Friday, April 1, 2011

कैसा यह मुक्तिगान !!

ओ ! री शकुंतला

कैसा यह मुक्तिगान

दुष्यंत को समर्पण

कण्व की अनुमति बिना

वह तो व्यास थे कथा रचयिता

कि अंततः दिला दिए अधिकार

कभी सोचा

कण्व कितने कमजोर हुए

इस मुक्तिबोध से

दुष्यंत ने तो बांधा

प्रण को प्रमाण में

किन्तु अंगूठी भी छल गयी तुम्हें

मात्र दुर्वासा का शाप न था

यह तो दुष्यंत की मुक्ति थी

प्रण से संकल्प से

मात्र एक बहाना बना छलना

छलनाओं में जीती हुई

रिश्तों से भागती

आज की शकुंतला

घूंघट से मुक्ति का आह्वान

स्कार्फ की तहों में खुद को छुपाती

तन की कोमलता बचाती

मन से अब भी कमजोर

संसद में आरक्षित होकर

कोख में इतनी अरक्षित

मुक्ति आखिर किसकी

नारी वर्ग की

या तुम्हारे अहम की

Thursday, March 31, 2011

बूँद

पलकों से गिरी खारी थी
समंदर नहीं कहलाई
बहने तो निकली चली भी
पर नदिया ना कहलाई
रुकी ढूँढाहो सीप कहीं
पर मोती ना बन पायी
सिमटी रही निपट अकेली
न किसी की प्यास बुझाई
मिला अभ्र का टुकड़ा कहीं
अब किसी की आस कहलाई
मिटा अस्तित्व अपना चली
बरसी तो खुशी मनाई
खोई जो जीवन मेले में
चहुँ ओर धरा हरियाई

Sunday, March 27, 2011

हम रहेंगे ....

मेरे पास भी हैं

अंजुरी भर सपने

सपने नितांत मेरे अपने

जिन्हें चाहिए आकाश

पंख पसारने के लिए

अंतहीन गगन नहीं

बस बाँहों भर आकाश

हम बनें ओस

या फिर

समंदर

अपरिभाषित प्यास तो

होठों पर

फिर भी रहेगी

शत सहस्रों बार सुनी

अनकही कहानी

जिजीविषा

मौन रहकर भी कहेगी

एक बूँद ज्योत्सना

बस एक क्षण

पीड़ा की गली में

सदी दर सदी

और

उल्कापात सा जीवन

बस एक क्षण

क्या जरूरी है कि

चमकें क्षितिज पर

उल्कापात सी

किसी लकीर की तरह

कालजयी अभिमान की

प्राचीर की तरह

हम बनें एक सीढ़ी

किसी एक के लिए

हो संभव

तो अनेक के लिए

हम रहेंगें हमेशा रहेंगे

किसी सफलता की कथा में

या किसी असफल प्रयास की व्यथा में

वर्तमान और इतिहास में

संघर्ष के उत्तराधिकार में

शिराओं में रक्त बनकर बहेंगे

हम रहेंगे..... हमेशा रहेंगे !

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