बन जाऊं एक कलम सी
तुम्हारी शाख हो जाऊं
छोड़ बाबुल की क्यारी
तुम्हारी जड़ों से जुड जाऊं
ताप भी विलगा न सके
नेह बूंदों से सींचोगे
केवल प्रेम डोर से ही
बंधन मजबूत होंगे
और तब पत्ते दर पत्ते
विश्वास पनप जाएगा
एक हो जायेंगी साँसे
आँगन महक जाएगा
स्वरचित रचनाएं..... भाव सजाऊं तो छंद रूठ जाते हैं छंद मनाऊं तो भाव छूट जाते हैं यूँ अनगढ़ अनुभव कहते सुनते अल्हड झरने फूट जाते हैं -वन्दना
बन जाऊं एक कलम सी
तुम्हारी शाख हो जाऊं
छोड़ बाबुल की क्यारी
तुम्हारी जड़ों से जुड जाऊं
ताप भी विलगा न सके
नेह बूंदों से सींचोगे
केवल प्रेम डोर से ही
बंधन मजबूत होंगे
और तब पत्ते दर पत्ते
विश्वास पनप जाएगा
एक हो जायेंगी साँसे
आँगन महक जाएगा