ओ ! री शकुंतला
कैसा यह मुक्तिगान
दुष्यंत को समर्पण
कण्व की अनुमति बिना
वह तो व्यास थे कथा रचयिता
कि अंततः दिला दिए अधिकार
कभी सोचा
कण्व कितने कमजोर हुए
इस मुक्तिबोध से
दुष्यंत ने तो बांधा
प्रण को प्रमाण में
किन्तु अंगूठी भी छल गयी तुम्हें
मात्र दुर्वासा का शाप न था
यह तो दुष्यंत की मुक्ति थी
प्रण से संकल्प से
मात्र एक बहाना बना छलना
छलनाओं में जीती हुई
रिश्तों से भागती
आज की शकुंतला
घूंघट से मुक्ति का आह्वान
स्कार्फ की तहों में खुद को छुपाती
तन की कोमलता बचाती
मन से अब भी कमजोर
संसद में आरक्षित होकर
कोख में इतनी अरक्षित
मुक्ति आखिर किसकी
नारी वर्ग की
या तुम्हारे अहम की