Monday, August 8, 2011

एकले चलो तो

तुम जो चलो तो मैं भी चल ही दूँगी हवा मंथर मंद सी पुष्प संग सुगंध सी कहीं यह पढ़ा था दिल ने भी कहा था एकला चलो रे आकाश को बढ़ो रे छू लिया गगन को पा लिया सपन को शून्य सा लगा था मोती बिन बिंधा था जब तलक चमक थी हँसी थी खनक थी सोचते रहे हम परछाइयां रहेगी पर धूप जब ढली तो तन्हाईयाँ बची थी  
अकेले गर  चलो तो भाव संग रहे यह अकेले चल पड़े हो अकेले पर रहो न  
शून्य से बढे हम 
 एक से जो दश हों शत हों सहस्त्र हों न छलना छल सकेगी न प्रवंचना रहेगी नेक जब चलन हों कांटे या चमन हों 
पग ये बढ़ चलेंगे 
अकेले हम  चले  हैं मगर अकेले ना रहेंगे

Saturday, July 30, 2011

गज़ल(चमकते हुए तारों को...)

चमकते हुए तारों को आँखों में पनाह दे,
ना किस्मत से इनको जोड और एतराज दे ।


दिल पर उग आये अनचाहे मकडी के जाले,
पोंछ कर इनको हर रिश्ते को नई निगाह दे । 


कभी जमीं तो कभी आसमाँ को तरसते लोग,
होगा चाँद मुट्ठी में जडों पे ऐतबार दे । 


मुमकिन है राम सा भाई मिले कृष्ण सा सखा,
अपनी आस्था विश्वास को फिर से निखार दे ।


इतिहास की भूलों से ये सीखेंगे भला क्या,
कहते हैं आगे की सुध ले पिछली बिसार दे ।


Sunday, July 24, 2011

लौटना चाहता हूँ

माँ
याद आती है
छवि तुम्हारी
द्रुतगति से
काम में तल्लीन
कहीं नीला शांत रंग
कहीं उल्लसित गेरू से पुती
दीवारें कच्ची
माटी के आँगन पर उभरती
तुम्हारी उँगलियों की छाप थी
या कि रहस्यमयी नियति की
तस्वीर सच्ची
तुम नहीं थी
आज की नारी जैसी
जो बदलती है करवटें रात भर
और नहीं चाहती
परम्परा के बोझ तले
साँसें दबी घुटी सी
पर चाहती है गोद में बेटा
सिर्फ बेटा
और बेटे से आस पुरानी सी
मैं सुनता हूँ उसकी सिसकती साँसे
विविध रंगों के बीच
मुरझाए चेहरों की कहानी कहती
दीवार पर लटकी
किसी महंगी तस्वीर सी
और उधर मैं
फोन के एक सिरे पर
झेलता हूँ त्रासदी
तेरी गोद में
छुप जाने को बैचैन
नहीं कमा पाया मनचाहा
ना ही कर पाया हूँ मनचीती
लौटना चाहता हूँ
तेरे आँचल की छाँव में
डरता हूँ
अगले कदम की फिसलन से
प्रतिनायक बना खड़ा है
मेरा व्यक्तित्व
मेरी प्रतिच्छवि बनकर
क्या सचमुच
मैं यही होना चाहता था
जो आज हूँ
पर सच है
मैं लौटना चाहता हूँ !
मैं लौटना चाहता हूँ !!
लौटना चाहता हूँ !!!

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