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Wednesday, April 8, 2020

मैं मुट्ठी में जुगनू भरकर
सौदा सूरज से करती हूं
धता बताऊं तृष्णा को मैं
ऐसे साधन भी रखती हूं
बटुए में आशाएं रखकर
फुटकर सपने आंचल बांधे
कुलदीपक को सिखलाऊं मैं
कैसे अपनी राहें साधे
श्रम के सीकर जिसे सींचते
उस पथ से रोज गुजरती हूं
मैं मुट्ठी में.....
आवां की गोदी में तपकर
शीतलता बरसाने वाली
आंसू का खारा जल पीकर
अपनी प्यास बुझाने वाली
होंठों पर मुस्कान सजाए
डलिया में दिनकर रखती हूं
मैं मुट्ठी में जुगनू भरकर सौदा सूरज से करती हूं

_ वंदना

आदरणीय Kailash Meena जी की वाल के चित्र से प्रेरित

5 comments:

आपकी बहुत बहुत आभारी हूँ कि अपना बहुमूल्य समय देकर आपने मेरा मान बढाया ...सादर