Sunday, July 17, 2011

तुम्हारी शाख


बन जाऊं एक कलम सी

तुम्हारी शाख हो जाऊं

छोड़ बाबुल की क्यारी

तुम्हारी जड़ों से जुड जाऊं

ताप भी विलगा न सके

नेह बूंदों से सींचोगे

केवल प्रेम डोर से ही

बंधन मजबूत होंगे

और तब पत्ते दर पत्ते

विश्वास पनप जाएगा

एक हो जायेंगी साँसे

आँगन महक जाएगा

Sunday, July 10, 2011

गज़ल (मेरे दिल पर )


मेरे दिल पर लिक्खी थी लो तुमने कह दी बात वही
एक हंगामा गुजर गया और न थी कोई बात नई

माँ की गोदी में बैठा हो जैसे बच्चा एक कोई
जिंदगी क्यूँ चाहूँ मैं हर पल तुझसे एहसास वही

पीरो पैगम्बर उतरेंगे दिल को मेरे यकीं यही
नदी की जानिब बहे समंदर क्या ये आसार नहीं

दोनों हाथ उलीचा उसने पर मेरा दामन खाली
राज मुझे मालूम है कि झोली छलनी इक जात रही

दर-दर फिरता बना भिखारी दिल को मिले सुकून कहीं
पता मुझे बतला देना गर बँटती हो खैरात कहीं

Monday, July 4, 2011

गज़ल (सन्नाटा क्यूँ है )

चारों तरफ है शोर तो भीतर सन्नाटा क्यूँ है
खामोश है कोई तों इतना सताता क्यूँ है

मैं हँसूं खिलखिलाऊँ कहकहे लगाऊं हक है
ए आम आदमी बता तू मुस्कुराता क्यूँ है

छूटते गए रिश्ते अलग दिखने की चाह में
टूटा आईना सामने अब डराता क्यूँ है

जर्रे जर्रे में तू हर शै तेरा कमाल
क्या राज है बता पता अपना छुपाता क्यूँ है

बेटा पैसा महल खुदाई क़ैद के सामान
कमा लिये तूने तों रिहाई चाहता क्यूँ है

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