अकेले गर चलो तो
भाव संग रहे यह
अकेले चल पड़े हो
अकेले पर रहो न
शून्य से बढे हम
एक से जो दश हों
शत हों सहस्त्र हों
न छलना छल सकेगी
न प्रवंचना रहेगी
नेक जब चलन हों
कांटे या चमन हों
पग ये बढ़ चलेंगे
अकेले हम चले हैं
मगर अकेले ना रहेंगे
स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना