Sunday, November 20, 2011

मन की विकलांगता


पुष्प

जीते हैं उल्लास से

अपनी क्षणभंगुरता को

नहीं जानते जीना है कितना

फिर भी बांटते हैं

रंग की उमंग को

गंध के गौरव को

क्यूँ नहीं जी पाते

हम भी

यूँ ही

क्षणजीवी होने का बोध

बटोरते हैं आवश्यक अनावश्यक सामान

शायद जानते ही नहीं

अपने रंग को

पहचानते ही नहीं

स्वयं की गंध को

जुटाते हैं मंगल उत्सवों पर

परिचितों की

अपरिचित सी भीड़

पोषित करते अपने दंभ को

ढूंढते हैं निरंतर बैसाखियाँ

किन्तु निस्सहाय ही रहती है

सम्पूर्ण जीवन

मन की विकलांगता........

Monday, November 7, 2011

बिटिया



तू आई गोदी में बिटिया

जीवन मेरा मुस्काया

भूला रस्ता आज चाँद ज्यूँ

मेरे आँचल में आया


मृगतृष्णा से व्याकुल मनवा

कैसे इत उत भटक रहा था

चिंता चिंतन भूल भुलैया

रस्ता कोई खोज रहा था

भूली मैं सुध बुध आसकिरण

बचपन अपना फिर पाया


मधुर रागिनी तू सपनों की

उषा गीत तेरी किलकारी

आँगन अब वसंत है छाया

गुँजित फाग राग से क्यारी

नन्हीं तुतलाती बातों में

रस मधुरिम घुल-घुल आया


धूल उड़ाती तू इठलाती

माटी के घरौंदे बनाती

फूल पत्तियां टहनी लेकर

अनुपम जीवन बेल सजाती

आनंद नव सृजन का मैंने

नन्हें हाथों में पाया



सरदी की मीठी धूप बनी तू

या फिर इन्द्रधनुष खिल आया

आज चली तू डगमग डगमग

झूला गगन संग बतियाया

और सहसा ही उठा एडियाँ

तारों से हाथ मिलाया

Saturday, October 29, 2011

शक्ति सृजन की

अस्मिता की खोज में
मेरे मन की
शुचिता को
मिली जब भी
तुम्हारी ओर से
अवमानना
निरंतर जलती रही
उपेक्षा और अविश्वास
के आँवाँ में
किन्तु अब
हो गयी हैं परिपक्व
मेरी पीडाएं
परिभूत होकर भी
इतनी परिपक्व
कि बन सकती हैं
आहुति
किसी आश्रय यज्ञ की
एक मजबूत ईंट सी
क्योंकि होती है
वेदना में
शक्ति सृजन की
Siti Hawa, 38, making bricks at a brick factory in the village of Tungkop, Aceh, on Monday. In Aceh, most women work in various sectors to contribute to the livelihood of their families. (EPA Photo)

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