पुष्प
जीते हैं उल्लास से
अपनी क्षणभंगुरता को
नहीं जानते जीना है कितना
फिर भी बांटते हैं
रंग की उमंग को
गंध के गौरव को
क्यूँ नहीं जी पाते
हम भी
यूँ ही
क्षणजीवी होने का बोध
बटोरते हैं आवश्यक अनावश्यक सामान
शायद जानते ही नहीं
अपने रंग को
पहचानते ही नहीं
स्वयं की गंध को
जुटाते हैं मंगल उत्सवों पर
परिचितों की
अपरिचित सी भीड़
पोषित करते अपने दंभ को
ढूंढते हैं निरंतर बैसाखियाँ
किन्तु निस्सहाय ही रहती है
सम्पूर्ण जीवन
मन की विकलांगता........

