Saturday, July 3, 2010

हाशिये पर

तीव्र गंध की दुनिया में
वो एक रसायन
न पाया
ह्रदय चल पड़ा
स्वरों की अनंत यात्रा पर
मंद्र से तार सप्तक तक
बंदिशों की दुनिया में भी
इच्छित सुर न पाया
कई बार खंगाला छंदों को
अनुभूत मानसिक द्वंद्वों को
कभी तेल जल रंगों में
जीवन के विविध अंगों में
कभी अपनी कभी दूसरों की
नज़र से देखा
कभी धूल कभी फूल
में खोजा
पर डूबने के डर से
सदा किनारे पर डेरा जमाया
इसीलिए ज़िन्दगी में
खुद को
हाशिये पर पाया !

Friday, July 2, 2010

ग़ज़ल(अच्छे वक़्त में )

अच्छे वक़्त में कुछ देर चाँदनी बिखर जाती है
बुरे वक़्त से तो सभी की सीरत संवर जाती है

वो जो अकेला है वही रूहानियत के करीब है
भरी भीड़ में शख्सियत टुकड़ों में बिखर जाती है

ढूंढता फिरता है खुद को कहाँ दुनिया ये शीश महल
चारों तरफ हैं आईने जिस ओर नज़र जाती है

ज़िन्दगी तेरी या मेरी पानी पे लिखी कहानी
नई मौजों में कब परछाई ठहर पाती है

ये दुनिया का मेला बच्चों सी तबियत अपनी
न पूछो कि ऊँगली कब किस ओर मचल जाती है

Thursday, July 1, 2010

आत्मदीप्त उमरिया

दीये की थरथराती लौ
तेज हवाओं से लडती हुई
जिजीविषा की कथा
मौन रहकर कहती हुई

मौन ही तो सत्य है
जब आज के विज्ञापन युग में
आंधी तूफ़ान
हाशिये से उठकर
मुख्य पृष्ठपर आ गए हैं
और आदमी
अपने अनुपम लाक्षाग्रहों में क़ैद
भावों की उर्वर धरा पर
प्रस्तर वन उगाते हुए
भय शास्त्र की पोथियाँ
बांचते हुए
दिया जलाते डरता है
अंधेरों में सुरंगें खोजता है

उस मकड़ी की तरह
जो उलझकर रह गयी है
अपने ही जाल में
अंततः मर जाने के लिए

वीरगति तो नहीं कहेंगे इसे
फिर क्यों न
हवाओं से उलझे
जलाएं
हाँ जलाएं
एक दिया सा अपने भीतर
और

पलने दे जुगनू सी
आत्मदीप्त उमरिया अपने भीतर !

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