Sunday, February 26, 2012

उमर बुनी अनजाने में




अनगिन गाँठे थी ताने में
अनगिन गाँठे थी बाने में
सफ़ेद हुए स्याह बालों की
यूँ उमर बुनी अनजाने में

अनुभव कुछ थे नीम करेले
और कुछ थे शहद के धारे
कभी पिंजी रुई की नरमी
थी चुभन कभी अफ़साने में

जीवन के वचन निभाए भी
आंधी मे दिए जलाए भी
डेरा अपना बंजारे सा
भटके दर दर वीराने में

सांस दर सांस उलटी गिनती
तेरे दामन से क्या चुनती
खोल रहस्य जिंदगी अब तू
लाई थी क्या नजराने मे

जब  जब पीड़ा घन घिरता है
दिल मे आग लिये फिरता है
एक कहानी उमस घुटन की
युग बीत गए समझाने मे 

Sunday, February 19, 2012

विंटेज कार



जिंदगी की इस रफ़्तार मे
कब हम विंटेज कार हो गए
ना जाने कब घर से निकले
गैरेज का सामान हो गए


जिनकी खातिर रातों जागे
वही सपने बेजार हो गए
कभी सेवा के संस्कार थे
रिश्ते अब इश्तिहार हो गये
बोली उनको सिखला दी तो
हम न बोलें  फरमान हो गए

जड़ जमने के संगी साथी
पीत पात  निराधार हो गए
घर के कोने में पहुँच चुके
बेदखली के आसार हो गये
दिल के जो सबसे करीब थे
असीम दर्द पहचान हो गए 

सभी चित्र :गूगल से साभार 

Sunday, February 12, 2012

यह भी है जिंदगी



महँगे इत्रों से महकती
लंबी चौड़ी गाड़ियों में
फर्राटे से दौड़ती
कभी गहनों के गुणगान
कभी प्रोपर्टी के गीत
परसों पेरिस से लौटी हूँ
पति अमेरिका में हैं
बेटा लन्दन में सैटल है
बिटिया ऑस्ट्रेलिया में
निऑन बल्बों सी दमकती
सच्चे मीत को तरसती
भरपेट खाकर भी
भूख की कथा सी
ये भी है जिंदगी
शाम ढले
मेहनत के बाद
चूल्हे के चारों ओर
चार प्राणी
समय की चाल
उम्र से पहले
पक गए हैं बाल
 सिर्फ दो रोटी ...
आधी आधी बाँट लेंगे
चादर छोटी है तो क्या
आधा तन ढांप लेंगे
प्यार की भीनी महक सी 
चाँदनी मद्धिम चाँद की
स्वयं में परितृप्त सी
हाँ यह भी है जिंदगी ....

Sunday, February 5, 2012

जमीर ही खड़ा है


सुधियों में आज भी
मोती सा जड़ा है
प्रश्न ले झोली में
जमीर ही खड़ा है

गुलमोहर के फूल
और सिरस की गंध
बिसरे तेरे वादे
कुछ मेरे अनुबंध
यादों की गली में
बिखरा सब पड़ा है

धार में अँसुवन की
जो बह  भी न पाया
बाते थी स्वजन की
 जो कह भी न पाया
मन की कली कोमल
कांटा सा गडाहै

वह था तेरा अहम
या मेरा अभिमान
दरकता था दर्पण
या छूटा सम्मान
सोचते थे दोनों
जिद पे क्यों अडा है

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