Thursday, August 4, 2016

हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ

राह निकली जरा सादगी की तरफ
और झुकने लगी रोशनी की तरफ

खुद का सम्मान चाहें वो दे गालियाँ
गौर फरमाइए मसखरी की तरफ

आ गए हम न जाने ये किस मोड़ पर
उठ रहे क्यों कदम गुमरही की तरफ

ईद के बाद देखी नहीं सब्जियाँ
कर्ज ऐसे चढ़ा मुफलिसी की तरफ

ये शिकायत कभी माँ तो करती नहीं
हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ

हाँ जरा शाम का रंग चढ़ने तो दो
चल पड़ेंगे कदम आरती की तरफ

पत्थरों की ही मानिंद बहना मुझे
इक शिवाला कहे चल नदी की तरफ

बहर मुतदारिक मुसम्मन सालिम

तरही मिसरा आदरणीय जनाब अहसान बिन दानिश साहब की ग़ज़ल से ‘हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ ‘

Saturday, June 25, 2016

जब भी जुनून ले के कोई जिद से डट गया
ये देखो आसमान तो सपनों से अट गया

आकर करीब देखा तो जलवा सिमट गया
"कैसा था वो पहाड़ जो रस्ते से हट गया"

बेख़ौफ़ बढ़ रहा था कि पिघली थी रोशनी
पर धूप जब चढ़ी तो लो साया भी घट गया

ऊंची दुकां  में बिकती हैं फर्जी ये डिग्रियां
शिक्षा का हाल देख  कलेजा ही फट गया

रेखा मेरे करीब से लम्बी गुजर गयी
था कुछ वजूद छोटा तो कुछ और घट गया

हाँ बर्फ सी जमी तो मेरे चारों ओर है
पर क्या  हुआ कि रिश्ता नमी से ही कट गया

वो  ढूँढना तो चाहता था चैन की ख़ुराक
लेकिन दिलो-दिमाग की उलझन में बट गया  



  तरही मिसरा "कैसा था वो पहाड़ जो रस्ते से हट गया"
आदरणीय शायर जनाब कतील शिफ़ाई की ग़ज़ल से 


मफऊलु फाइलातु मुफाईलु फाइलुन
221 2121 1221 212
(बह्र:  मुजारे मुसम्मन अखरब मक्फूफ़ )

Saturday, May 28, 2016

“फूल जंगल में खिले किन के लिए”


नव सुहागिन या वियोगिन के लिए
तारे टाँके रात ने किन के लिए

नीतियों के संग होंगी रीतियाँ
मैं चली हूँ आस के तिनके लिए

बात आसां थी समझ आई मगर
हम अड़े हैं किन्तु-लेकिन के लिए

माँ दुआएँ बाँधती ताबीज में
कीलती है काल निसदिन के लिए

साधनारत हैं स्वयं ये और क्या
“फूल जंगल में खिले किन के लिए”

बाग़ चौपालों बिना बैठें कहाँ
हो कहाँ संवाद पलछिन के लिए  

विष पियाला या पिटारी साँप की
क्या परीक्षा शेष भक्तिन के लिए


-मिसरा-ए-तरह आदरणीय शायर जनाब अमीर मीनाई साहब का 
बह्र: रमल मुसद्दस् महजूफ  

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