स्वस्थ परम्पराएं
तराशती हैं
परिवार
ठीक वैसे ही
जैसे बेतरतीब
किसी जंगल को
सांचे में ढालकर
दे दिया जाता है
रूप सुन्दर बगीचे का
परम्पराएं
होती हैं पोषित
देश और काल के
अनुशासन में
निरंतर
निरंतर
समष्टि के चिन्तन से
बांधती हैं
मर्यादित किनारे स्वच्छंद नद नालों के
और
और
बचा ले जाती है
क्षीण होने से
किसी धारा को
तभी तो
शिव कही जाती हैं
परम्पराएं !!!