोरे को पूरक क्यों दे दी ?”

“मुखिया जी लड़के की स्कूल में 30 प्रतिशत हाजिरी भी नहीं होती और परीक्षा की कॉपियाँ बिलकुल खाली छोड़ रखी थी फिर भला ......”

“मास्टर जी सरकार तो साक्षरता बढ़ाने की बात करती है और आप बच्चों की पढाई छुडवाने में लगे हैं |

“मुखिया जी, साक्षरता के नाम पर ही आठवीं तक बच्चों को फ़ेल नहीं किया जाता | परिणामत:  मेहनत के अभाव में उस स्तर तक  बच्चा सामान्य गणित और अंग्रेजी की बात तो जाने दीजिये , हिंदी में भी अपनी बात अभिव्यक्त नहीं कर पाता और फिर हमें दसवीं का परिणाम भी तो देखना होता है |” मैं बिना बोले न रह सका |

“दसवीं तो फिर देखना..... अभी तो उसे पास करने का ध्यान रखो बस इसीलिये बुलवाया था |” कहकर मुखिया जी ने हाथ जोड़ हमें अपने हाव भाव से विदाई दे दी थी |


अब मैं सोच रहा था कि “क्यूँ भागीरथ के देश में अब कोई गंगा चौपाल की सीढियां तक नहीं उतर पाती|” 

Monday, September 30, 2013

ग़ज़ल







हुआ सम्मान नारी का यहाँ नर नाम से पहले

सिया हैं राम से पहले व राधे श्याम से पहले


समेटा है मेरा अस्तित्व धारोंधार  तुमने जब

विशदता मिल गयी जैसे कहीं विश्राम से पहले


खिंची रेखा कोई जब भी बँटे आँगन दुआरे तो

कसक उठती है सोचें हम जरा परिणाम से पहले


ग़ज़ल का जिक्र जब होगा कशिश की बात गर होगी

तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले


बुझा  मत आस का दीपक यकीनन भोर आएगी

अँधेरा है जरा गहरा मगर अनुकाम से पहले


अगर ममता ने बाँधी है परों से डोर कुछ पक्की

यकीनन लौट आयेंगे परिंदे शाम से पहले


विरासत में मिली खुशबू खिले हैं रंग बहुतेरे

छुआ आँचल कहो किसने कि जिक्र-ए-नाम से पहले

                                                -वंदना 



(तरही मिसरा  -   "तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले"  जनाब क़तील शिफाई साहब  की एक ग़ज़ल से )

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