तीव्र गंध की दुनिया में
वो एक रसायन
न पाया
ह्रदय चल पड़ा
स्वरों की अनंत यात्रा पर
मंद्र से तार सप्तक तक
बंदिशों की दुनिया में भी
इच्छित सुर न पाया
कई बार खंगाला छंदों को
अनुभूत मानसिक द्वंद्वों को
कभी तेल जल रंगों में
जीवन के विविध अंगों में
कभी अपनी कभी दूसरों की
नज़र से देखा
कभी धूल कभी फूल
में खोजा
पर डूबने के डर से
सदा किनारे पर डेरा जमाया
इसीलिए ज़िन्दगी में
खुद को
हाशिये पर पाया !
स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना
Labels
- . मां (5)
- कथा लघु -कथा (19)
- कविता (74)
- कह मुकरियाँ (1)
- क्षणिकाएं (1)
- ग़ज़ल/अगज़ल (59)
- चिंतन (5)
- छंद आधारित (2)
- दोहागीत (2)
- दोहे (7)
- नवगीत (1)
- मनन (2)
- मुक्तक /कता (1)
- लेख (8)
- वसंत (1)
- व्यंग्य (2)
- स्त्री विमर्श (28)
Saturday, July 3, 2010
Friday, July 2, 2010
ग़ज़ल(अच्छे वक़्त में )
अच्छे वक़्त में कुछ देर चाँदनी बिखर जाती है
बुरे वक़्त से तो सभी की सीरत संवर जाती है
वो जो अकेला है वही रूहानियत के करीब है
भरी भीड़ में शख्सियत टुकड़ों में बिखर जाती है
ढूंढता फिरता है खुद को कहाँ दुनिया ये शीश महल
चारों तरफ हैं आईने जिस ओर नज़र जाती है
ज़िन्दगी तेरी या मेरी पानी पे लिखी कहानी
नई मौजों में कब परछाई ठहर पाती है
ये दुनिया का मेला बच्चों सी तबियत अपनी
न पूछो कि ऊँगली कब किस ओर मचल जाती है
बुरे वक़्त से तो सभी की सीरत संवर जाती है
वो जो अकेला है वही रूहानियत के करीब है
भरी भीड़ में शख्सियत टुकड़ों में बिखर जाती है
ढूंढता फिरता है खुद को कहाँ दुनिया ये शीश महल
चारों तरफ हैं आईने जिस ओर नज़र जाती है
ज़िन्दगी तेरी या मेरी पानी पे लिखी कहानी
नई मौजों में कब परछाई ठहर पाती है
ये दुनिया का मेला बच्चों सी तबियत अपनी
न पूछो कि ऊँगली कब किस ओर मचल जाती है
लेबल:
ग़ज़ल/अगज़ल
Thursday, July 1, 2010
आत्मदीप्त उमरिया
दीये की थरथराती लौ
तेज हवाओं से लडती हुई
जिजीविषा की कथा
मौन रहकर कहती हुई
मौन ही तो सत्य है
जब आज के विज्ञापन युग में
आंधी तूफ़ान
हाशिये से उठकर
मुख्य पृष्ठपर आ गए हैं
और आदमी
अपने अनुपम लाक्षाग्रहों में क़ैद
भावों की उर्वर धरा पर
प्रस्तर वन उगाते हुए
भय शास्त्र की पोथियाँ
बांचते हुए
दिया जलाते डरता है
अंधेरों में सुरंगें खोजता है
उस मकड़ी की तरह
जो उलझकर रह गयी है
अपने ही जाल में
अंततः मर जाने के लिए
वीरगति तो नहीं कहेंगे इसे
फिर क्यों न
हवाओं से उलझे
जलाएं
हाँ जलाएं
एक दिया सा अपने भीतर
और
पलने दे जुगनू सी
आत्मदीप्त उमरिया अपने भीतर !
तेज हवाओं से लडती हुई
जिजीविषा की कथा
मौन रहकर कहती हुई
मौन ही तो सत्य है
जब आज के विज्ञापन युग में
आंधी तूफ़ान
हाशिये से उठकर
मुख्य पृष्ठपर आ गए हैं
और आदमी
अपने अनुपम लाक्षाग्रहों में क़ैद
भावों की उर्वर धरा पर
प्रस्तर वन उगाते हुए
भय शास्त्र की पोथियाँ
बांचते हुए
दिया जलाते डरता है
अंधेरों में सुरंगें खोजता है
उस मकड़ी की तरह
जो उलझकर रह गयी है
अपने ही जाल में
अंततः मर जाने के लिए
वीरगति तो नहीं कहेंगे इसे
फिर क्यों न
हवाओं से उलझे
जलाएं
हाँ जलाएं
एक दिया सा अपने भीतर
और
पलने दे जुगनू सी
आत्मदीप्त उमरिया अपने भीतर !
लेबल:
कविता
Subscribe to:
Posts (Atom)
Followers
कॉपी राईट
इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं