Friday, July 19, 2019

चाह



अगले जनम भी
कतई नहीं बनना
मुझे अमरबेल
न लाजवंती
न सूरजमुखी
कतई नहीं
हां बनना है
कोई पौधा
चाहे कास का
या फिर हरी दूब
हथेली पर ठहरी हुई
शबनम लिए

_वंदना

Friday, July 12, 2019

माँ-गुलमोहर



मेरे तपते जीवन पर थी माँ तुम हुलसित छाया
सूरज को नित आँख दिखाती गुलमोहर की माया

पाँव पड़े थे छाले मेरे या डगमग पग डोले
बिन बोले भी भाव समझकर भेद जिया के खोले
संबंधों का तार अनोखा तुमसे मुझ तक आया
मेरे तपते .....

मौन रही तुम जब भी सूखे संवेदन के धारे
बिना शर्त ही माफ़ किया सब गलती पाप सुधारे
पुण्यफलित थे मेरे मैया मैंने तुमको पाया
मेरे तपते ....

अब जो बिछड़ी लौ दीये की चैन कहाँ से पाऊं
जग के सारे तिलिस्म हैं झूठे मैं बैठी पछताऊं
क्यों ना वो आवाज सुनी जब तुमने मुझे बुलाया
मेरे तपते ......

-वंदना

Saturday, June 1, 2019

ग़ज़ल

निराले जग के  परदों में छुपी यह बात सारी है
कहीं पर आग भारी  है कहीं पानी की बारी है

तराशे जाता जो पलछिन , सजाता  है कभी उसको
किसी मिट्टी की मूरत का वही सच्चा पुजारी है

दबे पांवों से आएगी ख़ुशी भी गुनगुनायेगी
तसल्ली खुद को देनी है कि अब मेरी ही बारी है

सितारे हैं तो झोली में सताया पर अंधेरों ने
गगन बांटेगा क्या किस्मत जो लगता खुद भिखारी है

इबादत की थी मीरा ने कबीरा बुन गए चादर
सजाये मंच बैठा जो कथित दावा पुजारी है

खिलाडी खुद को हम समझे लगे दिन रात रहते हैं
मगर कोई न यह माने खुदा असली मदारी है

बिछाकर जाल बैठा जो मचानों पर जमा आसन
दिलेरी उसकी क्या कहिए  बड़ा  शातिर शिकारी है 
   -
------ वंदना

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