Monday, September 30, 2013

ग़ज़ल







हुआ सम्मान नारी का यहाँ नर नाम से पहले

सिया हैं राम से पहले व राधे श्याम से पहले


समेटा है मेरा अस्तित्व धारोंधार  तुमने जब

विशदता मिल गयी जैसे कहीं विश्राम से पहले


खिंची रेखा कोई जब भी बँटे आँगन दुआरे तो

कसक उठती है सोचें हम जरा परिणाम से पहले


ग़ज़ल का जिक्र जब होगा कशिश की बात गर होगी

तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले


बुझा  मत आस का दीपक यकीनन भोर आएगी

अँधेरा है जरा गहरा मगर अनुकाम से पहले


अगर ममता ने बाँधी है परों से डोर कुछ पक्की

यकीनन लौट आयेंगे परिंदे शाम से पहले


विरासत में मिली खुशबू खिले हैं रंग बहुतेरे

छुआ आँचल कहो किसने कि जिक्र-ए-नाम से पहले

                                                -वंदना 



(तरही मिसरा  -   "तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले"  जनाब क़तील शिफाई साहब  की एक ग़ज़ल से )

Sunday, September 22, 2013

दोहे



मणि तारक ले गोद में , सबमें बांटे आश
रहता थामे पोटली , वो बूढा आकाश

धरणी तो यह पल रही तेरे अंक विशाल
प्रलय राग तू  क्यूँ रचे सृजन हेतु दिक्पाल

मनों आकाश पितृ सम हरे धरा संताप
देख पीड़ा बरस गया खोकर धीरज आप

तृष्णा पीछे भागते सुने न मन का शोर
कैसे सोयी रात थी कैसे जागी  भोर

प्रकृति के सम्मान पर चोट करे सायास
कैसा तेरा रुदन था कैसा तेरा हास

सप्तरंग मिलकर करें  जीवन सुधा प्रकाश

ऐसे रंग न बांटिये जो नित करें हताश 

Friday, September 13, 2013

दोहे

सिकुड़े गलियारे सहन ऊँची मन दहलीज
गलती माली की रही  कैसे बोये बीज

पूर्वाग्रह तो छोडिये मिलिए निज बिसराय
धरिय डली मुख नून की स्वाद मधुर कस पाय

अनुशासित होकर रहे उड़े पतंग अकास
भागी फिरे कुरंग सम  डोर पिया के पास

कब तक परछाई चले पूछ न कितनी दूर
धूप चढ़े सिर बावरी छाया थक कर चूर

शापित मानव कर्म से धरा रो रही आज
चील झपट के खेल के बदले ना अंदाज़


फिर कहीं गिरा नीम या बरगद छायादार
यूँ गाँव को निगल गया शहरों का विस्तार 

Friday, September 6, 2013

अब चाँद दिखाये न बने

नूर ऐसा कि ये जज्बात छिपाये न बने
आग उल्फ़त की है दामन को बचाये न बने

इस कदर भींत उठी गर्व की रफ्ता रफ्ता 
अब तो ये हाल कि दीवार गिराये न बने

फेरकर बैठ गए पीठ ख़ुशी रूठ गयी
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने

तोड़ डाले हैं अगर बाँध नदी ने दुःख में
प्रश्न फिर उसकी बगावत पे उठाये न बने

आज इस दौर में जज्बात कहाँ ढूंढें हम 
इश्तिहारों से पता लाख लगाये न बने

खो गए शख्स कई उम्र बिता यूँ कहकर
बेरुखी सिर तो नई नस्ल की चढ़ाये न बने

तिफ़्ल समझो न खुदाया कि उड़ाने हैं गज़ब
सिर्फ पानी में ही अब चाँद दिखाये न बने                                            

राख के ढेर छुपी हो कोई चिंगारी भी
उफ़ हवा दे न सके और बुझाये न बने

देहरी आज नया दीप जलाकर रख दो
काँपती लौ के चिरागों को जलाए न बने

 


( तिफ़्ल =बच्चा )
("क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने" तरही मिसरा-मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की ग़ज़ल से )


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