Sunday, December 11, 2011

कल्पना बनाम यथार्थ



नहीं छलती कल्पना उतना
जितना यथार्थ ने छला है
जो सामने है
वही एक सच है
यह दिखलाने की कला में
न जाने कितनी बार
मासूम एक सपना जला है
वो वैरभाव किस कोख में पनपा
और दुर्विनीत
बिन माँ के बच्चे सा पला है
श्रद्धा की गोद में
जिसे खेलना था
प्यार के काँधे पर बैठकर
मेला देखना था
तृष्णा और स्वार्थ की
 देहरी पर
याचक सा खड़ा है
जो नया करना जानते हैं
मानते हैं सपनो की नींव को
उन्हें
पृथ्वी की परिधि के बाहर
अंतरिक्ष में जाने को
कल्प हंस की पाँखों पर
बैठने का
हौसला जुटाना ही पड़ा है 

Saturday, December 3, 2011

समय


समय !
तुझे एक सी धडकन धड्काए है
मैंने तो उतार चढ़ाव पाए हैं
तेरे पीछे दौड़ना पडा मुझे
जब देखा
जलते दरख्तों के साये हैं
उठती गिरती लहरों पर ही
जिंदगी के दाँव आजमाए हैं
तू साक्षी है
 बस अच्छे और बुरे का
मैंने झेले घाव खुद सहलाये हैं
सरोकार नहीं तुझे
पीले पत्तों से
पकड़ उन्हीं की उंगली
हम चल पाए हैं
निर्जीव दुनिया की इस भीड़ में
अपने होने का अहसास गरमाये है
हर फूल धूल में मिलेगा मगर
आज को जी लें
यह सोच मुस्कुराये है 
नदी की तरह
निरंतर बह लेते
चंद लकीरों ने
रोडे अटकाए हैं
हर सांस 
इक समर रही मेरे लिए
तूने अमरत्व के दान पाए हैं 

Saturday, November 26, 2011

पगली


पगली
बहुत हँसती है
वो
न जाने क्यों
शायद बेवजह
बेवजह ?
पागल है क्या
क्या पता !
और क्या
बिना कारण तो
पागल ही हँसते हैं
वो सुनकर भी हँस रही थी
मानो कह रही थी
दर्द छुपाना भी
एक वजह है
हँसने के लिए
मन के सितार को
घंटो साधा जाता है
हँसने के लिए
लिखी जाती है
नई कविता
स्मित रेखाओं से
भरे जाते हैं
अनुभूति के रंग
पलकों की कूँची से
नम आँखे लिए
पगली सोच रही थी
वो अब भी हँस रही थी .......

Followers

कॉपी राईट

इस ब्लॉग पर प्रकाशित सभी रचनाएं स्वरचित हैं तथा प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा राजस्थान पत्रिका ,मधुमती , दैनिक जागरण आदि व इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं . सर्वाधिकार लेखिकाधीन सुरक्षित हैं