Sunday, July 10, 2011

गज़ल (मेरे दिल पर )


मेरे दिल पर लिक्खी थी लो तुमने कह दी बात वही
एक हंगामा गुजर गया और न थी कोई बात नई

माँ की गोदी में बैठा हो जैसे बच्चा एक कोई
जिंदगी क्यूँ चाहूँ मैं हर पल तुझसे एहसास वही

पीरो पैगम्बर उतरेंगे दिल को मेरे यकीं यही
नदी की जानिब बहे समंदर क्या ये आसार नहीं

दोनों हाथ उलीचा उसने पर मेरा दामन खाली
राज मुझे मालूम है कि झोली छलनी इक जात रही

दर-दर फिरता बना भिखारी दिल को मिले सुकून कहीं
पता मुझे बतला देना गर बँटती हो खैरात कहीं

8 comments:

  1. पीरो पैगम्बर उतरेंगे दिल को मेरे यकीं यही

    नदी की जानिब बहे समंदर क्या ये आसार नहीं

    दोनों हाथ उलीचा उसने पर मेरा दामन खाली

    राज मुझे मालूम है कि झोली छलनी इक जात रही


    वाह , बहुत खूबसूरत गज़ल

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  2. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 14-07- 2011 को यहाँ भी है

    नयी पुरानी हल चल में आज- दर्द जब कागज़ पर उतर आएगा -

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  3. बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल !

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  4. bahut achhi ghazal hai aapki.....badhai...

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  5. आप ने बहुत कमाल की गज़ले कही हैं

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आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर

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