अनगिन गाँठे थी ताने में
अनगिन गाँठे थी बाने में
सफ़ेद हुए स्याह बालों की
यूँ उमर बुनी अनजाने में
अनुभव कुछ थे नीम करेले
और कुछ थे शहद के धारे
कभी पिंजी रुई की नरमी
थी चुभन कभी अफ़साने में
जीवन के वचन निभाए भी
आंधी मे दिए जलाए भी
डेरा अपना बंजारे सा
भटके दर दर वीराने में
सांस दर सांस उलटी गिनती
तेरे दामन से क्या चुनती
खोल रहस्य जिंदगी अब तू
लाई थी क्या नजराने मे
जब जब पीड़ा घन घिरता है
दिल मे आग लिये फिरता है
एक कहानी उमस घुटन की
युग बीत गए समझाने मे
15 टिप्पणियाँ:
बिल्कुल सही कहा।
bahut sahi ...
acchi rachna...
लेखन का जादू..
यर्थाथ का चित्रण। सादर।
गहरे भाव .... उत्कृष्ट पंक्तियाँ - वाह !!!
जिन्दगी का अनजाना रहस्य बंजारा ही बना देता है . सुन्दर काव्यात्मक भावो में खींचती हुई लेखनी...
bahut hi pyaari rachna,acha lga padh kar
सार्थक रचना...मन में घर करने वाली|
बहुत बढ़िया सराहनीय प्रस्तुति,सार्थक सुंदर रचना के लिए वंदना जी बहुत२ बधाई.... .
फालोवर बन बन रहाहूँ ......
NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...
मर्मस्पर्शी..... आखिरी पंक्तियाँ गहरे उतरती हैं....
bich vala antra bahut pyara laga ..sundar ati sundar bhaav or bunaai dono hi behatriin
umda rachna!
bahut hi sundar rachana ....sadar badhai
जीवन के अनुभवों को नीम, करेले और शहद से तुलना करना भा गया।
होली की बधाइयां एवं शुभकामनाएं।
सुन्दर कविता |होली की शुभकामनायें
Post a Comment