सुधियों में आज भी
मोती सा जड़ा है
प्रश्न ले झोली में
जमीर ही खड़ा है
गुलमोहर के फूल
और सिरस की गंध
बिसरे तेरे वादे
कुछ मेरे अनुबंध
यादों की गली में
बिखरा सब पड़ा है
धार में अँसुवन की
जो बह भी न पाया
बाते थी स्वजन की
जो कह भी न पाया
मन की कली कोमल
कांटा सा गडाहै
वह था तेरा अहम
या मेरा अभिमान
दरकता था दर्पण
या छूटा सम्मान
सोचते थे दोनों
जिद पे क्यों अडा है
20 टिप्पणियाँ:
वाह क्या बात है...एकदम से सहमत होने जैसा...
प्रश्न बनके जब जमीर खड़ा हो जाए
दिल का कांटा सहज ही निकल जाए
उम्दा भाव हैं।
सामंजस्य के वृहद् फलक को सुन्दर शब्दों व भावों में समेटती रचना अपने प्रवाह में बहा रही है ..अच्छा लिखती हैं आप..
gudh abhivyakti
वंदना ! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति...
बेहतरीन रचना।
सादर
कल 07/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
वाह! बहुत सुन्दर!
उत्तम....सहजता से कहते मन के भाव....
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति...
गहन अभिव्यक्ति...
उत्तम रचना.
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...
मधुर गीत
Bahut sundar :)
palchhin-aditya.blogspot.in
सुंदर गीत में कोमल भाव.
बधाई.
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...
गहन .... विचारणीय प्रश्न
वन्दना जी बहुत सुन्दर कविता बधाई |
शब्दों की जिद ने कविता को सुंदर बना दिया है।
SOFT AND SWEET STRAIGHT EXPRESSION
THANKS
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