Sunday, June 20, 2010

गिद्ध शासन

हर सपना नीलाम हुआ है
जब गिद्धों को सौंपा शासन
साँसों पर तो चील झपट है
हैं खाली प्राणों के बासन

आज़ादी की सुबह में घोला
अंधियारी रातों का काजल
मन में अपने झांक सके ना
कहते मैला जग का आँचल

कैसे कोई सलीब उठाये
बुढ़ा रहा यूँ ही यौवन
खून से लथपथ हर काया के
नज़दीक सियारों के आसन

तिनके तिनके सपन जुटाए
आयेंगे मौसम मनभावन
हुआ गुमशुदा फागुन अबके
भटक गया है रस्ता सावन

अंधेरों में साए पराये
आसकिरण भी भूली आँगन
कोई सीता किसे पुकारे
जटायु पर भारी अब भी रावण

ग़ज़ल ( काश मुखर होती ...)

काश मुखर होती इतनी मेरी पीर
बिन बोले भी जुबां कहलाती कबीर

मर जाने के बाद बनती थी मज़ार
लाशों पर होती अब महलों की ताबीर

सूरज भी अब तो रहा नहीं बेदाग़
जब अंधियारे बन बैठे हैं वजीर

जाए मंदिर में पूजा या ठोकर खाए
हर पत्थर की होती अपनी ही तकदीर

बगुला भगतों के बीच होना है चुनाव
लोकतंत्र का मतलब अँधेरे का तीर

गुरूर जिनको कि हमारा जिंदा है ज़मीर
स्वाभिमान की चौखट ताउम्र रहें फकीर

कैसे मैं जियूं !

छुई मुई सी सिमटूं
या कि खुशबू बन बिखरूं
समझ नहीं आता
कैसे मैं जियूं
पंछियों सी उडू
जब जी चाहे उतरूँ चढ़ूँ
या पतंग की डोर
दूसरों को सौंप दूँ
कि शाखों में उलझूं
तो झटक कर
तोड़ ले वो डोर
और मैं
अंतिम साँस तक
चीर चीर होते हुए
मृत्यु की प्रतीक्षा करूँ
जी तो चाहे बारिश में
भीगे पत्तों सी
इठलाऊं हंसूं
चुटकी भर धूप सुख की
नयन बदरिया संग
मन के उजले भावों से
इन्द्रधनुष बुनूं
क्यों न नदी बनूँ
उम्र भर बहते रहकर
अनंत अथाह को हो समर्पित
बूंदों का रूप धर
नवजीवन चुनूँ !

Followers

कॉपी राईट

इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं